- 1985 में हुए इस आतंकवादी हमले में 329 लोग मारे गए, जिनमें 268 कनाडाई नागरिक शामिल थे
- पीड़ित परिवारों ने जांच बंद करने की किसी भी कोशिश का कड़ा विरोध करते हुए न्याय की मांग की है
- परिवारों को टोरंटो में हुई बैठक में बताया गया कि जांच में कटौती हो सकती है, जिससे उन्हें गहरा सदमा लगा
एयर इंडिया की फ़्लाइट 182 'कनिष्क' बम धमाके को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है. पीड़ितों के परिवारों ने चिंता जताई है कि रॉयल कैनेडियन माउंटेड पुलिस (RCMP) 1985 के इस आतंकी हमले की जांच को कम कर सकती है और शायद इस मामले को "इनएक्टिव" (निष्क्रिय) कैटेगरी में डाल सकती है.
NDTV को उस मीटिंग की जानकारी मिली है जो इस महीने की शुरुआत में RCMP के सीनियर अधिकारियों के कहने पर पीड़ितों के परिवारों के साथ हुई थी, जिसमें यह फैसला बताया गया था. इस खबर ने उन परिवारों को हैरान कर दिया है जो चार दशकों से ज्यादा समय से उस बम धमाके के बारे में जवाब पाने की कोशिश कर रहे हैं, जिसमें 329 लोग मारे गए थे, जिनमें 268 कैनेडियन नागरिक शामिल थे.कैनेडा के अधिकारी इस हमले को देश के इतिहास का सबसे घातक आतंकी हमला मानते हैं.
किस बात पर है नाराजगी
पीड़ितों के परिवार के सदस्य और कनिष्क फ़ाउंडेशन के चेयरमैन संजय लाजर ने कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी को एक भावुक और जोरदार पत्र लिखकर जांच को बंद करने की किसी भी कोशिश का कड़ा विरोध किया है. NDTV को यह पत्र मिला है. लाजर का कहना है कि 23 जून, 1985 की त्रासदी में उन्होंने अपने माता-पिता और छोटी बहन को खो दिया था और वे दशकों से न्याय पाने की कोशिश कर रहे हैं. 16 सितंबर को लिखे अपने पत्र में, उन्होंने बताया है कि टोरंटो में 12 सितंबर को हुई एक बैठक के बाद उन्हें गहरा सदमा लगा, जिसमें परिवारों को जांच के भविष्य के बारे में जानकारी दी गई थी.

पत्र में कहा गया है कि परिवारों को बताया गया कि टास्क फोर्स में कटौती हो सकती है और मामले को निष्क्रिय (इनएक्टिव) करने की दिशा में कदम उठाए जा सकते हैं. परिवारों के लिए, इस संभावना ने उस त्रासदी के सबसे गहरे घावों को फिर से ताजा कर दिया है, जिससे वे कभी पूरी तरह उबर नहीं पाए. पीड़ित परिवारों की चिंता 1985 में हुई घटना के बारे में नहीं है, बल्कि इस बात को लेकर है कि अब क्या हो रहा है. लाजर के पत्र के अनुसार, RCMP ने टोरंटो में हुई बैठक में संकेत दिया कि वह एयर इंडिया टास्क फ़ोर्स का आकार कम करने और जांच को असल में 'इनएक्टिव' (निष्क्रिय) स्थिति में डालने पर विचार कर रही है. परिवारों का कहना है कि यह उनके लिए एक बहुत बड़ा झटका था.
लाजर इस बैठक को आपराधिक मुकदमे के बाद 20 सालों में परिवारों के लिए पहली ब्रीफिंग बताते हैं. उनका कहना है कि जो बातें सुनीं, उनसे रिश्तेदार परेशान थे और बैठक के दौरान लोगों की भावनाएं काफी उग्र थीं. यह मामला इसलिए भी काफी संवेदनशील हो जाता है क्योंकि RCMP ने खुद पहले एयर इंडिया की जांच को कनाडा के इतिहास की सबसे बड़ी और सबसे जटिल जांचों में से एक बताया है.40वीं बरसी पर 2025 में जारी एक समीक्षा में, फ़ोर्स ने बताया कि इस मामले पर सैकड़ों अधिकारियों ने काम किया था; जांचकर्ताओं ने कई देशों की यात्रा की, सबूतों की जांच की, विमान का पुनर्निर्माण किया और गवाहों से पूछताछ की.
पीएम मोदी को भी भेजी चिट्ठी
अपने पत्र में लाजर कहते हैं कि दशकों की जांच के बाद परिवारों से नई जानकारी या सुराग देने के लिए कहना बहुत दुखद था.परिवारों के लिए, सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या चार दशकों से चल रही जांच अब मुख्य रूप से पीड़ितों के रिश्तेदारों द्वारा दी गई जानकारी पर निर्भर होनी चाहिए, जबकि जांचकर्ता खुद वह जानकारी नहीं जुटा पाए हैं. उनका तर्क यह नहीं है कि सबूतों की परवाह किए बिना हर जांच हमेशा चलती रहनी चाहिए. बल्कि, वे मांग कर रहे हैं कि मामले को असल में बंद करने से पहले अधिकारी यह पक्का करें कि जांच के सभी सही और वाजिब रास्ते सचमुच अपना लिए गए हैं.
आरोप लगाया गया है कि जांच पर सबूतों के गायब होने, सर्विलांस रिकॉर्डिंग के डिलीट होने और गवाहों की मौत या उन्हें मिली धमकियों का असर पड़ा. पत्र में तर्क दिया गया है कि इन्हीं कमियों की वजह से दो आरोपियों को दोषी नहीं ठहराया जा सका. ये दावे परिवार की ओर से जांच जारी रखने की मांग का हिस्सा हैं और इन्हें अलग-अलग आपराधिक मुकदमों या सरकारी जांच से सामने आए नतीजों से अलग करके देखा जाना चाहिए. लेकिन असल चिंता साफ है: अगर इतने सालों में सबूत खो गए, गवाहों की मौत हो गई और जांच के मौके हाथ से निकल गए, तो क्या इस इतिहास को जांच रोकने की वजह माना जाए या इसे और खोजबीन जारी रखने का कारण? अब यही बात विवाद के केंद्र में है.

इस चिट्ठी की कॉपी भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, दोनों देशों के विदेश मंत्रियों, कनाडा के राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री, कनाडा और ब्रिटिश कोलंबिया के अटॉर्नी जनरल और RCMP के वरिष्ठ अधिकारियों को भी भेजी गई है. इसलिए, यह मामला अब सिर्फ़ पुलिस की अंदरूनी जांच तक सीमित नहीं रहा है.अब यह एक राजनीतिक और सार्वजनिक मुद्दा बन गया है कि कनाडा अपने आधुनिक इतिहास के सबसे काले अध्यायों में से एक से कैसे निपटना चाहता है.
एयर इंडिया बम धमाका कैसे हुआ
एयर इंडिया बम धमाका कोई गुमनाम ऐतिहासिक अपराध नहीं है.यह कनाडा के आतंकवाद के इतिहास और उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा प्रणाली के विकास में एक अहम घटना बनी हुई है. खुद प्रधानमंत्री कार्नी ने जून 2026 में 41वीं बरसी पर 329 पीड़ितों को याद किया और फ्लाइट 182 को कनाडा के इतिहास का सबसे घातक आतंकवादी हमला बताया. 23 जून 1985 को एयर इंडिया की फ़्लाइट 182 मॉन्ट्रियल से लंदन जा रही थी, तभी आयरलैंड के तट के पास अटलांटिक महासागर के ऊपर उसमें एक बम धमाका हुआ.
इस हादसे में विमान में सवार सभी 329 लोगों की मौत हो गई. मरने वालों में कनाडा, भारत और दूसरे देशों के नागरिक शामिल थे, जिनमें से ज्यादातर कनाडा के नागरिक थे. यह हमला कनाडा में हुआ अब तक का सबसे घातक आतंकवादी हमला है. लगभग उसी समय, इसी साजिश से जुड़ा एक और बम टोक्यो के नारिता एयरपोर्ट पर फटा, जिसमें सामान संभालने वाले दो कर्मचारियों की मौत हो गई.ये दोनों घटनाएं एक बड़ी अंतरराष्ट्रीय जांच का हिस्सा बनीं.
एयर इंडिया पर हुआ हमला बहुत बड़े पैमाने पर था. इसमें न सिर्फ़ बहुत से लोगों की जान गई, बल्कि इस हमले ने कनाडा की इंटेलिजेंस, सुरक्षा और कानून-व्यवस्था प्रणालियों की गंभीर कमियों को भी उजागर किया. बाद में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस जॉन मेजर की अध्यक्षता में हुई सार्वजनिक जांच में यह पता लगाया गया कि बम धमाके से पहले और बाद में क्या-क्या गड़बड़ियां हुई थीं. कनाडा सरकार ने माना है कि जांच में देश की सुरक्षा और इंटेलिजेंस व्यवस्था की बड़ी खामियों का पता चला.
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