- तेल की कीमतों में उछाल से ईरान, ओमान और सऊदी अरब की कमाई बढ़ी.
- इराक और कुवैत, जिनके पास वैकल्पिक रास्ते नहीं हैं, उनकी कमाई बुरी तरह गिरी.
- सऊदी और यूएई की पाइपलाइन ने असर कम किया, हालांकि यूएई की कमाई थोड़ी घटी.
हॉर्मुज स्ट्रेट के बंद होने और इसके चलते तेल की वैश्विक कीमतों में आई तेज उछाल ने ईरान, ओमान और सऊदी अरब को जबरदस्त आर्थिक फायदा पहुंचाया है, जबकि जिन देशों के पास तेल भेजने के वैकल्पिक रास्ते नहीं हैं, उन्हें अरबों डॉलर का नुकसान हुआ है, यह एक अंतरराष्ट्रीय मीडिया विश्लेषण में सामने आया है. फरवरी के आखिर में अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए हवाई हमलों के बाद बढ़ते संघर्ष के चलते ईरान ने हॉर्मुज स्ट्रेट को प्रभावी रूप से बंद कर दिया. यह वही रास्ता है जहां से दुनिया के करीब पांचवें हिस्से का तेल और एलएनजी गुजरता है.
बाद में ईरान ने कहा कि वह उन जहाजों को गुजरने देगा जिनका अमेरिका या इजरायल से कोई संबंध नहीं है. इसके चलते कुछ टैंकर इस संकरे रास्ते से निकलने में सफल भी रहे, लेकिन इसके बावजूद ऊर्जा बाजार में बीते कुछ दशकों की सबसे बड़ी हलचल बनी रही. मार्च में अंतरराष्ट्रीय ब्रेंट क्रूड की कीमत करीब 60 प्रतिशत तक बढ़ गई, जो एक रिकॉर्ड उछाल है.
जब से ईरान पर इजरायल और अमेरिका के संयुक्त हमले ने इस 21 से 24 मील चौड़े समुद्री रास्ते पर अपना गहरा असर डालना शुरू किया है, पूरे एशिया में तेल और गैस का गहरा संकट खड़ा हो गया है. सप्लाई चेन करीब-करीब पूरी तरह से टूट गया है और इससे तेल-गैस की कीमतें आसमान छूने लगी हैं.
ग्लोबल इकोनॉमिक शॉक
बीते कुछ दशकों का यह सबसे बड़ा ग्लोबल इकोनॉमिक शॉक बन गया है. ईरान पर इजरायल-अमेरिका के हमलों के बाद तेजी से बिगड़ते हालात के बीच ईरान ने हॉर्मुज स्ट्रेट पर अपने नियंत्रण और कड़े कर दिए हैं. हालांकि उसने कुछ जहाजों को गुजरने की अनुमति दी पर ये वो ही जहाज थे जिनका अमेरिका या इजरायल से किसी भी तरह का कोई लेना-देना नहीं था. उसने संकेत दे दिए थे कि वहां सप्लाई कभी भी रुक सकती है. यही डर पूरे बाजार में सबसे बड़ा ट्रिगर पॉइंट बना.
नतीजा यह हुआ कि मार्च 2026 में ब्रेंट क्रूड की कीमतों में लगभग 60% का उछाल देखने को मिला. यहां केवल सप्लाई कम होना ही असरकारी नहीं था, बल्कि इसमें अनिश्चितता का प्रीमियम जुड़ा हुआ था. उसी दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को चेतावनी दी कि अगर उसने समझौता नहीं किया तो वह उस पर कड़ी कार्रवाई करेंगे, ताकि हॉर्मुज से जहाजों की आवाजाही फिर से शुरू हो सके. पर ईरान पर ट्रंप की धमकियों का कोई असर नहीं हुआ.
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हॉर्मुज खोलने की जो चेतावनी दी उसके बाद एक ईरानी अधिकारी ने कहा था कि ईरान अस्थायी युद्धविराम के हिस्से के रूप में भी हॉर्मुज को नहीं खोलेगा. ईरान का साफ तौर पर यह कहना है कि वह अपमान नहीं सहेगा. कुछ जानकारों का मानना है कि अमेरिका और इजरायल के साथ युद्ध ने कुछ हद तक ईरान की स्थिति को और मजबूत किया है. एक थिंक टैंक से जुड़े जानकार ने कहा कि अब जब हॉर्मुज बंद हो चुका है, तो इसे बार-बार बंद किया जा सकता है, और यह वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा खतरा है. यानी अब यह खतरा स्थायी बन चुका है.
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी ने इस संघर्ष को अब तक का सबसे बड़ा ऊर्जा आपूर्ति झटका बताया है. इसके मुताबिक रोजाना 12 मिलियन बैरल से ज्यादा सप्लाई प्रभावित हुई है और करीब 40 ऊर्जा ठिकानों को नुकसान पहुंचा है.
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खाड़ी देशों पर क्या असर?
आज भी किसी को यह नहीं पता है कि यह संकट कितने दिनों तक चलेगा. ऐसे में तेल की कीमतें पिछले एक महीने से लगातार 105 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर ही बनी हुई हैं. पूरे विश्व में तेल की बढ़ी कीमतों ने आम-जनजीवन पर अपना असर दिखाना शुरू कर दिया है. वहीं खाड़ी के तेल सप्लायर देश भी इससे अछूते नहीं रहे. हालांकि मध्य-पूर्व के तेल उत्पादक देशों पर इसका असर उनके भूगोल के आधार पर अलग-अलग पड़ रहा है.
हॉर्मुज पर नियंत्रण ईरान के पास है, लेकिन ओमान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात अपने तेल को पाइपलाइन और दूसरे बंदरगाहों के जरिए इस रास्ते को बायपास कर सकते हैं. इसके उलट इराक, कुवैत और कतर जैसे देशों का तेल फंस गया क्योंकि उनके पास एशियाई बाजारों तक पहुंचने के लिए कोई दूसरा रास्ता नहीं है.
इराक और कुवैत की तेल निर्यात से होने वाली अनुमानित कमाई में साल दर साल करीब तीन चौथाई की गिरावट आई है. इसके उलट ईरान की कमाई में 37 प्रतिशत और ओमान की कमाई में 26 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है. सऊदी अरब की तेल आय में 4.3 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई, जबकि यूएई की कमाई में 2.6 प्रतिशत की गिरावट आई क्योंकि कम सप्लाई के बावजूद कीमतों में उछाल ने कुछ हद तक नुकसान की भरपाई कर दी.
ये अनुमान जहाजों की ट्रैकिंग करने वाली कंपनी केप्लर के डेटा और अन्य उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर लगाए गए हैं, जिनमें औसत ब्रेंट कीमत को ध्यान में रखकर तुलना की गई है.
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सऊदी अरब को ज्यादा रॉयल्टी और टैक्स
सऊदी अरब के लिए तेल की बढ़ी कीमतों का मतलब है कि उसे अपनी सरकारी तेल कंपनी से ज्यादा रॉयल्टी और टैक्स मिलेगा. यह कंपनी ज्यादातर सरकार और उसके सॉवरेन फंड के नियंत्रण में है. यह बढ़त सऊदी अरब के लिए इसलिए भी अहम है क्योंकि उसने हाल के वर्षों में तेल पर निर्भरता कम करने के लिए बड़े प्रोजेक्ट्स पर काफी खर्च किया है, जिससे उसके बजट पर दबाव आया था.
सऊदी की पाइपलाइन बनी ढाल, पर खतरा बरकरार
सऊदी अरब की सबसे बड़ी ताकत उसकी 1200 किलोमीटर लंबी ईस्ट वेस्ट पाइपलाइन है, जिसे 1980 के दशक में ईरान इराक युद्ध के दौरान बनाया गया था ताकि हॉर्मुज को बायपास किया जा सके. यह पाइपलाइन देश के पूर्वी तेल क्षेत्रों को रेड सी के यनबू पोर्ट से जोड़ती है और फिलहाल अपनी पूरी क्षमता के करीब काम कर रही है. सऊदी अरब घरेलू इस्तेमाल के लिए करीब 2 मिलियन बैरल तेल रोजाना इस्तेमाल करता है, जबकि करीब 5 मिलियन बैरल निर्यात के लिए उपलब्ध रहता है.

मार्च के तीसरे हफ्ते में यनबू से तेल की लोडिंग लगभग पूरी क्षमता पर रही, भले ही इस पोर्ट को निशाना बनाने की कोशिशें भी हुईं. कुल मिलाकर सऊदी का तेल निर्यात साल दर साल 26 प्रतिशत घटकर 4.39 मिलियन बैरल प्रतिदिन रह गया, लेकिन ऊंची कीमतों की वजह से उसकी कमाई में करीब 558 मिलियन डॉलर की बढ़ोतरी हुई. जानकारों का कहना है कि पाइपलाइन होने के बावजूद सऊदी अरब पूरी तरह सुरक्षित नहीं है. उनका मानना है कि लाल सागर के रास्ते पर उसके बनाए गए बुनियादी ढांचों और जहाजों को यमन के हूती और ईरान समर्थित समूह निशाना बना सकते हैं.
इराक को सबसे बड़ा झटका
खाड़ी देशों में इराक को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है. उसकी तेल आय 76 प्रतिशत गिरकर करीब 1.73 बिलियन डॉलर रह गई. कुवैत की कमाई में भी 73 प्रतिशत की गिरावट आई और यह करीब 864 मिलियन डॉलर रह गई. इराक की सरकारी तेल कंपनी ने भी माना कि मार्च में उसकी कमाई करीब 2 बिलियन डॉलर के आसपास रही, जो अनुमान के करीब है. जानकारों की नजह में अप्रैल के महीने में इन देशों की स्थिति और भी खराब हो सकती है, इसकी वजह यह है कि मार्च के आंकड़े जो थोड़ी बहुत सप्लाई दिखा भी रहे हैं वो इस महीने की शुरुआती तारीखों के हैं. बाद में यह पूरी तरह ठप्प रहा. हालांकि हाल ही में इराक का एक तेल जहाज हॉर्मुज से गुजर सका क्योंकि ईरान ने उसे कुछ छूट दी थी. ऐसे में यह भी उम्मीद की जा रही है कि ईरान अगर समझदारी से काम ले तो दुनियाभर में पैदा हुए इस हालात से निपटा जा सकता है.
सरकारों के पास क्या हैं विकल्प?
अब चूंकि यह संकट लंबा खिंच रहा है और इससे आर्थिक झटके लगने शुरू हो गए हैं तो इससे निपटने के लिए खाड़ी देशों की इन सरकारों के पास विकल्प क्या हैं. एक, वह अपनी बचत का इस्तेमाल कर सकती हैं. दो, वो बाजार से कर्ज ले सकती हैं. ये सभी तेल उत्पादक देश हैं, जहां कर्ज उनकी अर्थव्यवस्था के मुकाबले अधिक नहीं है. लिहाजा कुछ समय के लिए ये इस तेल संकट को संभाल सकते हैं. लेकिन लंबी अवधि में इसका क्या असर होगा यह अभी स्पष्ट नहीं है. कुछ तेल कंपनियां और पश्चिमी देश अब ऊर्जा सुरक्षा के लिए फॉसिल फ्यूल में निवेश बढ़ाने की बात कर रहे हैं. लेकिन जानकार मानते हैं कि असली समाधान अक्षय ऊर्जा है. इसी दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए फ्रांस की टोटलएनर्जी और यूएई की मसदर कंपनी ने एशिया के नौ देशों में 2.2 बिलियन डॉलर का ग्रीन एनर्जी प्रोजेक्ट शुरू करने का फैसला किया है.
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