विज्ञापन

जिस घोड़े को यूरोप का समझती थी दुनिया, उसका 'गॉडफादर' निकला चीन, लाखों साल के Fossil DNA स्टडी में खुलासा

एक नई स्टडी से पता चलता है कि असल में घोड़ों की उत्पत्ति लाखों साल पहले उत्तरी अमेरिका में हुई थी और वे चीन में मौजूद एक जेनेटिक मध्यस्थ की वजह से ही यूरोप तक पहुंच पाए.

जिस घोड़े को यूरोप का समझती थी दुनिया, उसका 'गॉडफादर' निकला चीन, लाखों साल के Fossil DNA स्टडी में खुलासा
सांकेतिक तस्वीर
Pixabay

हम सबने इतिहास की किताबों में यही पढ़ा है कि जब स्पेनिश आक्रमणकारी अमेरिका पहुंचे, तो वहां के मूल निवासी चार पैरों वाले एक विशाल जीव को देखकर दंग रह गए थे. माना जाता रहा है कि घोड़े यूरोपीय लोगों की देन थे, जो जहाज में लादकर अमेरिका लाए गए थे. लेकिन इस जानवर के जीवाश्म की डीएमए की स्टडी से कुछ और ही राज सामने आया है.

वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि घोड़ों की उत्पत्ति असल में लाखों साल पहले उत्तरी अमेरिका में हुई थी.वहां से ये घोड़े यूरोप कैसे पहुंचे? इसके पीछे यूरोप का कोई सीधा रास्ता नहीं था, बल्कि चीन का एक ऐसा 'जेनेटिक बिचौलिया' था, जिसे दुनिया अब तक मामूली समझकर भूल चुकी थी. 

पूर्वोत्तर चीन में कभी पाए जाने वाले डालियन घोड़े को वैज्ञानिक पहले एक स्थानीय प्रजाति मानते थे. लेकिन अब पता चला है कि इस विलुप्त हो चुके घोड़े के खून में अमेरिकी पूर्वजों का डीएनए था और इसी ने साइबेरिया के प्राचीन घोड़ों तक इस जेनेटिक विरासत को पहुंचाया. यानी आज जो आधुनिक यूरोपीय घोड़े हम देखते हैं, उनकी जड़ों में जो अमेरिकी डीएनए है, उसका रास्ता चीन से होकर गुजरा था.

जब समुद्र का पानी उतरा और बन गया रास्ता

ये रिसर्च पीयर-रिव्यू जर्नल 'प्रोसीडिंग्स ऑफ द रॉयल सोसाइटी बी: बायोलॉजिकल साइंसेज' में पब्लिश हुआ है. चीन की लेबोरेटरी ऑफ जियोमाइक्रोबायोलॉजी एंड एनवायरनमेंटल चेंजेस के नेतृत्व में वैज्ञानिकों ने इस रहस्य से पर्दा उठाया. अगर घोड़ों के अतीत को समझें, तो घोड़ों के खानदान यानी 'इक्वस' की शुरुआत करीब 40 से 50 लाख साल पहले उत्तरी अमेरिका में हुई थी. आज दुनिया में जितने भी घोड़े, गधे और जेब्रा बचे हैं, वे सब इसी इकलौते खानदान का हिस्सा हैं.

Latest and Breaking News on NDTV

Photo Credit: Pixabay

अब सवाल उठता है कि ये अमेरिका से एशिया और यूरोप कैसे आए? करीब 26 लाख साल पहले ये घोड़े उत्तरी अमेरिका से निकले और 'बेरिंग लैंड ब्रिज' के रास्ते यूरेशिया (एशिया और यूरोप) में दाखिल हुए. बेरिंग लैंड ब्रिज उस दौर में समुद्र का जलस्तर घटने से बना एक जमीनी रास्ता था.

ये आज के रूस के सुदूर पूर्व हिस्से को अमेरिका से जोड़ता था. साल 2025 की एक स्टडी में भी यह सामने आया था कि 'लेट प्लेइस्टोसिन' युग के दौरान जब-जब समुद्र का पानी कम हुआ, घोड़ों ने अमेरिका और एशिया के बीच कई बार आवाजाही की. डालियन घोड़ा इसी ऐतिहासिक जेनेटिक लेन-देन का सबसे बड़ा सबूत बनकर उभरा है.

चीन के घोड़ों में अमेरिकी खून

इस नई स्टडी में वैज्ञानिकों ने डालियन घोड़ों के 20 जीवाश्मों की जांच की, जो लेट प्लेइस्टोसिन युग के थे. ये नमूने चीन के हीलोंगजियांग प्रांत के किंगगांग काउंटी और वहां की राजधानी हार्बिन से मिले थे. वैज्ञानिकों ने इन नमूनों से 'माइटोकॉन्ड्रियल जीनोम' (कोशिकाओं को ऊर्जा देने वाला जेनेटिक मटीरियल) को पूरी तरह रिकवर करने में कामयाबी हासिल की. जब इस डीएनए की जांच हुई, तो उसमें 'ईस्टर्न बेरिंगियन' का एक बेहद खास हिस्सा मिला, जो साफ तौर पर इन चीनी घोड़ों में अमेरिकी पूर्वजों की मौजूदगी को दिखाता है. यह जेनेटिक सिग्नल उत्तर-पूर्व एशिया के किसी दूसरे जीव में नहीं मिला.

वैज्ञानिकों का कहना है कि डालियन घोड़ों और उत्तर-पूर्वी साइबेरियाई घोड़ों का इलाका और समय एक ही था. इनके बीच आपस में काफी जेनेटिक लेन-देन हुआ. यह जेनेटिक अदला-बदली करीब 50,000 साल पहले तक चलती रही. ये उस समय के हिसाब से बिल्कुल सही बैठती है जब बेरिंग लैंड ब्रिज मौजूद था. हालांकि, यह रास्ता हमेशा खुला नहीं रहता था, बल्कि मौसम और समुद्र के स्तर के हिसाब से कभी-कभी और सीमित समय के लिए ही बनता था.

Latest and Breaking News on NDTV

Photo Credit: Pixabay

चीन से साइबेरिया तक फैला था साम्राज्य

इस खोज ने डालियन घोड़ों के रहने के इलाके को लेकर पुरानी धारणाओं को भी बदल दिया है. पहले जब इसके जीवाश्म चीन के डालियन शहर की गुलोंगशान गुफा में मिले थे, तो वैज्ञानिकों को लगा था कि ये सिर्फ उत्तर-पूर्वी चीन तक ही सीमित थे. लेकिन इस नई स्टडी में रूस के याकुतिया से मिले दो घोड़ों के जीवाश्मों की भी जांच की गई. नतीजे हैरान करने वाले थे. उनका डीएनए भी डालियन घोड़े के जेनेटिक दायरे में ही मिला.

इससे साफ हो गया कि लेट प्लेइस्टोसिन युग के दौरान डालियन घोड़े सिर्फ चीन तक सिमटे नहीं थे. उनका साम्राज्य उत्तरी चीन से लेकर उत्तर-पश्चिम में दक्षिणी साइबेरिया और उत्तर-पूर्व में याकुतिया तक फैला हुआ था. वे एक बहुत बड़े इलाके में घूम रहे थे और महाद्वीपों के बीच जेनेटिक पुल का काम कर रहे थे. लेकिन इतिहास में इतना बड़ा रोल निभाने के बावजूद, यह शानदार प्रजाति समय के थपेड़ों को बर्दाश्त नहीं कर पाई और हमेशा के लिए खत्म हो गई.

क्यों मिट गया डालियन घोड़े का नामोनिशान?

दिलचस्प बात यह है कि डालियन घोड़ों के विलुप्त होने की वजह उनके जीन की कमजोरी या जेनेटिक डाइवर्सिटी की कमी नहीं थी. वे अपनी एक जिद या कहें कि एक खास आदत की वजह से मारे गए. 'स्टेबल आइसोटोप एनालिसिस' से वैज्ञानिकों को पता चला कि डालियन घोड़े खाने के मामले नखरीले थे. यानी वे एक खास तरह की सूखी घास ही खाते थे. करीब 40,000 साल पहले जब मौसम ने तेजी से करवट बदली, तो माहौल में नमी बढ़ गई. जो इलाके कभी सूखे घास के मैदान हुआ करते थे, वे दलदल और गीली जमीनों में बदलने लगे.

मौसम बदलने से घास का मिजाज बदला, लेकिन डालियन घोड़ा खुद को नहीं बदल पाया. भारी-भरकम शरीर और खान-पान में बदलाव न कर पाने की आदत की वजह से वे भूखे मरने लगे. उनके लिए जरूरी चारा गायब हो चुका था, जिसके चलते वे तेजी से विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गए.

Source: Proceedings of the Royal Society B: Biological SciencesState Key Laboratory of Geomicrobiology and Environmental Changes

यह भी पढ़ें: AI में भी आ सकती है जीवों जैसी चेतना, दो वैज्ञानिकों की रिसर्च में सनसनीखेज दावा

पूरी स्टोरी पढ़ें

NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं

फॉलो करे:
Horse, DNA
Listen to the latest songs, only on JioSaavn.com