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रूस से तेल खरीदने पर यूरोपीय देश ने दिया भारत का साथ, विदेश मंत्री बोलीं- कुछ गलत नहीं किया

जयशंकर ने साल 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद बदले वैश्विक हालातों को याद दिलाते हुए कहा कि जब रूस पर प्रतिबंध लगे, तो यूरोपीय देशों ने मिडिल ईस्ट से तेल खरीदना शुरू कर दिया.

रूस से तेल खरीदने पर यूरोपीय देश ने दिया भारत का साथ, विदेश मंत्री बोलीं- कुछ गलत नहीं किया
विदेश मंत्री एस जयशंकर ने पश्चिमी देशों के दोहरे रवैये पर भी कड़ा प्रहार किया.

यूक्रेन युद्ध के बाद से ही रूस से सस्ता कच्चा तेल खरीदने को लेकर भारत लगातार पश्चिमी देशों के निशाने पर रहा है. लेकिन अब भारत को इस मामले में एक ऐसे देश का साथ मिला है, जिसकी उम्मीद शायद किसी को नहीं थी. यूरोपीय देश फिनलैंड ने खुलकर भारत का बचाव किया है और साफ कहा है कि भारत ने कुछ भी गलत नहीं किया है, बल्कि उसने पश्चिमी देशों की ओर से तय की गई 'प्राइस कैप' के नियमों के भीतर रहकर ही तेल खरीदा है. फिनलैंड की विदेश मंत्री एलिना वाल्टोनेन ने साफ किया कि प्रतिबंधों का मकसद दुनिया को रूसी तेल खरीदने से रोकना कभी था ही नहीं.

'प्राइस कैप' के नियमों में रहकर ही भारत ने खरीदा तेल: फिनलैंड 

फिनलैंड में आयोजित 'कुल्तारंता टॉक्स' के दौरान विदेश मंत्री एलिना वाल्टोनेन ने संयुक्त अरब अमीरात (UAE) की सहायक विदेश मंत्री लाना नुसेइबेह और भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर की मौजूदगी में यह बात कही. वाल्टोनेन ने कहा, "भारत के बचाव में मैं यही कहूंगी कि उसने प्राइस कैप के तहत ही तेल खरीदा है और इस नीति का असली मकसद भी यही था." उन्होंने समझाया कि जब पश्चिमी देशों ने रूसी तेल पर प्राइस कैप लगाई थी, तो उसका मकसद वैश्विक ऊर्जा बाजार को बिगाड़ना नहीं था.

एलिना वाल्टोनेन ने आगे कहा कि हम दुनिया को रूसी तेल खरीदने से पूरी तरह प्रतिबंधित नहीं करना चाहते थे. हमारी कोशिश सिर्फ इतनी थी कि दुनिया भर में तेल की सप्लाई भी न रुके और रूस को इस खेल में मोटा मुनाफा कमाने का मौका भी न मिले. फिनलैंड की तरफ से आया यह बयान भारत के लिए एक बड़ी कूटनीतिक जीत माना जा रहा है, क्योंकि अब तक कई यूरोपीय देश भारत के इस फैसले की आलोचना करते आए हैं.

मजबूरी में लिया गया फैसला, राजनीति से कोई लेना-देना नहीं: जयशंकर

इस मंच पर मौजूद भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने भी हमेशा की तरह बेहद बेबाकी से भारत का पक्ष रखा. उन्होंने साफ किया कि भारत का रूस से तेल खरीदने का फैसला पूरी तरह से आर्थिक जरूरतों पर आधारित था, इसका राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है. जयशंकर ने कहा, "मैं तेल की कीमत और उसकी उपलब्धता को देखकर खरीदारी करता हूं, न कि किसी राजनीतिक समीकरण को देखकर."

जयशंकर ने साल 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद बदले वैश्विक हालातों को याद दिलाते हुए कहा कि जब रूस पर प्रतिबंध लगे, तो यूरोपीय देशों ने मिडिल ईस्ट से तेल खरीदना शुरू कर दिया. मिडिल ईस्ट पारंपरिक रूप से भारत का मुख्य तेल सप्लायर था. जब यूरोप ने वहां का रुख किया, तो बाजार में कच्चे तेल की भारी किल्लत हो गई. ऐसे में परिस्थितियों ने भारत को रूस से तेल खरीदने की दिशा में धकेला.

अमेरिका ने खुद कहा था कि भारत रूसी तेल खरीदे: विदेश मंत्री

विदेश मंत्री ने पश्चिमी देशों के दोहरे रवैये पर भी कड़ा प्रहार किया. उन्होंने एक बड़ा खुलासा करते हुए कहा, "उस समय खुद अमेरिका ने खास तौर से भारत से रूसी तेल खरीदने के लिए कहा था, ताकि वैश्विक तेल बाजार में स्थिरता बनी रहे और कीमतें आसमान न छुएं." 

उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि जब स्थितियां ऐसी थीं, तो अब किसी को भी इस मामले में कोई बड़ा नैतिक सिद्धांत दिखाने का ढोंग नहीं करना चाहिए.

जयशंकर यहीं नहीं रुके, उन्होंने यूक्रेन युद्ध को लेकर भारत की विदेश नीति पर सवाल उठाने वाले यूरोपीय देशों को उनके पुराने इतिहास की याद दिलाई. यूरोप की आलोचना का मुंहतोड़ जवाब देते हुए उन्होंने कहा, "यूरोपीय देश सालों से उन देशों को हथियार बेचते आए हैं, जिनका इस्तेमाल भारत पर हमलों के लिए किया गया. इसके उलट, हम भारतीयों ने कभी भी ऐसा कुछ नहीं किया जिससे यूरोप की सुरक्षा को कोई खतरा पैदा हो. इसलिए दूसरों पर उंगली उठाने से पहले यूरोप को यह बात हमेशा ध्यान में रखनी चाहिए."

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