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गृह युद्ध, नया लीडर, अमेरिकी पपेट या सैन्य शासन... ईरान में अब क्या-क्या हो सकता है?

ईरान इस समय गहरे राजनीतिक संकट के दौर से गुजर रहा है, जहां गृह युद्ध, नया नेतृत्व, बाहरी दखल या सैन्य शासन जैसे चार संभावित रास्ते सामने हैं.आने वाले फैसले न सिर्फ ईरान की दिशा तय करेंगे, बल्कि पूरे पश्चिम एशिया की राजनीति और वैश्विक संतुलन पर भी असर डालेंगे.

गृह युद्ध, नया लीडर, अमेरिकी पपेट या सैन्य शासन... ईरान में अब क्या-क्या हो सकता है?
  • ईरान वर्तमान में राजनीतिक अस्थिरता और आर्थिक दबाव के कारण इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है
  • देश में गृह युद्ध की आशंका बढ़ रही है क्योंकि विभिन्न जातीय समूह और विरोधी गुट सत्ता के खिलाफ हैं
  • बाहरी ताकतों खासकर अमेरिका के प्रभाव से सत्ता परिवर्तन की वैधता पर सवाल उठ सकते हैं और टकराव बढ़ सकता है
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नई दिल्ली:

ईरान इस समय अपने इतिहास के सबसे निर्णायक मोड़ पर खड़ा नजर आ रहा है. दशकों से सख्त शासन व्यवस्था, अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों, आर्थिक दबाव और आंतरिक असंतोष से जूझ रहा यह देश अब उस सवाल से रूबरू है, जिसका जवाब न सिर्फ ईरान बल्कि पूरे पश्चिम एशिया की राजनीति तय करेगा अब आगे क्या? राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक ईरान के सामने इस वक्त चार बड़े संभावित रास्ते दिखाई देते हैं गृह युद्ध, नया नेतृत्व, किसी बाहरी ताकत का प्रभाव या फिर खुला सैन्य शासन.

पहला खतरा: गृह युद्ध

ईरान में पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह से विरोध प्रदर्शनों, जातीय असंतोष और सत्ता के खिलाफ नाराजगी ने जोर पकड़ा है, उसने गृह युद्ध की आशंकाओं को हवा दी है. देश में फारसी बहुल सत्ता के खिलाफ कुर्द, बलूच और अरब समुदायों की शिकायतें पुरानी हैं. अगर सत्ता परिवर्तन के दौरान स्पष्ट नेतृत्व नहीं उभरता, तो अलग-अलग गुटों के बीच हिंसक टकराव की स्थिति बन सकती है. सीरिया और लीबिया जैसे उदाहरण ईरान के लिए चेतावनी माने जा रहे हैं.

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दूसरा विकल्प: नया लीडर

ईरान की राजनीतिक व्यवस्था में नेतृत्व परिवर्तन की संवैधानिक प्रक्रिया मौजूद है, लेकिन असली सवाल यह है कि नया नेता कितना स्वीकार्य होगा. अगर सत्ता के भीतर से कोई ऐसा चेहरा सामने आता है जो जनता के गुस्से को शांत कर सके और व्यवस्था में कुछ सुधार का भरोसा दे सके, तो हालात संभल सकते हैं. हालांकि जनता का एक बड़ा वर्ग मौजूदा सिस्टम में केवल “चेहरा बदलने” को समाधान नहीं मानता.

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तीसरा सवाल: अमेरिकी पपेट?

ईरान में लंबे समय से यह नैरेटिव मजबूत रहा है कि पश्चिमी ताकतें, खासकर अमेरिका, वहां अपनी पसंद की सरकार देखना चाहती हैं. अगर सत्ता परिवर्तन में बाहरी समर्थन या दखल की छवि बनती है, तो नया नेतृत्व तुरंत “अमेरिकी पपेट” कहकर खारिज किया जा सकता है. इससे देश के भीतर वैधता का संकट और गहरा सकता है और टकराव बढ़ सकता है.

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चौथा रास्ता: सैन्य शासन

ईरान की राजनीति में सेना और रिवोल्यूशनरी गार्ड्स की भूमिका बेहद ताकतवर मानी जाती है. संकट की स्थिति में यह तर्क दिया जा सकता है कि “देश को बचाने” के लिए सेना को सीधे सत्ता संभालनी चाहिए. हालांकि इससे अल्पकालिक स्थिरता तो आ सकती है, लेकिन लंबे समय में यह नागरिक स्वतंत्रताओं और लोकतांत्रिक उम्मीदों के लिए बड़ा झटका होगा.

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क्षेत्रीय और वैश्विक असर

ईरान में होने वाला कोई भी बड़ा बदलाव सिर्फ उसकी सीमाओं तक सीमित नहीं रहेगा. इसका असर इजरायल, खाड़ी देशों, तेल बाजार और वैश्विक कूटनीति पर पड़ेगा। यही वजह है कि पूरी दुनिया की नजरें इस वक्त तेहरान पर टिकी हैं. ईरान किस रास्ते पर जाएगा, यह अभी साफ नहीं है. लेकिन इतना तय है कि आने वाले फैसले देश की दशकों की दिशा तय करेंगे या तो सुधार की ओर, या फिर लंबे अस्थिर दौर की तरफ.

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