बांग्लादेश के 13वें संसदीय चुनाव का प्रचार मंगलवार सुबह खत्म हो गया.मतदान 12 फरवरी को कराया जाएगा. जुलाई 2024 में युवाओं के विद्रोह के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना ने अपने इस्तीफा दे दिया था. उसके बाद से भारत के इस पड़ोसी देश में पहली बार संसदीय चुनाव कराए जा रहे हैं. इस चुनाव को जेन जी से प्रेरित दुनिया का पहला चुनाव बताया जा रहा है.चुनाव आयोग ने हसीना की अवामी लीग को चुनाव लड़ने से रोक दिया है. इसलिए मुख्य मुकाबला बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) और जमात-ए-इस्लामी के बीच माना जा रहा है. इन दोनों दलों ने कुछ छोटे-छोटे दलों से गठबंधन किया है. इससे पहले जनवरी 2024 में कराए गए संसदीय चुनाव का बीएनपी और जमात ने बहिष्कार किया था. बांग्लादेश की संसद की 350 में से 300 सीटों पर कराए जा रहे चुनाव में कुल दो हजार 34 उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं.
संसदीय चुनाव के साथ जनमत संग्रह भी होगा
12 फरवरी को होने वाले संसदीय चुनाव के साथ ही 'जुलाई राष्ट्रीय चार्टर-2025' नामक सुधार प्रस्तावों पर जनमत संग्रह भी कराया जा रहा है. इस चार्टर की घोषणा शेख हसीना के बाद बांग्लादेश में बनी अंतरिम सरकार के प्रमुख नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस ने 17 अक्टूबर 2025 को थी.इसमें संसद में महिलाओं के लिए अधिक प्रतिनिधित्व, प्रधानमंत्रियों के कार्यकाल की समय सीमा तय करने, राष्ट्रपति की शक्तियों में बढोतरी, मौलिक अधिकारों के विस्तार और न्यायिक स्वतंत्रता समेत कई वादे शामिल हैं. जनमत संग्रह में मतदाताओं को 'हां'या 'नहीं' में से एक विकल्प को चुनना होगा.

यूनुस के 'जुलाई राष्ट्रीय चार्टर-2025' का मकसद देश की राजनीति और संस्थागत ढांचे में सुधार लाना था.जनमत संग्रह के लिए मतपत्र के साथ ही वोटरों से चार सवालों के जवाब 'हाँ' या 'नहीं' में देने होंगे. इस जनमत संग्रह में अगर अधिकांश मतदाताओं ने 'हां' के समर्थन में मतदान किया तो बांग्लादेश में एक संवैधानिक सुधार परिषद का गठन किया जाएगा. यह परिषद संविधान में संशोधन करेगी.
संसद का चुनाव और जनमत संग्रह साथ-साथ कराए जा रहे हैं. इसके लिए दो तरह के बैलेट पेपर का इस्तेमाल किया जाएगा. संसदीय चुनाव के लिए सफेद कागज पर काले रंग से छपे मतपत्र मतदाताओं को दिए जाएंगे. वहीं जनमत संग्रह के लिए रंगीन मतपत्रों का उपयोग होगा.
आंकड़ों में बांग्लादेश का चुनाव
बांग्लादेश चुनाव आयोग के मुताबिक इस चुनाव में दो हजार 34 उम्मीदवार अपनी किस्मत आजमा रहे हैं. इसमें 275 उम्मीदवार निर्दलीय हैं. बाकी के उम्मीदवारों को 51 राजनीतिक दलों ने खड़ा किया है. सबसे अधिक 291 उम्मीदवार बीएनपी ने खड़े किए हैं. वहीं बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी ने 229 और जातीय पार्टी ने 198 उम्मीदवार खड़े किए हैं. इन सभी उम्मीदवारों की चुनावी किस्मत का फैसला 12 फरवरी को 12.77 करोड़ मतदाता करेंगे.
बांग्लादेश चुनाव में इस बार 12.77 करोड़ मतदाता मतदान में हिस्सा लेंगे.इसमें 6.48 करोड़ पुरुष, 6.29 करोड़ महिला और 1220 ट्रांसजेंडर वोटर शामिल हैं. इस बार 42 हजार 779 मतदान केंद्र बनाए गए हैं.कुल मतदाताओं में से पांच करोड़ 60 लाख मतदाताओं की उम्र 18 से 37 साल के बीच हैं. ये देश के कुल मतदाताओं के 44 फीसदी के बराबर हैं. इनमें से 40 लाख 57 हजार मतदाता पहली बार मतदान करेंगे. बांग्लादेश में मतदाता बनने की उम्र 18 साल है तो चुनाव लड़ने की उम्र 25 साल है. सरकार का कार्यकाल पांच साल के लिए होता है. युद्ध काल में सरकार के कार्यकाल एक बार में एक साल के लिए बढ़ाया जा सकता है. लेकिन युद्ध खत्म होने के बाद इसे छह महीने से अधिक के लिए नहीं बढ़ाया जा सकता है.
- सबसे अधिक मतदाता: गाजीपुर-2804333
- सबसे कम मतदाता: झालकोठी 1228431
- सबसे अधिक पुरुष मतदाता : गाजीपुर 2400402
- सबसे अधिक महिला मतदाता : गाजीपुर 2403918
- सबसे कम पुरुष मतदाता: जेसोर 6115244
- सबसे कम महिला मतदाता: झालकोठी 1112002
- 80 धार्मिक अल्पसंख्यक उम्मीदवार मैदान में.
- बीएनपी और जमात समेत 22 दलों ने 68 अल्पसंख्यकों को दिया टिकट.
- बांग्लादेश कम्युनिस्ट पार्टी ने 17 अल्पसंख्यकों को दिया टिकट.
कब होगा मतदान और मतगणना
संसदीय चुनाव का मतदान 12 फरवरी को कराया जाएगा. मतदान 12 फरवरी की सुबह साढ़े सात बजे शुरू होकर शाम साढ़े चार बजे तक चलेगा. मतगणना का काम भी उसी दिन शुरू हो जाएगा. चुनाव आयोग के मुताबिक मतगणना शाम चार बजे से शुरू होकर तब तक चलेगी, जब तक की सभी चुनाव परिणाम नहीं आ जाते हैं.12 फरवरी को केवल 299 सीटों के लिए ही चुनाव कराए जाएंगे. शेरपुर-3 सीट पर एक उम्मीदवार की मौत के बाद चुनाव को स्थगित कर दिया गया है. वहां बाद में चुनाव कराए जाएंगे.
बाग्लादेश की संसद में कितनी सीटें हैं
बाग्लादेश की संसद को बंगाली में जातीय संगसद और अंग्रेजी में हाउस ऑफ नेशन कहा जाता है. इसमें 350 सीटें हैं. इनमें से 300 सदस्यों का चुनाव मतदाता संसदीय चुनाव के जरिए करते हैं. वहीं 50 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हैं. महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों का बंटवारा संसदीय चुनाव में राजनीतिक दलों को मिले वोट फीसद के आधार पर किया जाता है. इस बार 13वीं संसद के लिए चुनाव कराए जा रहे हैं. बांग्लादेश में सरकार बनाने के लिए किसी राजनीतिक दल या गठबंधन का 151 या उससे अधिक सीटें जीतना जरूरी है.

कौन से दल हैं चुनाव मैदान में
बांग्लादेश के चुनाव आयोग के मुताबिक कुल 60 राजनीतिक दल रजिस्टर्ड हैं. इनमें से अवामी लीग के चुनाव लड़ने पर पाबंदी है. बाकी बचे 59 में से 51 ने अपने उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतारे हैं. इनमें से प्रमुख हैं.
बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी: बीएनपी के नाम से मशहूर बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी यह पार्टी तारिक रहमान के नेतृत्व में चुनाव लड़ रही है. वो देश की पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के बेटे हैं. खालिदा जिया का दिसंबर 2025 में निधन हो गया था.बीएनपी बांग्लादेश के दो प्रमुख राजनीतिक दलों में से एक है. इसे मध्यमार्गी पार्टी माना जाता है. इस पार्टी का चुनाव निशान धान की बालिया हैं.
जमात-ए-इस्लामी: 1971 के मुक्ति संग्राम में पाकिस्तान का साथ देने वाली जमात-ए-इस्लामी अलग बांग्लादेश की विरोधी थी. यह पार्टी कट्टरपंथी इस्लामी सिद्धांतों पर चलने का दावा करती है. इसका नेतृत्व शफीकुर रहमान करते हैं. इस चुनाव में जमात ने नेशनल सिटिजन पार्टी और इस्लामी दलों के साथ चुनाव पूर्व गठबंधन किया है. इसका चुनाव निशान तराजू है.
नेशनल सिटिजन पार्टी: इस पार्टी का गठन 2024 में प्रधानमंत्री शेख हसीना के खिलाफ आंदोलन करने वाले छात्रों और युवाओं ने मिलकर 28 फरवरी 2025 को किया था.इसे एक मध्यमार्गी पार्टी माना जाता है. नाहिद इस्लाम इसके राष्ट्रीय संयोजक हैं. इसका चुनाव चिन्ह खिलता हुआ कमल का फूल है.
जातीय पार्टी (कादर धड़ा): जातीय पार्टी से अलग होकर बने इस दल का नेतृत्व गुलाम मोहम्मद कादर करते हैं. इसे मध्यमार्गी दक्षिणपंथी पार्टी माना जाता है.इसका चुनाव चिन्ह हल है.
जातीय पार्टी (इरशाद धड़ा): जातीय पार्टी के इस धड़े का नेतृत्व अनिसुल इस्लाम महमूद करते हैं. यह पार्टी 1980 के दशक में पूर्व राष्ट्रपति हुसैन मोहम्मद इरशाद के सैन्य शासन से जुड़ी रही है.
लेफ्ट डेमोक्रेटिक अलायंस: यह बांग्लादेश के वामपंथी दलों का गठबंधन है. इसमें बांग्लादेश की कम्युनिस्ट पार्टी और कई समाजवादी विचारधारा को मानने वाले दल शामिल हैं.
अमर बांग्लादेश पार्टी: यह एक मध्यमार्गी पार्टी है, जो खुद को सुधारवादी विकल्प के रूप में पेश करती है. यह उन मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित करना चाहती है जो पारंपरिक राजनीति से अलग बदलाव देखना चाहते हैं.

राजनीतिक दलों ने क्या चुनावी वादे किए हैं
इस बार के चुनाव में सभी राजनीतिक दल खुद को सुधारवादी दल के रूप में पेश कर रहे हैं.यहां तक की जमात-ए-इस्लामी ने एक हिंदू अल्पसंख्यकों को टिकट भी दिया है. सभी राजनीतिक लोकतंत्र को बहाल करने और राजनीतिक सुधारों की दिशा में कदम बढाने का वादा भी राजनीतिक दल कर रहे हैं. मतदाताओं ने आर्थिक असमानता को लेकर चिंता जताई है. इसके जवाब में बीएनपी और जमात दोनों ने रोजगार पैदा करने और आर्थिक अवसरों के जरिए लोगों की गरीबी दूर करने संकल्प लिया है.
बीएनपी ने सामाजिक सुरक्षा अभियान चलाने का वादा किया है. उसने 'फैमिली कार्ड' का प्रस्ताव रखा है, जिसके तहत गरीब परिवारों को नकद सहायता प्रदान की जाएगी. वहीं दूसरी ओर, जमात ने जबरन वसूली पर कड़ी कार्रवाई करने का संकल्प लिया है.बांग्लादेश में अवैध उगाही एक समस्या के रूप में सामने आया है.
बांग्लादेश चुनाव के प्रमुख मुद्दे क्या हैं
- मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व में अंतरिम सरकार के सत्ता में आने के बाद हुए विरोध प्रदर्शनों के बाद लोकतंत्र की बहाली.
- संसद में महिलाओं के लिए अधिक प्रतिनिधित्व, प्रधानमंत्रियों के कार्यकाल की सीमा तय करने, राष्ट्रपति की शक्तियों में वृद्धि, मौलिक अधिकारों के विस्तार और न्यायिक स्वतंत्रता का प्रस्ताव करने वाले 'जुलाई राष्ट्रीय चार्टर-2025' पर जनमत संग्र कराना.
- बांग्लादेश की आबादी का 40 फीसदी हिस्सा 30 साल से कम आयु के युवाओं का है. ऐसे में आने वाली सरकार को उनके लिए रोजगार और नौकरी के अवसर पैदा करने होंगे.
- निर्यात-आधारित कपड़ा उद्योग को प्रभावित करने वाली आर्थिक परेशानियों को दूर करना और आर्थिक स्थिरता बहाल करना.यह उद्योग कोरोना महामारी के बाद से भारी दिक्कतों का सामना कर रहा है.
- बांग्लादेश में जनवरी के महीने में महंगाई की दर 8.58 फीसदी दर्ज की गई थी. बढ़ती हुई महंगाई बांग्लादेश में दूसरा सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा है.
- शेख हसीना की सरकार गिरने और उनके दिल्ली में शरण लेने की वजह से भारत के साथ रिश्ते में आए तनाव को दूर करना.
- शासन व्यवस्था में फैले भ्रष्टाचार को मिटाना. बांग्लादेश की गिनती दुनिया के उन देशों में सबसे ऊपर होती है, जहां की शासन व्यवस्था में पारदर्शिता की कमी है.
- न्यायिक स्वतंत्रता, पिछली सरकारों में राजनीतिकरण के आरोपों का सामना कर रही अदालतों में सुधार लाना.
- मीडिया की आजादी
चुनाव में युवा बनाम बुजुर्ग
ट्रांसपरेंसी इंटरनेशनल बांग्लादेश के आंकड़ों के मुताबिक चुनाव मैदान में उतरे उम्मीदवारों में से 27.56 फीसदी उम्मीदवारों की आयु 25 से 44 साल के बीच है. वहीं 9.41 फीसदी उम्मीदवारों की उम्र 25-34 साल के बीच है. पिछले तीन चुनावों के मुकाबले इस चुनाव में इस आयुवर्ग के उम्मीदवारी में बड़ी उछाल देखी गई है. साल 2024 के चुनाव में 25 से 34 साल आयु वर्ग के उम्मीदवारों की हिस्सेदारी 3.96, 2018 में 0.16 और 2014 में शून्य थी. इस चुनाव में इस आयु वर्ग के सबसे अधिक उम्मीदवार नेशनल सिटीजन पार्टी ने उतारे हैं. उसके 28 उम्मीदवारों में से 19 की उम्र 25 से 34 साल के बीच है. वहीं सबसे अधिक 292 सीटों पर चुनाव लड़ रही बीएनपी ने इस आयु वर्ग के केवल दो उम्मीदवार उतारे हैं. वहीं 229 सीटों पर चुनाव लड़ रही जमात ने केवल तीन उम्मीदवार इस आयु वर्ग से उतारे हैं. बीएनपी ने बड़ी आयु के उम्मीदवारों पर भरोसा जताया है. उसने 55 साल से अधिक आयु के 223 उम्मीदवार उतारे हैं. वहीं जमात ने 55 साल से अधिक आयु के केवल 117 उम्मीदवारों पर भरोसा जताया है. साल 2008 के चुनाव की तुलना में इस चुनाव में उम्मीदवारों की औसत आयु में भारी गिरावट आई है. साल 2008 के चुनाव में उम्मीदवारों की औसत आयु 72.01 साल थी. यह इस चुनाव में घटकर 51.8 साल रह गई है.
बांग्लादेश में 2017 में लागू की गई नेशनल यूथ पॉलिसी में 18 से 35 साल के व्यक्ति को युवा माना जाता है.

तारिक रहमान की बीएनपी ने टिकट वितरण में बुजुर्गों को तरजीह दी है.
राजनीतिक विश्वेलषकों का मानना है कि 2024 में शेख हसीना सरकार के खिलाफ हुए छात्र आंदोलन की अगुआई भी इसी युवा वर्ग ने की थी. इसलिए टिकट बंटवारे में एनसीपी ने युवाओं को तरजीह दी है. एनसीपी इस चुनाव में जमात-ए-इस्लामी के साथ गठबंधन कर चुनाव मैदान में उतरी है.
चुनाव पूर्व सर्वेक्षण में कौन आगे
बांग्लादेश के इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ लॉ एंड डिप्लोमैसी ने चुनाव पूर्व सर्वेक्षण किया है. इसमें बीएनपी के नेतृत्व वाले गठबंधन को 44.1 फीसदी वोट हासिल करते हुए दिखाया गया है. वहीं जमात के नेतृत्व वाला 11 दलों का गठबंधन 43.9 फीसद वोट हासिल करते हुए दिखाया गया है.इस तरह दोनों गठबंधनों में कांटे की लड़ाई है. हालांकि कुछ दूसरे चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों में बीएनपी गठबंधन को निर्णायक बढ़त हासिल करते हुए दिखाया गया है.
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