- बांग्लादेश ने पश्चिम बंगाल में बीजेपी की जीत को तीस्ता जल बंटवारा समझौते के आगे बढ़ने का अवसर माना है.
- बीएनपी ने ममता बनर्जी की सरकार पर तीस्ता समझौते को रोकने का आरोप लगाते हुए नए नेतृत्व से उम्मीद जताई है.
- बीजेपी की जीत पर बीएनपी ने सकारात्मक प्रतिक्रिया देते हुए बेहतर द्विपक्षीय संबंधों की आशा जताई.
पश्चिम बंगाल में बीजेपी की जीत का असर अब सीमाओं के पार भी दिखने लगा है. बांग्लादेश की सियासत में इसे एक बड़े मौके के तौर पर देखा जा रहा है. खासकर बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) ने इस नतीजे का खुलकर स्वागत किया है और उम्मीद जताई है कि अब भारत-बांग्लादेश के बीच लंबे समय से अटका तीस्ता जल बंटवारा समझौता आगे बढ़ सकता है.
ममता सरकार पर ठीकरा, नई सरकार से उम्मीद
BNP ने सीधे तौर पर ममता बनर्जी पर निशाना साधते हुए कहा कि उनकी सरकार की आपत्तियों की वजह से ही तीस्ता समझौता अब तक अटका रहा. ढाका का मानना है कि राज्य स्तर की राजनीतिक असहमति ने इस अहम द्विपक्षीय समझौते को आगे बढ़ने नहीं दिया. अब सत्ता परिवर्तन के बाद माहौल बदलने की उम्मीद जताई जा रही है.
सुवेंदु अधिकारी और बीजेपी नेतृत्व की तारीफ
BNP के नेताओं ने सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व में बीजेपी की जीत की सराहना की है. पार्टी के सूचना सचिव अज़ीजुल बारी हेलाल ने कहा कि नए नेतृत्व के साथ भारत और बांग्लादेश के बीच रिश्ते और बेहतर हो सकते हैं. उन्होंने उम्मीद जताई कि राज्य और केंद्र के बीच तालमेल से अब इस मुद्दे पर प्रगति संभव है.
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तीस्ता समझौता क्यों है अहम?
तीस्ता नदी दोनों देशों के बीच जल बंटवारे का एक बड़ा और संवेदनशील मुद्दा रहा है. भारत और बांग्लादेश के बीच इस पर कई बार सहमति बनने के करीब हालात बने, लेकिन पश्चिम बंगाल सरकार के विरोध के चलते इसे लागू नहीं किया जा सका. 2011 में प्रस्तावित समझौते के तहत बांग्लादेश को 37.5% और भारत को 42.5% पानी देने की बात थी, लेकिन यह योजना आगे नहीं बढ़ पाई.
बदलते समीकरण के क्या रणनीतिक मायने
बांग्लादेश का मानना है कि नरेंद्र मोदी सरकार और नई बंगाल सरकार के बीच बेहतर तालमेल से यह डील अब संभव हो सकती है. दोनों देशों के बीच 54 साझा नदियां हैं, लेकिन अब तक सिर्फ गंगा और कुशियारा पर ही समझौते हो पाए हैं. ऐसे में बंगाल की सत्ता में बदलाव को ढाका एक 'पॉजिटिव डेवलपमेंट' के तौर पर देख रहा है, जहां राजनीति से ज्यादा अब सहयोग की उम्मीद जताई जा रही है.
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केंद्र सरकार की भूमिका तय करेगी आगे की राह
विशेषज्ञों का मानना है कि तीस्ता समझौते जैसे मसले पर अंतिम मुहर केंद्र और राज्य सरकार के बीच समन्वय पर ही निर्भर करेगी. भले ही पश्चिम बंगाल में नई सरकार बनने से राजनीतिक बाधाएं कम हों, लेकिन जल बंटवारा, कृषि जरूरतों और स्थानीय हितों को ध्यान में रखते हुए व्यापक सहमति बनाना आसान नहीं होगा. ऐसे में आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि दिल्ली और कोलकाता मिलकर इस लंबे समय से लंबित मुद्दे को किस तरह सुलझाते हैं और क्या यह बदलाव वास्तव में भारत-बांग्लादेश संबंधों में नई गति ला पाता है.
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