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This Article is From Aug 05, 2025

भारत से नफरत- पाकिस्तान से प्यार… क्या ट्रंप ने जिंदा किया 1971 वाला अमेरिका?

1971 में कैसे खुद को मानवाधिकार का अगुवा बताने वाले अमेरिका ने लोकतंत्र के मोर्चे पर पूरी तरह से फेल, बांग्लादेश में दमन करने वाले पाकिस्तान की सरकार और वहां की आर्मी का साथ दिया था, यहां बताते हैं.

भारत से नफरत- पाकिस्तान से प्यार… क्या ट्रंप ने जिंदा किया 1971 वाला अमेरिका?
  • ट्रंप पाकिस्तान के साथ व्यापार समझौता कर भारत पर भारी टैरिफ और जुर्माना लगाने की धमकी दे रहे हैं.
  • भारतीय सेना ने 1971 के पुराने अखबार की कटिंग शेयर कर अमेरिका के दशकों पुराने पाकिस्तान समर्थन पर कटाक्ष किया.
  • 1971 में अमेरिका ने पाकिस्तान का समर्थन किया जबकि वह बांग्लादेश में लोकतंत्र का दमन कर रही थी.

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप आजकल पाकिस्तान का राग गा रहे हैं. वो एक तरफ पाकिस्तान के साथ व्यापार समझौता करते हैं और दूसरी तरफ भारत पर न सिर्फ भारी-भरकम टैरिफ लादते हैं बल्कि रूस से तेल खरीदने को लेकर भारत पर जुर्माना लगाने की धमकी भी दे रहे हैं. बात सिर्फ धमकी तक सीमित नहीं है, उनका टोन तेजी से भारत विरोधी हो गया है, भारत पर आरोप लगाते हुए वो इतना आगे बढ़ गए कि भारत के विदेश मंत्रालय को उन्हें आईना दिखाना पड़ा कि खुद अमेरिका और यूरोपीय संघ रूस से व्यापार जारी रखे हुए हैं तो फिर भारत पर रूस के जंग को फंड करने का आरोप कैसे लगा सकते हैं. खैर ट्रंप को एक आईना भारत की सेना ने भी दिखाया है.

भारतीय सेना ने मंगलवार को 1971 के एक पुराने अखबार की कटिंग का फोटो शेयर करके हुए अमेरिका पर कटाक्ष किया, जिसमें दिखाया गया था कि कैसे अमेरिका ने दशकों तक पाकिस्तान का समर्थन किया है. भारतीय सेना की ईस्टर्न कमांड द्वारा शेयर की गई यह अखबार कटिंग 5 अगस्त 1971 की है. इसमें दिखाया गया है कि कैसे अमेरिका 1954 से ही दशकों तक पाकिस्तान को हथियारों की आपूर्ति कर रहा था.

आज ट्रंप के नेतृत्व में भी अमेरिका का वही तेवर दिख रहा है जहां वो पाकिस्तान को गले लगाते दिख रहे हैं. चलिए आपको बताते हैं कि 1971 में कैसे खुद को मानवाधिकार का अगुवा बताने वाले अमेरिका ने लोकतंत्र के मोर्चे पर पूरी तरह से फेल, बांग्लादेश में दमन करने वाले पाकिस्तान की सरकार और वहां की आर्मी का साथ दिया था, वो भी यह सब बात जानते हुए.

अमेरिका को पाकिस्तान की हकीकत पता थी

1965 के युद्ध ने भारतीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव को चिह्नित किया. 1966 में ताशकंद समझौते के दौरान तत्कालीन प्रधान मंत्री लाल बहादुर शास्त्री की रहस्यमय परिस्थितियों में मृत्यु हो गई और इंदिरा गांधी को भारत के प्रधान मंत्री के रूप में चुना गया. इस बीच, पाकिस्तान के फील्ड मार्शल अयूब खान ने जनरल याह्या खान को बागडोर सौंप दी, जिन्होंने पद संभालने के बाद पूरे देश में मार्शल लॉ घोषित कर दिया. एक साल बाद 1970 में, याह्या खान ने अपनी स्थिति को वैध बनाने और पाकिस्तान में "लोकतंत्र वापस लाने" के लिए आम चुनावों की घोषणा की. 

उन्हें झटका लगा जब पूर्वी पाकिस्तान (आज का बांग्लादेश) में शेख मुजीबुर रहमान की अवामी लीग ने 311 सदस्यीय नेशनल असेंबली में बहुमत हासिल कर लिया. ज़ुल्फिकार अली भुट्टो इस निर्णय को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे. आग पूर्वी पाकिस्तान में भड़की और क्रांति का दमन शुरू हुआ. मेजर जनरल टिक्का खान, जिन्हें पूर्वी पाकिस्तान का कसाई भी कहा जाता है, ने स्वतंत्रता आंदोलन के सशस्त्र दमन का आदेश दिया. पाकिस्तान ने भारत के एयरफिल्ड पर हमला कर दिया जिसके बाद इंदिरा गांधी ने पाकिस्तान के खिलाफ जंग का ऐलान कर दिया.

इन सबके बीच अमेरिका ने पाकिस्तान का पक्ष लिया, जबकि उसे पता था कि पाकिस्तान लोकतंत्र और मानवाधिकारों का गला घोट रहा है. खुद ढाका में अमेरिका के वाणिज्य दूतावास कार्यालय में तैनात एक युवा अमेरिकी राजनयिक- आर्चर ब्लड ने उसे सच्चाई दिखाई थी. व्हाइट हाउस को उन्होंने टेलीग्राम लिखकर पाकिस्तान के प्रति अमेरिकी नीति की आलोचना की थी.

6 अप्रैल, 1971 को एक टेलीग्राम में, उन्होंने लिखा, "...हमारी सरकार दमन की निंदा करने में विफल रही है. हमारी सरकार नागरिकों की रक्षा के लिए सशक्त कदम उठाने में विफल रही है, जबकि साथ ही पश्चिमी पाक प्रभुत्व वाली सरकार को शांत करने के लिए पीछे की ओर झुक रही है.” ब्लड द्वारा ऑथोराइज्ड और 20 अन्य लोगों द्वारा हस्ताक्षरित इस केबल में कहा गया है, "हमारी सरकार के पास सबूत हैं कि कई लोग इसे नैतिक दिवालियापन मानेंगे."

अमेरिकी पत्रकार गैरी जे बैस ने अपनी किताब - 'द ब्लड टेलीग्राम निक्सन, किसिंजर, एंड ए फॉरगॉटन जेनोसाइड' में सबसे विस्तृत विवरण लिखा है और बताया है कि कैसे अमेरिकी राजनयिक ने वाशिंगटन को पाकिस्तानी सैनिकों द्वारा किए जा रहे अत्याचारों की प्रत्यक्ष जानकारी अमेरिका के साथ शेयर की, विशेष रूप से नागरिकों के खिलाफ चाफी टैंक और एफ -86 सेबर जेट जैसे अमेरिकी हथियारों का उपयोग करने से जुड़ा. लेकिन इनके बावजूद अमेरिका के राष्ट्रपति निक्सन ने स्थिति की गंभीरता को नजरअंदाज करना चुना.

भारत के खिलाफ अमेरिका ने भेजा था न्यूक्लियर जहाज 

तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन और उनके विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर भारत को सहयोगी के रूप में नहीं देखते थे. अमेरिका ने पूर्व में भारतीय नौसेना को धमकाने और सत्तावादी पाकिस्तानी शासन का समर्थन करने के लिए यूएसएस एंटरप्राइज (न्यूक्लियर हथियार वाला एयरक्राफ्ट कैरियर जहाज) को हिंद महासागर में भेजा था. विमानवाहक पोत HMS ईगल के नेतृत्व में यूके की नौसेना ने भी आगे बढ़ना शुरू कर दिया. भारत अपने पूर्वी तटों की ओर एक समन्वित खतरे का सामना कर रहा था. लेकिन फिर सोवियत रूस से भारत की मदद की. सोवियत रूस ने बंगाल की खाड़ी में अमेरिकी और ब्रिटिश नौसैनिकों की उपस्थिति का मुकाबला करने के लिए एडमिरल व्लादिमीर क्रुग्लाकोव के नेतृत्व में एक परमाणु-सशस्त्र फ़्लोटिला (एक छोटा बेड़ा) तैनात किया. अमेरिका को पीछे हटना पड़ा.

इंदिरा गांधी को कहे थे अपशब्द

जुलाई 2005 में, अमेरिकी विदेश विभाग ने 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध से कुछ समय पहले पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन और स्टेट सेक्रेटरी हेनरी किसिंजर के बीच टेप की गई बातचीत को सार्वजनिक किया था. टेप में दोनों को इंदिरा गांधी से मुलाकात के तुरंत बाद उनके बारे में बात करते हुए सुना जा सकता है. तीखी बातचीत के दौरान, निक्सन ने इंदिरा गांधी को "बूढ़ी चुड़ैल" कहा था, जबकि किसिंजर ने उन्हें "b***c" कहा था. साथ ही उन्हें कहते सुना गया कि "भारतीय वैसे भी ba***rd हैं".

खैर भारत ने फिर भी पाकिस्तान को धूल चटाई. 1971 के युद्ध में भारत ने पाकिस्तान को करारी शिकस्त दी और बांग्लादेश का जन्म हुआ. युद्ध मात्र 14 दिन में ही समाप्त हो गया. जंग में 3,800 से अधिक भारतीय सशस्त्र बल के जवान शहीद हो गए और 9,800 से अधिक घायल हुए. कम से कम 90,000 पाकिस्तानी सैनिकों ने आत्मसमर्पण कर दिया. बांग्लादेश का जन्म भारतीय सैनिकों और मुक्ति वाहिनी के बलिदान से हुआ था.

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