- भारत की बहु-संरेखण विदेश नीति विभिन्न वैश्विक शक्तियों के साथ संबंध बनाए रखने र आधारित है
- भारत ने खाड़ी देशों पर हमलों की निंदा की, लेकिन ईरान पर हुए हमलों की सीधे तौर पर निंदा नहीं की
- सतर्क कूटनीति के कारण भारत ने विभिन्न पक्षों के साथ संबंध बनाए रखते हुए गंभीर नुकसान से बचाव किया है
पश्चिम एशिया में लगातार जारी तनाव के बीच भारत हाल के सालों में अपनी विदेश नीति की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक का सामना कर रहा है. ईरान, इज़रायल और कई खाड़ी देशों से जुड़े संघर्ष ने एक बार फिर भारत के एक साथ कई वैश्विक शक्तियों के साथ संबंध बनाए रखने की रणनीति पर ध्यान केंद्रित किया है.एनडीटीवी ने इस संकट से निपटने के भारत के तरीकों और इससे पैदा चुनौतियों के बारे में बातचीत की भारत सरकार की वरिष्ठ नीति विशेषज्ञ दिव्या सिंह राठौर और स्वामी श्रद्धानंद कॉलेज के सहायक प्रोफेसर (अतिथि) अभिषेक भारती से. जानें दोनों ने इस संकट को लेकर क्या कहा?
वैश्विक तनाव के बीच कैसा है भारत का नजरिया?
दिव्या सिंह राठौर ने कहा कि भारत का नजरिया बहु-संरेखण नीति पर आधारित है. यह ऐसी नीति है जिसमें नई दिल्ली अपने हितों की रक्षा करते हुए एक ही समय में विभिन्न वैश्विक शक्ति केंद्रों के साथ संबंध बनाए रखती है. गुटनिरपेक्षता की पुरानी धारणा के विपरीत, भारत आज एक साथ कई प्रतिस्पर्धी गुटों के साथ काम करता है.
उन्होंने कहा कि भारत, अमेरिका और जापान के साथ क्वाड का हिस्सा है, रूस और चीन के साथ ब्रिक्स में एक्टिव है और शंघाई सहयोग संगठन का सदस्य है. इज़रायल के साथ रणनीतिक संबंध बनाए रखे हैं और ईरान में दीर्घकालिक संपर्क और बंदरगाह हित भी रखता है. दिव्या ने कहा कि बहुत कम देश एक ही समय में इतने सारे कॉम्पटिशन ग्रुप्स के साथ संबंधों को बैलेंस करने की कोशिश कर रहे हैं.
खाड़ी देशों पर हमलों की निंदा, लेकिन ईरान हमलों की नहीं
उन्होंने कहा कि मौजूदा संघर्ष ने इस नीति को हाई लिमिट्स पर पहुंचा दिया है. तनाव बढ़ने के बाद विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने ईरानी नेतृत्व के साथ कई बार बातचीत की. मिसाइल हमलों से प्रभावित खाड़ी क्षेत्र के नेताओं से पीएम मोदी ने भी बात की. भारत ने खाड़ी देशों पर हमलों की निंदा करने वाले संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव का सह-प्रायोजन भी किया, लेकिन ईरान पर हुए हमलों की सीधे तौर पर निंदा नहीं की.
दिव्या ने कहा कि भारत ने ये कदम बहुत ही सोच-समझकर उठाया, क्योंकि इस क्षेत्र में भारत के हित बहुत ही संवेदनशील हैं. खाड़ी देशों में करीब 90 लाख भारतीय रहते और काम करते हैं. जो पैसा वह भारत में भेजते हैं, वह देश की प्रेषण अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा है. उन्होंने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से होकर गुजरने वाली ऊर्जा आपूर्ति पर चिंता और ईरान में चाबहार पोस्ट परियोजना में भारत के निवेश के महत्व का भी जिक्र किया. दिव्या ने कहा कि एक सीधा और आक्रामक सार्वजनिक रुख श्रमिकों, व्यापार मार्गों और दीर्घकालिक रणनीतिक परियोजनाओं को प्रभावित कर सकता था.
कूटनीति के सहारे संबंधों को बचाने की कोशिश
वहीं अभिषेक भारती ने कहा कि सतर्क कूटनीति की वजह से ही भारत अब तक दशकों से बने संबंधों को गंभीर नुकसान से बचा सका है. उनके मुताबिक, नई दिल्ली ने संघर्ष में शामिल सभी पक्षों के साथ संपर्क बनाए रखते हुए एक सार्वजनिक रुख अपनाने से बचने की कोशिश की. भारत की ये कोशिश ऐसी स्थिति को रोकना था, जहां एक बयान से कई रणनीतिक साझेदारियों को एक साथ नुकसान पहुंच सकता था.
दोनों ही एक्सपर्ट्स का मानना है कि मिडिल ईस्ट संकट ने भारत की विदेश नीति और रणनीति की कमज़ोरियों को भी उजागर कर दिया है. दिव्या राठौर का कहना है कि भारत की बढ़ती राजनयिक पहुंच के बावजूद भी नई दिल्ली अहम सीजफायर वार्ताओं का हिस्सा नहीं बन सका. उन्होंने भारत की भागीदारी वाले नेवल एक्सरसाइज के बाद एक ईरानी फ्रिगेट के डूबने का जिक्र करते हुए कहा कि इस घटनाक्रम ने भारत के उस क्षेत्र में प्रभाव पर सवाल खड़े किए हैं जिसे वह एक महत्वपूर्ण सुरक्षा क्षेत्र मानता है.
विवादास्पद घटनाओं पर भारत की चुप्पी पर सवाल
अभिषेक भारती ने कहा कि भारत संघर्ष के दौरान कुछ विवादास्पद घटनाओं पर काफी हद तक चुप रहा है, जिसमें परमाणु वार्ता के एक संवेदनशील चरण के दौरान ईरान के सर्वोच्च नेता खामेनेई की हत्या भी शामिल है. उनके मुताबिक, रणनीतिक चुप्पी से तनाव बढ़ने से तो बचा जा सकता है, लेकिन इससे अंतरराष्ट्रीय मानदंडों और संप्रभुता पर भारत के रुख की निरंतरता पर भी सवाल उठ रहे हैं.
विशेषज्ञों ने कहा कि वैश्विक स्तर पर ये बात उठ रही है कि जब दुनिया प्रतिद्वंद्वी गुटों में बंटने लगती है, क्या तब भी बहुसंरेखण की नीति कायम रह सकती है. हालांकि, दिव्या राठौर ने तर्क दिया कि विकल्प भी उतने ही जोखिम भरे हैं. उन्होंने कहा कि इज़रायल के खिलाफ खुलकर बोलने से भारत के रणनीतिक और रक्षा संबंधों को नुकसान पहुंच सकता है, जबकि पश्चिम का साथ पूरी तरह देने से ईरान और रूस के साथ संबंध बिगड़ सकते हैं. उन्होंने कहा कि बहुसंरेखण नीति चुनौतियों के बावजूद, भारत को सभी पक्षों के साथ बातचीत करने का मौका देती है.
भारत के पास अब बड़ी राजनयिक भूमिका निभाने का मौका
भविष्य को देखते हुए, दोनों एक्सपर्ट्स को लगता है कि भारत के पास अब एक बड़ी राजनयिक भूमिका निभाने का मौका है. दिव्या ने कहा कि इस साल ब्रिक्स की अध्यक्षता भारत के हाथ में होने की वजह से नई दिल्ली यीजफायर और पुनर्निर्माण कोशिशों के लिए वैश्विक दक्षिण के नेतृत्व वाले ढांचे पर जोर दे सकती है. उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि भारत को प्रतिद्वंद्वी पक्षों के बीच गुप्त वार्ता के लिए खुद को औपचारिक रूप से एक मंच के रूप में पेश करना चाहिए.
वहीं अभिषेक भारती ने सुरक्षा के मोर्चे को लेकर इस बात पर जोर दिया कि भारत को हिंद महासागर में अपनी क्षमताओं को मजबूत करना चाहिए. अगर भारत इस क्षेत्र में एक सुरक्षा प्रदाता के रूप में अपनी छवि बनाना चाहता है, तो उसे संकटों के दौरान प्रभावी ढंग से प्रतिक्रिया देने की क्षमता भी विकसित करनी होगी.
संकट के समय भारत अपने हितों की रक्षा करने में सफल
दोनों विशेषज्ञों ने इस बात पर सहमति जताई कि भारत ने संकट के समय अपने तात्कालिक हितों की रक्षा करने में कामयाबी हासिल की है, जिसमें विदेशों में रहने वाले भारतीयों की सुरक्षा और अहम आर्थिक संबंध शामिल हैं. उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि भारत के लिए असली चुनौती यह होगी कि क्या वह कूटनीतिक संतुलन को भविष्य में दीर्घकालिक रणनीतिक प्रभाव में बदल पाएगा.
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