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पाकिस्तान को अब नहीं मिलेगा रावी नदी का अतिरिक्त पानी! नए बांध से PAK को गर्मियां भारी पड़ने वाली है

Indus Water Treaty suspension: फिलहाल रावी नदी का अतिरिक्त पानी माधोपुर के रास्ते पाकिस्तान चला जाता है. लेकिन अब शाहपुर कांडी बांध इस पानी को पंजाब और जम्मू-कश्मीर की ओर मोड़ देगा.

पाकिस्तान को अब नहीं मिलेगा रावी नदी का अतिरिक्त पानी! नए बांध से PAK को गर्मियां भारी पड़ने वाली है
रावी नदी के जल पर भारत का विशेष अधिकार है
  • भारत रावी नदी के अतिरिक्त पानी को पाकिस्तान जाने से रोकने के लिए शाहपुर कांडी बांध का निर्माण लगभग पूरा हुआ
  • शाहपुर कांडी बांध के चालू होने से सिंधु नदी बेसिन की पूर्वी नदियों के पानी के उपयोग में महत्वपूर्ण बदलाव होगा
  • यह परियोजना सूखा प्रभावित कठुआ और सांबा जिलों में सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध कराएगी
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गर्मी आने वाली है और ऐसे में पाकिस्तान की पानी की समस्या और बढ़ सकती है. भारत रावी नदी का अतिरिक्त पानी पाकिस्तान जाने से रोकने की योजना बना रहा है. जम्मू-कश्मीर के मंत्री जावेद अहमद राणा के अनुसार, सिंधु जल संधि को निलंबित (सस्पेंड) किए जाने से पंजाब-जम्मू और कश्मीर सीमा पर बन रहे शाहपुर कांडी बांध का काम तेज हुआ है और यह प्रोजेक्ट अब लगभग पूरा होने वाला है. मंत्री ने कहा कि जब यह बांध चालू हो जाएगा, तो भारत रावी नदी का अतिरिक्त पानी पाकिस्तान की ओर जाने से रोक सकेगा. इससे सिंधु नदी बेसिन की पूर्वी नदियों के पानी के उपयोग में एक बड़ा और लंबे समय से इंतजार किया गया बदलाव होगा.

राणा ने बताया कि शाहपुर कांडी बांध का काम 31 मार्च तक पूरा होने की उम्मीद है और इस बांध का पानी सूखा प्रभावित कठुआ और सांबा जिलों की ओर मोड़ा जाएगा. उन्होंने पत्रकारों से कहा, “पाकिस्तान को जाने वाला अतिरिक्त पानी रोका जाएगा. इसे रोका जाना ही है. कठुआ और सांबा जिले सूखे से प्रभावित हैं और यह परियोजना, जो हमारी प्राथमिकता है, कांडी क्षेत्र के लिए बनाई जा रही है.”

शाहपुर कांडी बांध परियोजना क्या है?

फिलहाल रावी नदी का अतिरिक्त पानी माधोपुर के रास्ते पाकिस्तान चला जाता है. पाकिस्तान रावी नदी के निचले बहाव वाले हिस्से में स्थित है. लेकिन अब शाहपुर कांडी बांध इस पानी को पंजाब और जम्मू-कश्मीर की ओर मोड़ देगा.

शाहपुर कांडी बांध परियोजना की कल्पना लगभग पांच दशक पहले, 1979 में की गई थी, ताकि रावी का पानी पाकिस्तान जाने से रोका जा सके. इस परियोजना का शिलान्यास 1982 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने किया था. लेकिन पंजाब और जम्मू-कश्मीर सरकारों के बीच आपसी विवाद के कारण इसका निर्माण रुक गया. बाद में, 2008 में इस परियोजना को राष्ट्रीय परियोजना घोषित किया गया.

यह बांध 3,394.49 करोड़ रुपये की लागत से बनाया जा रहा है. इसमें से 2,694.02 करोड़ रुपये (लगभग 80 प्रतिशत) पंजाब सरकार दे रही है, जबकि बाकी 700.45 करोड़ रुपये (20 प्रतिशत) भारत सरकार द्वारा दिए जा रहे हैं. यह बांध 55.5 मीटर ऊंचा है और इसमें 7.7 किलोमीटर लंबी हाइडल नहर भी शामिल है. अधिकारियों के अनुसार, इस परियोजना से पंजाब में लगभग 5,000 हेक्टेयर और जम्मू-कश्मीर के कठुआ और सांबा जिलों में 32,173 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र की सिंचाई में मदद मिलेगी.

पूर्व सिंचाई मंत्री ताज मोहिद्दीन ने कहा कि सिंधु जल संधि इस बांध के संचालन पर लागू नहीं होती, क्योंकि रावी नदी पर भारत का पूरा अधिकार है.

सिंधु जल संधि क्या है?

23 अप्रैल 2025 को, पहलगाम में पाकिस्तान से जुड़े आतंकवादियों द्वारा 26 नागरिकों की हत्या के एक दिन बाद, भारत ने औपचारिक रूप से सिंधु जल संधि को “स्थगित” कर दिया. 1960 के बाद यह पहली बार हुआ जब भारत ने पानी से जुड़े सहयोग को पाकिस्तान द्वारा आतंकवाद को राज्य नीति के रूप में इस्तेमाल करने से सीधे तौर पर जोड़ा. यह कदम ऑपरेशन सिंदूर के साथ लिया गया और इससे भारत की पाकिस्तान नीति में साफ बदलाव दिखा- अब खून और पानी एक साथ नहीं बह सकता.

पाकिस्तान की लगभग 80 से 90 प्रतिशत खेती सिंधु नदी प्रणाली पर निर्भर है, क्योंकि उसके पास पानी जमा करने की क्षमता मुश्किल से एक महीने के प्रवाह के बराबर ही है. जब संधि लागू थी, तब पाकिस्तान को सिंधु, झेलम और चिनाब नदियों पर अधिकार था, और भारत को रावी, ब्यास और सतलुज नदियों पर. अब जब संधि स्थगित है, तो केंद्र सरकार सिंधु नदी बेसिन में कई जलविद्युत परियोजनाओं पर काम आगे बढ़ा रही है, जैसे सावलकोट, रैटल, बुरसर, पकल दुल, क्वार, किरू और कीरथाई-I और कीरथाई-II. इसी महीने की शुरुआत में भारत ने सावलकोट परियोजना का काम तेज करने का फैसला भी किया है.

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