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युद्धविराम के बाद भी क्यों हमले कर रहे हैं इजरायल-अमेरिका और ईरान, किस दिशा में जा रहा है मिडिल ईस्ट

डॉ. अमर सिंह
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    जून 11, 2026 17:52 pm IST
    • Published On जून 11, 2026 17:11 pm IST
    • Last Updated On जून 11, 2026 17:52 pm IST
युद्धविराम के बाद भी क्यों हमले कर रहे हैं इजरायल-अमेरिका और ईरान, किस दिशा में जा रहा है मिडिल ईस्ट

अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच अप्रैल में हुए युद्धविराम के बाद स्थापित नाजुक शांति एक बार फिर संकट में है. पश्चिम एशिया में तनाव का नया दौर इस बात का संकेत देता है कि क्षेत्र अभी भी स्थायी शांति से दूर है. हालिया घटनाक्रम में इजरायल और ईरान मिसाइल हमलों, ड्रोन अभियानों और तीखे राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के माध्यम से फिर आमने-सामने खड़े दिखाई दे रहे हैं. वहीं दूसरी तरफ अमेरिका एक जटिल कूटनीतिक भूमिका निभा रहा है. वह सार्वजनिक रूप से संयम और संवाद की अपील करता है, लेकिन क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन को अपने स्ट्रैटजिक हितों के अनुरूप बनाए रखने का प्रयास भी करता दिखता है.

ताजा तनाव तब बढ़ा जब इजरायल ने लेबनान की राजधानी बेरूत के दक्षिणी क्षेत्रों में हिज्बुल्लाह के ठिकानों पर हमला किया. तेहरान ने इसे अमेरिका-ईरान युद्धविराम की भावना का उल्लंघन बताया. वहीं इजरायल का दावा है कि यह कार्रवाई उत्तरी इजरायल पर ईरान समर्थित हिज्बुल्लाह के रॉकेट हमलों के जवाब में की गई. इसके जवाब में ईरान ने इजरायल पर मिसाइल हमले किए. इजरायल ने भी ईरान के सामरिक ठिकानों को निशाना बनाया.यह घटनाक्रम एक सवाल खड़ा करता है. वह यह कि क्या यह केवल ईरान-इजरायल प्रतिद्वंद्विता का एक और अध्याय है या पश्चिम एशिया एक नए सामरिक और भू-राजनीतिक युग में प्रवेश कर चुका है?

युद्धविराम: शांति नहीं, केवल एक विराम

अप्रैल की शुरुआत में पांच सप्ताह से अधिक चले युद्ध के बाद अमेरिका, ईरान और इजरायल के बीच एक युद्धविराम समझौता हुआ. आठ अप्रैल से लागू इस समझौते से बड़े पैमाने की सैन्य कार्रवाइयों को अस्थायी रूप से रोकने में सफलता तो मिली, लेकिन किंतु संघर्ष के मूल कारण यथावत रहे. यही कारण है कि युद्धविराम के कुछ ही सप्ताह बाद क्षेत्र में पुनः तनाव बढ़ने लगा.

ईरान की वार्ता-शर्तें लगभग अपरिवर्तित रहीं. वह लेबनान में युद्धविराम, इजरायली सेना की वापसी, उसकी फ्रीज की गई संपत्तियों में से लगभग 12 अरब डॉलर की रिहाई और होर्मुज जलडमरूमध्य पर सीमित नियंत्रण की मांग करता रहा. वह अपने परमाणु कार्यक्रम को लेकर विश्वास-निर्माण के उपायों पर चर्चा के लिए तैयार था, बशर्ते उसकी सुरक्षा और आर्थिक हितों को स्वीकार किया जाए. वहीं दूसरी ओर, अमेरिका का दृष्टिकोण कहीं अधिक व्यापक था.अमेरिका ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर कठोर सीमाएं, संवर्धित यूरेनियम के भंडार में कटौती, बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम पर नियंत्रण, क्षेत्रीय प्रॉक्सी समूहों के लिए समर्थन में कमी और समुद्री मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करना चाहता था.

इजरायल ने युद्धविराम का समर्थन तो किया, लेकिन उसने यह भी साफ कर दिया कि लेबनान में हिज्बुल्लाह के विरुद्ध उसका सैन्य अभियान इस समझौते के दायरे में नहीं आएगा. परिणामस्वरूप, युद्ध भले ही थम गया हो, लेकिन क्षेत्र तनावपूर्ण गतिरोध की स्थिति में पहुंच गया. ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य में नौवहन गतिविधियों पर प्रतिबंध लगा दिया और अमेरिका ने नौसैनिक दबाव बढ़ा दिया. इससे स्थिति और जटिल हो गई.

युद्धविराम के दौरान क्या-क्या हुआ

स्पष्ट रूप से देखा जाए तो अप्रैल का युद्धविराम किसी स्थायी समाधान की दिशा में नहीं, बल्कि बढ़ती सैन्य कार्रवाई को अस्थायी रूप से रोकने का प्रयास था.इस समय का उपयोग दोनों पक्षों ने अपनी-अपनी सैन्य क्षमताओं को सुदृढ़ करने में किया. ईरान ने क्षतिग्रस्त सैन्य ढांचे के पुनर्निर्माण, मिसाइल भंडारों की पुनःपूर्ति और भूमिगत सुरंग नेटवर्क को मजबूत करने पर ध्यान केंद्रित किया.दूसरी ओर, इजरायल का मानना था कि ईरान और उसके प्रॉक्सी युद्धविराम का लाभ उठाकर भविष्य के संघर्षों के लिए तैयारी कर रहे हैं. इसी धारणा के आधार पर इजरायल ने ईरान के दक्षिण और लेबनान में हिज्बुल्लाह के विरुद्ध अभियानों को और तेज कर दिया. 

वर्तमान तनाव की जड़ें युद्ध के प्रारंभिक चरण में देखी जा सकती हैं. अमेरिका और इजरायल के भारी सैन्य दबाव, आर्थिक प्रतिबंधों और नौसैनिक घेराबंदी के बावजूद ईरानी शासन न केवल बना रहा, बल्कि उसका सुरक्षा ढांचा भी प्रभावी रूप से कार्य करता रहा. विरोधियों द्वारा बार-बार लगाए गए शासन परिवर्तन के अनुमान भी साकार नहीं हुए. ऐसे में ईरान के लिए अपने क्षेत्रीय सहयोगियों के विरुद्ध हमलों पर प्रतिक्रिया देना केवल सामरिक आवश्यकता नहीं, बल्कि राजनीतिक विश्वसनीयता का प्रश्न भी बन गया.

क्या ईरान 'एक्सिस ऑफ रेसिस्टेंस'को छोड़ देगा

ईरान यह संदेश देना चाहता है कि उसका 'एक्सिस ऑफ रेसिस्टेंस' हिज्बुल्लाह, इराकी मिलिशिया, हूती और हमास—पर हमला अब केवल स्थानीय घटना नहीं माना जाएगा, बल्कि उसे ईरान की क्षेत्रीय सुरक्षा संरचना पर हमला समझा जाएगा. यदि ईरान अपनी चेतावनियों के बावजूद निष्क्रिय रहता, तो उसके नेतृत्व और प्रतिरोध नेटवर्क की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लग सकता था. हालांकि, यह मान लेना भी उचित नहीं होगा कि ईरान वार्ता प्रक्रिया को विफल करना चाहता है. वास्तव में, तेहरान अभी भी कूटनीतिक विकल्पों को खुला रखना चाहता है, किंतु वह यह भी स्पष्ट कर रहा है कि लेबनान मोर्चे को व्यापक क्षेत्रीय समीकरणों से अलग नहीं किया जा सकता.

इजरायल ने पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि लेबनान में उसकी सैन्य कार्रवाइयां मुख्य युद्धविराम का हिस्सा नहीं होंगी. अप्रैल के मध्य और जून के प्रारंभ में लेबनान से संबंधित अलग-अलग युद्धविराम प्रस्ताव सामने आए, इनमें हिज्बुल्लाह को लितानी नदी के दक्षिण से हटाने, लेबनानी सेना की तैनाती बढ़ाने और सभी प्रकार के हमलों को रोकने की बात शामिल थी. किंतु हिज्बुल्लाह ने इन शर्तों को 'आत्मसमर्पण' की संज्ञा देते हुए अस्वीकार कर दिया और दक्षिणी लेबनान से इजरायली सेना की पूर्ण वापसी को किसी भी समझौते की पूर्व शर्त बताया.

क्या लेबनान की वजह से बढ़ा है ताजा तनाव

आज भी दक्षिणी लेबनान में इजरायली हवाई हमले और सीमित जमीनी अभियान जारी हैं, जबकि हिज्बुल्लाह समय-समय पर जवाबी कार्रवाई करता रहा है. प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को इस बात की कोई चिंता नहीं हैं कि लेबनान में उनके नए हमले से ईरान के साथ अमेरिका का समझौता करना और मुश्किल हो सकता है. वे शुरू से ही ईरान के साथ युद्धविराम नहीं चाहते थे. उनकी नजर में अमेरिका और ईरान के बीच कोई भी समझौता एक बुरा समझौता होगा. वही ईरान ने भी संकेत दिया है कि उसकी व्यापक अनुपालन नीति काफी हद तक लेबनान मोर्चे की परिस्थितियों से जुड़ी हुई है. ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने चेतावनी दी कि यदि लेबनान में इजरायली कार्रवाई जारी रही, तो उसका जवाब और अधिक कठोर होगा. इसके परिणामस्वरूप इलाके में संघर्ष और तनाव लगातार बना हुआ है. वहीं दूसरी ओर अमेरिका नहीं चाहता है कि लेबनान में बढ़ता संघर्ष ईरान के साथ चल रही वार्ताओं को पटरी से उतार दे. यही कारण है कि अमेरिका और इजरायल के दृष्टिकोण में अंतर साफ नजर आता है. 

वर्तमान संकट का सबसे महत्वपूर्ण और जटिल पहलू अमेरिका की भूमिका है. एक ओर अमेरिका इजरायल का सबसे बड़ा सामरिक सहयोगी और सुरक्षा साझेदार है,वहीं दूसरी ओर वह पश्चिम एशिया में एक और लंबे, महंगे व अनिश्चित युद्ध में प्रत्यक्ष रूप से उलझने से बचना चाहता है. इसी कारण अमेरिका की नीति कई बार विरोधाभासी और दुविधापूर्ण दिखाई देती है. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से सभी पक्षों से संयम बरतने और नए युद्धविराम की दिशा में आगे बढ़ने की अपील की है. इसके बावजूद ईरान लगातार यह आरोप लगाता रहा है कि अमेरिका प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से इजरायल की सैन्य कार्रवाइयों को राजनीतिक, कूटनीतिक और सैन्य समर्थन प्रदान कर रहा है.

क्या खराब हो रहे हैं अमेरिका-इजरायल संबंध

कुछ विश्लेषकों का यह भी मानना है कि इजरायल पर अमेरिका का प्रभाव पहले की तुलना में सीमित हुआ है. हाल के समय में कई ऐसे अवसर सामने आए हैं जब इजरायल ने अमेरिकी सलाह या चिंताओं की परवाह किए बिना स्वतंत्र सैन्य निर्णय लिए. इससे यह धारणा मजबूत हुई है कि अमेरिका एक साथ कई उद्देश्यों को साधने का प्रयास कर रहा है. इजरायल की सुरक्षा सुनिश्चित करना, ईरान की क्षेत्रीय शक्ति को नियंत्रित रखना, समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा बनाए रखना और व्यापक क्षेत्रीय युद्ध को रोकना. इन परस्पर विरोधी लक्ष्यों के कारण अमेरिकी नीति में स्पष्टता की बजाय संतुलन साधने की कोशिश अधिक दिखाई देती है.

संकट का सबसे संवेदनशील मुद्दा ईरान का परमाणु कार्यक्रम बना हुआ है. अमेरिका की प्रमुख मांग है कि ईरान परमाणु हथियार निर्माण की संभावनाओं को पूरी तरह समाप्त करे, उच्च स्तर के यूरेनियम संवर्धन पर रोक लगाए और अपने संवर्धित यूरेनियम भंडार को अंतरराष्ट्रीय निगरानी के अधीन रखे. इजरायल भी लंबे समय से यह स्पष्ट करता आया है कि वह किसी भी परिस्थिति में ईरान को परमाणु हथियार क्षमता प्राप्त नहीं करने देगा. वहीं दूसरी ओर, ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए आवश्यक बताता है और इसे अपनी संप्रभुता, वैज्ञानिक प्रगति तथा राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़कर देखता है. यही कारण है कि वार्ताओं के कई दौर होने के बावजूद दोनों पक्षों के बीच विश्वास की कमी बनी हुई है. यही गतिरोध इस पूरे संकट को और अधिक जटिल तथा दीर्घकालिक बनाता है.

क्या युद्ध का नया चरण शुरू हो चुका है 

यह संघर्ष के 100 से अधिक दिन का हो चुका है. यह संकेत देता है कि ईरान–इजरायल टकराव वास्तव में एक नए चरण में प्रवेश कर चुका है. युद्ध का प्रारंभिक चरण मुख्यतः प्रत्यक्ष सैन्य कार्रवाई पर केंद्रित था, वहीं वर्तमान परिदृश्य कहीं अधिक जटिल है, जहां सैन्य शक्ति के साथ-साथ कूटनीति, आर्थिक दबाव, ऊर्जा राजनीति, समुद्री सुरक्षा और सूचना युद्ध समानांतर रूप से संचालित हो रहे हैं. 

वर्तमान स्थिति यह दर्शाती है कि किसी भी पक्ष के लिए पूर्ण और निर्णायक विजय प्राप्त करना कठिन है. इजरायल ईरान की सैन्य और परमाणु क्षमताओं को क्षति पहुंचा सकता है, किंतु उसके क्षेत्रीय प्रभाव और सहयोगी नेटवर्क को पूरी तरह समाप्त करना उसके लिए संभव नहीं दिखता. दूसरी ओर, ईरान इजरायल पर निरंतर दबाव बनाए रखने में सक्षम है, लेकिन उसके लिए भी दीर्घकालिक और व्यापक पारंपरिक युद्ध को बनाए रखना आसान नहीं होगा. परिणामस्वरूप, यह संघर्ष अब सैन्य विजय से अधिक धैर्य, संसाधनों, आर्थिक क्षमता और राजनीतिक इच्छाशक्ति की परीक्षा बन गया है.

(डिस्क्लेमर: लेखक अलीगढ़ के डीएस कॉलेज के रक्षा और स्त्रातजिक अध्ययन विभाग में अस्सिटेंट प्रोफेसर हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना ज़रूरी नहीं है. )

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