अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ईरान-इजरायल युद्ध का दुनिया पर पड़ रहे असर को लेकर एक बड़ा बयान दिया है. IMF ने कहा है कि यदि मध्य पूर्व में युद्ध नहीं हुआ होता, तो हमने इस वर्ष अपने वैश्विक विकास पूर्वानुमान (global growth forecasts) को संशोधित कर 3.4% कर दिया होता. हालांकि, नए झटकों के साथ, अब 2026 में विकास दर धीमी होकर 3.1% होने का अनुमान है.
IMF के मुताबिक, आज यूरोप एक दोराहे (crossroads) पर है. मध्यपूर्व एशिया में जारी संकट की वजह से ऊर्जा आपूर्ति के झटके (energy supply shock) से विकास धीमा हो रहा है और मुद्रास्फीति बढ़ रही है. यूरो क्षेत्र के लिए परिदृश्य ख़राब हो गया है, इस वर्ष विकास दर केवल 1.1 प्रतिशत रहने का अनुमान है.दरअसल, स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ पर जारी संकट की वजह से वहां अब भी करीब 2000 कार्गो जहाज़ फंसे हुए हैं, और पिछले 56 दिनों से अनिश्चितता की वजह से क्रूड ऑयल और गैस की सप्लाई बुरी तरह से बाधित हुई है, जिसकी वजह से एनर्जी पर दुनिभर के देशों का खर्च बढ़ता जा रहा है.
भारत अपनी ज़रुरत का 85% से ज़्यादा कच्चा तेल अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार से आयात करता है. ऐसे में कच्चे तेल के और महंगा होने से तेल आयात का खर्च बढ़ता जा रहा है.पेट्रोलियम मंत्रालय की Petroleum Planning and Analysis Cell (PPAC) की ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक मध्यपूर्व एशिया में जारी अनिश्चितता की वजह से 23 अप्रैल, 2026 को कच्चे तेल (भारतीय बास्केट) की कीमत बढ़कर US$ 108.55/बैरल के ऊँचे स्तर पर पहुंच गई.
सरकारी आकड़ों के मुताबिक, युद्ध शुरू होने से पहले फरवरी, 2026 में कच्चे तेल (भारतीय बास्केट) की औसत कीमत 69.01 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल थी।यानी, मध्यपूर्व युद्ध एशिया में जारी अनिश्चितता की वजह से कच्चा तेल फरवरी, 2026 की औसत कीमत के मुकाबले 23 अप्रैल, 2026 को 39.54 डॉलर प्रति बैरल महंगा हुआ, यानि 57.29% की बढ़ोतरी.अप्रैल 2026 महीने के दौरान कच्चे तेल की औसत कीमत 21 अप्रैल तक 114.77 डॉलर प्रति बैरल बनी हुई है. मार्च, 2026 महीने के दौरान भी कच्चे तेल की औसत कीमत 113 डॉलर प्रति बैरल के आसपास थी.
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