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ग्रेट वॉल से टेंपल ऑफ हेवन तकः जहां मिलते रहे अमेरिका-चीन के राष्ट्राध्यक्ष और बदलती रही दुनिया की तस्वीर

अमेरिका और चीन के रिश्तों की कहानी ऐतिहासिक स्थलों पर मुलाकातों के जरिए शक्ति, सभ्यता और कूटनीति का प्रदर्शन करती रही है. चीन अपने इतिहास और संस्कृति को सॉफ्ट पावर के रूप में इस्तेमाल करता है, जो दुनिया की राजनीति के अगले अध्याय की झलक भी दिखा देता है.

ग्रेट वॉल से टेंपल ऑफ हेवन तकः जहां मिलते रहे अमेरिका-चीन के राष्ट्राध्यक्ष और बदलती रही दुनिया की तस्वीर
टेंपल ऑफ हेवन के सामने डोनाल्ड ट्रंप और शी जिनपिंग
AFP
  • अमेरिका और चीन के राष्ट्राध्यक्षों की मुलाकात टेंपल ऑफ हेवन में हो रही है.
  • यह फॉरबिडन सिटी, ग्रेट वॉल ऑफ चाइना के जैसी ही एक ऐतिहासिक जगह है.
  • चीन इन सम्मेलनों से हजारों साल पुरानी अपनी सभ्यता का प्रदर्शन और वैश्विक प्रभाव का मैसेज देता है.

सैकड़ों साल पुराने लकड़ी के खंभों पर टिके टेंपल ऑफ हेवन के हॉल ऑफ प्रेयर फॉर गुड हार्वेस्ट में जब चीन और अमेरिकी राष्ट्राध्यक्ष डोनाल्ड ट्रंप और शी जिनपिंग तस्वीरें खिंचा रहे हैं, तो इतिहास की लंबी परछाइयां उन पर पड़ रही हैं और साथ ही पूरी दुनिया की नजरें उन पर टिकी हैं. यह शक्ति का प्रदर्शन है. सभ्यता का संदेश है. और दुनिया को यह बताने की कोशिश भी कि आने वॉले समय का नेतृत्व आखिर किसके हाथ में होगा.

अमेरिका और चीन के रिश्तों की कहानी सिर्फ व्हाइट हाउस और चीन के सरकारी कागजों में ही नहीं लिखी गई. यह कहानी उन ऐतिहासिक जगहों पर भी लिखी गई जहां कभी सम्राट चलते थे, जहां साम्राज्य बनते और टूटते थे, और जहां आज भी राजनीति सिर्फ शब्दों से नहीं बल्कि प्रतीकों से खेली जाती है.

जब भी अमेरिकी राष्ट्रपति चीन पहुंचे, बीजिंग ने उन्हें सिर्फ मीटिंग रूम में नहीं बिठाया. वो उन्हें अपने इतिहास के बीच लेकर जाता है. कभी ग्रेट वॉल ऑफ चाइना पर तो कभी फॉरबिडन सिटी के शाही दरवाजों के बीच और अब टेंपल ऑफ हेवन जैसे प्रतीकों के बीच बैठक चल रही है.

ग्रेट वॉल ऑफ चाइना से निक्सन ने शीत युद्ध के बीच निक्सन ने दुनिया को सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश दिया

ग्रेट वॉल ऑफ चाइना से निक्सन ने शीत युद्ध के बीच निक्सन ने दुनिया को सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश दिया
Photo Credit: AFP

जब ग्रेट वॉल पर बदली दुनिया की दिशा

साल 1972. दुनिया दो हिस्सों में बंटी हुई थी. एक तरफ अमेरिका. दूसरी तरफ सोवियत संघ. और बीच में चीन, जो लंबे समय तक दुनिया से लगभग कटा हुआ था. तभी अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने वो कदम उठाया जिसने वैश्विक राजनीति की धुरी को हमेशा-हमेशा के लिए बदल दिया. शीत युद्ध के बीच निक्सन ने चीन पहुंच कर दुनिया को सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश दिया. जब निक्सन को ग्रेट वॉल ऑफ चाइना ले जाया गया तो चीन को यह पता था कि वो तस्वीर इतिहास में दर्ज होने जा रहा है. निक्सन ने चीन की उस महान दीवार पर खड़े होकर कहा था- Only the Great Wall could inspire such greatness, यानी केवल ग्रेट वॉल ही ऐसी महानता की प्रेरणा दे सकती थी.

यह अमेरिका का वो संकेत था कि अब चीन को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. निक्सन की उस चीनी यात्रा के बाद दुनिया बदलने लगी. अमेरिका और चीन के बीच बड़े-बड़े बिजनेस डील हुए और कई अमेरिकी कंपनियां चीन पहुंच गईं. यह वही दौर था जब चीन की फैक्ट्रियां दुनिया भर के देशों के लिए उत्पादन केंद्र के रूप में उभरने लगीं. आज दुनिया जिस चीन को दूसरी सबसे बड़ी महाशक्ति के रूप में जानती है उसकी शुरुआत कहीं-न-कहीं उसी ग्रेट वॉल वाली तस्वीर से जुड़ी मानी जाती है. बाद में चीन की दीवार पर 1998 में बिल क्लिंटन और 2002 में जॉर्ज बुश भी गए.

फॉरबिडेन सिटी में ओपेरा कलाकारों से बातें करते अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप- 2017 में चीन के दौरे की तस्वीर

फॉरबिडेन सिटी में ओपेरा कलाकारों से बातें करते अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप- 2017 में चीन के दौरे की तस्वीर
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फॉरबिडन सिटी में ट्रंप के लिए चीन का संदेश

निक्सन के उस दौरे के करीब 45 साल बाद इतिहास ने एक और तस्वीर देखी. साल 2017 में डोनाल्ड ट्रंप पहली बार चीन पहुंचे. पर अब चीन कमजोर देश नहीं था. वह दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका था. टेक्नोलॉजी, व्यापार और सैन्य ताकत में चीन तेजी से अमेरिका को चुनौती दे रहा था. साथ ही अमेरिका और चीन के बीच ट्रेड वॉर की शुरुआत हो चुकी थी.

लेकिन बीजिंग ने ट्रंप का स्वागत सिर्फ एक मेहमान की तरह नहीं किया. चीन ने उन्हें अपने साम्राज्य के इतिहास के बीच खड़ा कर दिया. फॉरबिडन सिटी के लाल दरवाजों के सामने ट्रंप और शी जिनपिंग साथ चलते दिखाई दिए. वही फॉरबिडन सिटी जहां कभी चीन के सम्राट रहते थे. एक ऐसा शाही परिसर जहां आम लोगों का प्रवेश कभी मना था. इसकी हर दीवार चीनी सत्ता की सदियों पुरानी कहानी कहती थी.

जिनपिंग को पता था कि यह दुनिया को संदेश देने का मौका है. वह दुनिया को संदेश देना चाहता था कि भले ही अमेरिका आधुनिक सुपरपावर हो, पर चीन की सभ्यता उससे कहीं ज्यादा पुरानी है. फॉरबिडन सिटी में ट्रंप भले ही आधुनिक अमेरिका का चेहरा थे पर चीन उन्हें साम्राज्य का मतलब समझा रहा था.

उस यात्रा के दौरान ट्रंप के लिए शाही सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किया गया. पुराने चीनी राजवंशों के संगीत, नृत्य और परंपराओं के जरिए चीन अपनी सॉफ्ट पावर का प्रदर्शन कर रहा था.

हॉल ऑफ प्रेयर फॉर गुड हार्वेस्ट में चीनी सम्राट अच्छी फसल, शांति और साम्राज्य की समृद्धि के लिए प्रार्थना करते थे. तब यह माना जाता था कि अगर सम्राट की पूजा स्वीकार हो गई, तो पूरे देश में खुशहाली आएगी. लेकिन अगर पूजा असफल रही, तो उसे शासक की कमजोरी माना जाता था.

हॉल ऑफ प्रेयर फॉर गुड हार्वेस्ट में चीनी सम्राट अच्छी फसल, शांति और साम्राज्य की समृद्धि के लिए प्रार्थना करते थे. तब यह माना जाता था कि अगर सम्राट की पूजा स्वीकार हो गई, तो पूरे देश में खुशहाली आएगी. लेकिन अगर पूजा असफल रही, तो उसे शासक की कमजोरी माना जाता था.
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चीन इतिहास को हथियार की तरह इस्तेमाल करता है

दुनिया के कई देश अपनी सैन्य ताकत दिखाते हैं. कुछ आर्थिक ताकत दिखाते हैं. लेकिन चीन अक्सर अपना इतिहास दिखाता है. यही उसकी सबसे अलग रणनीति है. चीन दुनिया को यह महसूस कराना चाहता है कि वह सिर्फ एक आधुनिक राष्ट्र नहीं, बल्कि हजारों साल पुरानी सभ्यता है जो हर दौर में किसी न किसी रूप में शक्तिशाली रही है. 

चीन जब विदेशी नेताओं को ऐतिहासिक स्थलों पर ले जाया जाता है, तो उसके पीछे एक मनोवैज्ञानिक संदेश भी छिपा होता है. वह यह कहना चाहता है कि आप आज ताकतवर हो सकते हैं, लेकिन चीन सदियों से मौजूद है. इसीलिए चीन के लिए टेंपल ऑफ हेवन जैसे स्थान एक ओर पर्यटन स्थल हैं तो दूसरी तरफ राजनीति के प्रतीक.

टेंपल ऑफ हेवन वह जगह थी जहां चीन के सम्राट स्वर्ग से आशीर्वाद मांगने आते थे. यहां अच्छी फसल, शांति और साम्राज्य की समृद्धि के लिए प्रार्थनाएं होती थीं. पुराने चीन में सम्राट खुद को स्वर्ग और धरती के बीच का प्रतिनिधि मानते थे. चीन में आज भी प्रतीकों की राजनीति अहम मानी जाती है.

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प्रतीकों की राजनीति बखूबी समझता है अमेरिका

ऐसा नहीं है कि सिर्फ चीन ही इतिहास का इस्तेमाल करता है. अमेरिका भी अपने प्रतीकों के जरिए ताकत दिखाता रहा है. 2017 में जब शी जिनपिंग अमेरिका पहुंचे, तब ट्रंप ने उन्हें अपने निजी रिसॉर्ट में बुलाया. समुद्र किनारे बना यह आलीशान एस्टेट ट्रंप की निजी पहचान का हिस्सा माना जाता है.

यहीं डिनर के दौरान ट्रंप ने शी जिनपिंग को बताया था कि अमेरिका ने सीरिया पर मिसाइल हमला कर दिया है. दुनिया ने उस पल को अमेरिकी शक्ति प्रदर्शन के रूप में देखा.

फिर साल 2023 में जो बाइडन और शी जिनपिंग की मुलाकात फिलोली हिस्टॉरिक हाउस ऐंड गार्डेन में हुई. यह जगह भी एक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक माहौल से भरी हुई थी.

अमेरिका भी यह दिखाना चाहता था कि उसकी ताकत सिर्फ हथियारों में नहीं, बल्कि उसकी संस्कृति, लोकतंत्र और वैश्विक प्रभाव में भी है.

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असली लड़ाई सिर्फ व्यापार की नहीं

अमेरिका और चीन के बीच संघर्ष को अक्सर ट्रेड वॉर, चिप वॉर या टेक्नोलॉजी वॉर कहा जाता है. लेकिन असली लड़ाई इससे कहीं बड़ी है. यह दो अलग विचारधाराओं की लड़ाई भी है.

चीन कहता है कि उसकी सभ्यता हजारों साल पुरानी है और उसका राजनीतिक मॉडल स्थिरता और निरंतरता देता है.

अमेरिका कहता है कि उसकी लोकतांत्रिक व्यवस्था और खुला समाज ही दुनिया का सबसे सफल मॉडल है.

ऐसे में जब इन दोनों देशों के नेता किसी ऐतिहासिक जगह पर मिलते हैं, तो वहां केवल कूटनीति और समझौते ही नहीं होते बल्कि वहां दो अलग-अलग वैश्विक नजरिए का आमना-सामना होता है.

एक तरफ निर्बाध चली आ रही पुरानी सभ्यता तो दूसरी ओर आधुनिक वैश्विक नेतृत्व.

तस्वीरें क्यों बन जाती हैं इतिहास

और पूरी दुनिया इन तस्वीरों को बड़े ध्यान से देखती और आकलन करती है क्योंकि ये तस्वीरें कई बार भविष्य का संकेत बन जाती हैं. ग्रेट वॉल पर निक्सन की तस्वीर ने दुनिया की अर्थव्यवस्था बदल दी.

फॉरबिडन सिटी में शी जिनपिंग ने यह दिखाया कि चीन अब बराबरी से अमेरिका को चुनौती देने की स्थिति में है. और अब टेंपल ऑफ हेवन की बारी है, जहां शायद यह तय हो कि 21वीं सदी में वैश्विक नेतृत्व की दिशा किस ओर रुख करेगी.

तो टेंपल ऑफ हेवन में केवल बातें नहीं होंगी वहां ट्रंप और जिनपिंग दुनिया की भविष्य लिख रहे होंगे.

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