अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक तरफ ईरान के साथ शांति वार्ता की पहल कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ अमेरिकी सैनिकों को तैनात करने के कथित प्लान पर भी काम रहे हैं. ट्रंप की इस योजना पर ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बागर गालिबाफ ने तीखी प्रतिक्रिया दी है. उन्होंने कहा कि अमेरिका और इजरायल के बड़े जनरलों से जो गलतियां हुई हैं, उन्हें साधारण सैनिक ठीक नहीं कर पाएंगे और ये 1,000 सैनिक भी 'शिकार' हो सकते हैं.
'जनरलों की गलतियां सैनिक नहीं सुधार पाएंगे'
ईरान के प्रमुख नेता गालिबाफ ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट में कहा कि चाहे सैनिकों की तैनाती हो या कुछ और, इलाके में होने वाली अमेरिका की हर हरकत और सैन्य गतिविधियों पर ईरान की पैनी नजर है. उन्होंने कहा कि अमेरिका और इजरायल के जनरलों ने जो स्थितियां बिगाड़ दी हैं, उनका समाधान सैनिक भेजने से नहीं निकलेगा. ये अमेरिकी सैनिक नेतन्याहू के भ्रमजाल और गलतियों में फंसकर शिकार बन सकते हैं.
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स्पेशल यूनिट की तैनाती पर विचारः रिपोर्ट
गालिबाफ ने साफ चेतावनी देते हुए कहा कि ईरान अपनी राष्ट्रीय संप्रभुता और जमीन की हिफाजत करने के लिए संकल्पित है और अमेरिका को उसके संकल्प का इम्तिहान लेने की कोशिश नहीं करनी चाहिए. ऐसी कोई भी कोशिशों का ईरान मजबूती से जबाव देगा. ईरानी स्पीकर का ये बयान उन रिपोर्ट्स के बाद आया है, जिनमें कहा जा रहा है कि अमेरिकी विदेश मंत्रालय पेंटागन मिडिल ईस्ट में अपनी 82वीं एयरबोर्न डिवीजन के सैनिकों को तैनात करने पर विचार कर रहा है.
सीबीएस न्यूज ने सूत्रों के हवाले से यह दावा करते हुए बताया है कि इस मिशन के तहत करीब 1500 सैनिकों की तैनाती की जा सकती है. बता दें कि फोर्ट ब्रैग स्थित यह यूनिट बेहद मुश्किल हालात में दुश्मन के इलाके में पैराशूट के जरिए उतरने और महत्वपूर्ण हवाई अड्डों पर कब्जा करने में माहिर मानी जाती है.
नाकामी को समझौते का नाम न देंः ईरानी सेना
ईरान ने ट्रंप के बातचीत के प्रयासों को भी मखौल उड़ाया है. फार्स न्यूज की तरफ से जारी एक वीडियो में ईरानी सैना के प्रवक्ता ने अमेरिका पर तंज कसते हुए कहा कि हालात ऐसे मोड़ पर आ चुके हैं, जब अमेरिका को खुद ही बातचीत की पहल करनी पड़ रही है. जो अमेरिका अपनी रणनीतिक ताकत का बखान किया करता था, वो अब एक रणनीतिक हार में बदल चुकी है. उन्होंने कहा कि अमेरिका अपनी नाकामी को समझौते का नाम देने की कोशिश न करें क्योंकि उसके वादों और इरादों का दौर खत्म हो चुका है.
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