मिडिल ईस्ट में जारी तनाव और कच्चे तेल की सप्लाई पर पड़े असर ने सिर्फ बड़े देशों को ही नहीं, बल्कि दक्षिण एशिया की अर्थव्यवस्थाओं को भी हिला दिया. ऐसे वक्त में भारत ने एक बार फिर 'नेबरहुड फर्स्ट' नीति को जमीन पर उतारते हुए बांग्लादेश का साथ दिया.
डीजल संकट में भारत बना सहारा
बांग्लादेश के विदेश मंत्री खलीलुर रहमान ने NDTV को दिए इंटरव्यू में खुलासा किया कि युद्ध के कारण कच्चे तेल की आपूर्ति बाधित होने लगी थी, जिससे उनके देश में ऊर्जा संकट गहराने लगा. बांग्लादेश ने भारत से डीजल सप्लाई बढ़ाने की गुजारिश की. नई दिल्ली ने तुरंत प्रतिक्रिया दी. दोनों देशों के बीच मौजूद पाइपलाइन के जरिए डीजल की आपूर्ति जारी रही. रहमान ने बताया कि भारत ने अपने घरेलू जरूरतों को प्राथमिकता देते हुए भी बांग्लादेश की मदद का भरोसा दिया और सप्लाई बढ़ाने का आश्वासन दिया.

रिश्ते नए नहीं, भरोसे की नींव पुरानी
नई दिल्ली और ढाका के रिश्ते किसी औपचारिक कूटनीति से कहीं आगे जाते हैं. साझा नदियां, साझा सीमाएं और सांस्कृतिक नजदीकी इस रिश्ते को खास बनाती हैं. 26 मार्च को दिल्ली में बांग्लादेश के नेशनल डे पर दोनों देशों के राष्ट्रीय गान का लाइव प्रदर्शन हुआ. इसे रहमान ने 'मजबूत रिश्तों की झलक' बताया. दोनों देश धीरे-धीरे लेकिन मजबूती से रिश्तों को आगे बढ़ाने के फॉर्मूले पर काम कर रहे हैं.
ऊर्जा संकट: रिश्तों की असली परीक्षा
मिडिल ईस्ट संकट के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार में आई उथल-पुथल ने भारत-बांग्लादेश रिश्तों को परखने का मौका दिया. बांग्लादेश जैसे देशों पर क्रूड सप्लाई चेन का दबाव साफ दिखा. भारत की तेजी से की गई मदद को रिश्तों के 'रीसेट' का संकेत माना जा रहा है.
गंगा से जल कूटनीति तक

बताते चलें कि 1996 में हुई गंगा जल संधि अब फिर से रिनिगोशिएशन के दौर में है. रहमान के मुताबिक, 'पानी सीमित है, लेकिन गंगा जीवन है.' जल बंटवारा सिर्फ संसाधन नहीं, बल्कि सभ्यताओं को जोड़ने वाला बंधन है. दोनों देशों के लिए क्लाइमेट रेजिलिएंस आने वाले 30 साल की साझेदारी का आधार बन सकता है.
चीन पर भी साफ संदेश
रहमान ने यह भी स्पष्ट किया कि बांग्लादेश की विदेश नीति किसी एक देश के खिलाफ नहीं है. चीन के साथ संबंधों को लेकर कहा कि यह जीरो-सम गेम नहीं. भारत को बाहरी पार्टनर नहीं बल्कि संरचनात्मक साझेदार बताया.
ऊर्जा संकट के दौर में भारत की त्वरित मदद ने यह साफ कर दिया कि नई दिल्ली और ढाका के रिश्ते सिर्फ कागज़ी नहीं हैं. जब हालात मुश्किल होते हैं, तो यही रिश्ते असली ताकत बनते हैं और इस बार भी भारत ने पड़ोसी धर्म निभाने में कोई देर नहीं की.
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