- कच्चे तेल की कीमतों में बड़ी गिरावट ने ट्रंप सरकार को ईरान के साथ बातचीत में अचानक एक बड़ी बढ़त दे दी है
- ब्रेंट क्रूड की कीमत $70-75 प्रति बैरल के आसपास गिर गई- यह युद्ध शुरू होने से 2 हफ्ते पहले की कीमत से भी कम है
- इससे अमेरिका पर ईरान के साथ जल्दबाजी में और ईरान के पक्ष में कोई समझौता करने का दबाव कम हो गया है
क्या ईरान का सबसे बड़ा हथियार उसके हाथ से छिटक गया है? अमेरिका और ईरान में जब फुल स्केल पर जंग चल रही थी, तब होर्मुज का अहम शिपिंग रूट ईरान के लिए ब्रह्मास्त्र बन गया. ईरान के हाथ एक ऐसा हथियार लग गया जिसके दम पर उसने दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति अमेरिका को सीजफायर करने और बातचीत की मेज पर बैठने को मजबूर कर दिया. खुद अमेरिका की खुफिया एजेंसियों ने आकलन किया कि ईरान के हाथ में होर्मुज के रूप में परमाणु हथियार से भी बड़ा हथियार लग गया है. तेल की मंहगाई ऐसी हुई कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप खुद बैकफुट पर आ गए और नवंबर में होने जा रहे मिडटर्म इलेक्शन से पहले उन्हें अपनी कुर्सी कमजोर होती दिखी. उन्होंने बड़ी मशक्कत की और ईरान से साथ समझौता (मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग, MoU) किया. एक फाइनल डील करने के लिए बातचीत चल रही है. लेकिन अब कहानी पलटती दिख रही है.
एक्सपर्ट्स मान रहे हैं कि पिछले कुछ हफ्तों में कच्चे तेल की कीमतों में आई बड़ी गिरावट ने ट्रंप सरकार को ईरान के साथ चल रही बातचीत में एक बड़ी बढ़त दे दी है.
कहानी कैसे पलट गई है?
सीएनएन की एक एनालिसिस में डेविड गोल्डमैन ने लिखा है कि अपनी नेवी और एयर फोर्स के बर्बाद हो जाने के बावजूद, ईरान ने ताकत दिखाई, उसने सस्ते ड्रोन और विस्फोटक से भरी स्पीडबोट से तेल जहाजों को धमकाकर होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद कर दिया. होर्मुज में तेल टैंकरों की आवाजाही एकदम बंद कर दिया थी. इस लगातार बने हुए खतरे के कारण मार्च, अप्रैल और मई में तेल की कीमतें ऊंची बनी रहीं, जिससे गैस की कीमतें बढ़ गईं और दुनिया भर में तेल का स्टॉक खतरनाक रूप से कम हो गया.
लगातार सस्ता होता जाएगा क्रूड ऑयल
इस एनालिसिस के अनुसार कच्चे तेल का भंडार अभी भी कम है और तेल बाजार अभी पूरी तरह ट्रंप सरकार की उम्मीद के मुताबिक नहीं पहुंचा है. लेकिन तेल की कीमतों में आई बड़ी गिरावट से अमेरिका पर ईरान के साथ जल्दबाजी में और ईरान के पक्ष में कोई समझौता करने का दबाव कम हो गया है. इससे ट्रंप प्रशासन को बातचीत के लिए जरूरी समय मिल गया है.
विशेषज्ञों का मानना है कि युद्ध से पहले जितनी तेल की मांग थी, वह शायद अब कभी वापस न आए. खासकर चीन और यूरोप में इलेक्ट्रिक कार (और ऐसी ही तकनीकों) के बढ़ते इस्तेमाल से तेल की जरूरत कम हो रही है. अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी का अनुमान है कि अगले साल तेल की मांग सिर्फ करीब 20 लाख बैरल प्रतिदिन बढ़ेगी, जबकि सप्लाई 80 लाख बैरल प्रतिदिन बढ़ सकती है. यानी दुनिया में जरूरत से कहीं ज्यादा तेल उपलब्ध हो जाएगा. इसी वजह से जेपी मॉर्गन का मानना है कि अगले साल तेल की कीमत 60 डॉलर प्रति बैरल तक आ सकती है. वहीं कैपिटल इकोनॉमिक्स के अर्थशास्त्री किरन टॉम्पकिन्स का कहना है कि 2028 तक तेल की कीमत 50 डॉलर प्रति बैरल तक गिर सकती है.
जेडी वेंस ने पत्ते पहले ही खोल दिए?
पिछले हफ्ते एक इंटरव्यू में अमेरिकी राष्ट्रपति जेडी वेंस खुद यह बात मानते दिखे. वेंस ने कहा था, "मुझे लगता है कि राष्ट्रपति ने हमसे जो करने के लिए कहा है, वह यह है कि इस MOU का इस्तेमाल करके दुनिया की तेल अर्थव्यवस्था और कुछ स्टॉक को फिर से भरा जाए, और फिर देखा जाए कि (ईरान का) अगला कदम क्या होता है."
यानी जिस होर्मुज ने कुछ हफ्ते पहले अमेरिका को झुकने पर मजबूर कर दिया था, वही अब खुलने के बाद धीरे-धीरे अपना असर खोता दिख रहा है. अगर तेल की कीमतें अभी के लिए 70 डॉलर से आसपास बनी रहीं और आने वाले वर्षों में 60 या 50 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गईं, तो बातचीत की मेज पर सबसे मजबूत पत्ता ईरान नहीं, बल्कि अमेरिका के हाथ में हो सकता है. लेकिन इसको देखने का एक नजरिया यह भी हो सकता है कि ईरान कहीं खुद को दबाव में देखकर होर्मुज के समुद्री गलियारे को फिर न बांधने लगे.
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