हम सबने इतिहास की किताबों में यही पढ़ा है कि जब स्पेनिश आक्रमणकारी अमेरिका पहुंचे, तो वहां के मूल निवासी चार पैरों वाले एक विशाल जीव को देखकर दंग रह गए थे. माना जाता रहा है कि घोड़े यूरोपीय लोगों की देन थे, जो जहाज में लादकर अमेरिका लाए गए थे. लेकिन इस जानवर के जीवाश्म की डीएमए की स्टडी से कुछ और ही राज सामने आया है.
वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि घोड़ों की उत्पत्ति असल में लाखों साल पहले उत्तरी अमेरिका में हुई थी.वहां से ये घोड़े यूरोप कैसे पहुंचे? इसके पीछे यूरोप का कोई सीधा रास्ता नहीं था, बल्कि चीन का एक ऐसा 'जेनेटिक बिचौलिया' था, जिसे दुनिया अब तक मामूली समझकर भूल चुकी थी.
पूर्वोत्तर चीन में कभी पाए जाने वाले डालियन घोड़े को वैज्ञानिक पहले एक स्थानीय प्रजाति मानते थे. लेकिन अब पता चला है कि इस विलुप्त हो चुके घोड़े के खून में अमेरिकी पूर्वजों का डीएनए था और इसी ने साइबेरिया के प्राचीन घोड़ों तक इस जेनेटिक विरासत को पहुंचाया. यानी आज जो आधुनिक यूरोपीय घोड़े हम देखते हैं, उनकी जड़ों में जो अमेरिकी डीएनए है, उसका रास्ता चीन से होकर गुजरा था.
जब समुद्र का पानी उतरा और बन गया रास्ता
ये रिसर्च पीयर-रिव्यू जर्नल 'प्रोसीडिंग्स ऑफ द रॉयल सोसाइटी बी: बायोलॉजिकल साइंसेज' में पब्लिश हुआ है. चीन की लेबोरेटरी ऑफ जियोमाइक्रोबायोलॉजी एंड एनवायरनमेंटल चेंजेस के नेतृत्व में वैज्ञानिकों ने इस रहस्य से पर्दा उठाया. अगर घोड़ों के अतीत को समझें, तो घोड़ों के खानदान यानी 'इक्वस' की शुरुआत करीब 40 से 50 लाख साल पहले उत्तरी अमेरिका में हुई थी. आज दुनिया में जितने भी घोड़े, गधे और जेब्रा बचे हैं, वे सब इसी इकलौते खानदान का हिस्सा हैं.

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अब सवाल उठता है कि ये अमेरिका से एशिया और यूरोप कैसे आए? करीब 26 लाख साल पहले ये घोड़े उत्तरी अमेरिका से निकले और 'बेरिंग लैंड ब्रिज' के रास्ते यूरेशिया (एशिया और यूरोप) में दाखिल हुए. बेरिंग लैंड ब्रिज उस दौर में समुद्र का जलस्तर घटने से बना एक जमीनी रास्ता था.
चीन के घोड़ों में अमेरिकी खून
इस नई स्टडी में वैज्ञानिकों ने डालियन घोड़ों के 20 जीवाश्मों की जांच की, जो लेट प्लेइस्टोसिन युग के थे. ये नमूने चीन के हीलोंगजियांग प्रांत के किंगगांग काउंटी और वहां की राजधानी हार्बिन से मिले थे. वैज्ञानिकों ने इन नमूनों से 'माइटोकॉन्ड्रियल जीनोम' (कोशिकाओं को ऊर्जा देने वाला जेनेटिक मटीरियल) को पूरी तरह रिकवर करने में कामयाबी हासिल की. जब इस डीएनए की जांच हुई, तो उसमें 'ईस्टर्न बेरिंगियन' का एक बेहद खास हिस्सा मिला, जो साफ तौर पर इन चीनी घोड़ों में अमेरिकी पूर्वजों की मौजूदगी को दिखाता है. यह जेनेटिक सिग्नल उत्तर-पूर्व एशिया के किसी दूसरे जीव में नहीं मिला.
वैज्ञानिकों का कहना है कि डालियन घोड़ों और उत्तर-पूर्वी साइबेरियाई घोड़ों का इलाका और समय एक ही था. इनके बीच आपस में काफी जेनेटिक लेन-देन हुआ. यह जेनेटिक अदला-बदली करीब 50,000 साल पहले तक चलती रही. ये उस समय के हिसाब से बिल्कुल सही बैठती है जब बेरिंग लैंड ब्रिज मौजूद था. हालांकि, यह रास्ता हमेशा खुला नहीं रहता था, बल्कि मौसम और समुद्र के स्तर के हिसाब से कभी-कभी और सीमित समय के लिए ही बनता था.

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चीन से साइबेरिया तक फैला था साम्राज्य
इस खोज ने डालियन घोड़ों के रहने के इलाके को लेकर पुरानी धारणाओं को भी बदल दिया है. पहले जब इसके जीवाश्म चीन के डालियन शहर की गुलोंगशान गुफा में मिले थे, तो वैज्ञानिकों को लगा था कि ये सिर्फ उत्तर-पूर्वी चीन तक ही सीमित थे. लेकिन इस नई स्टडी में रूस के याकुतिया से मिले दो घोड़ों के जीवाश्मों की भी जांच की गई. नतीजे हैरान करने वाले थे. उनका डीएनए भी डालियन घोड़े के जेनेटिक दायरे में ही मिला.
क्यों मिट गया डालियन घोड़े का नामोनिशान?
दिलचस्प बात यह है कि डालियन घोड़ों के विलुप्त होने की वजह उनके जीन की कमजोरी या जेनेटिक डाइवर्सिटी की कमी नहीं थी. वे अपनी एक जिद या कहें कि एक खास आदत की वजह से मारे गए. 'स्टेबल आइसोटोप एनालिसिस' से वैज्ञानिकों को पता चला कि डालियन घोड़े खाने के मामले नखरीले थे. यानी वे एक खास तरह की सूखी घास ही खाते थे. करीब 40,000 साल पहले जब मौसम ने तेजी से करवट बदली, तो माहौल में नमी बढ़ गई. जो इलाके कभी सूखे घास के मैदान हुआ करते थे, वे दलदल और गीली जमीनों में बदलने लगे.
मौसम बदलने से घास का मिजाज बदला, लेकिन डालियन घोड़ा खुद को नहीं बदल पाया. भारी-भरकम शरीर और खान-पान में बदलाव न कर पाने की आदत की वजह से वे भूखे मरने लगे. उनके लिए जरूरी चारा गायब हो चुका था, जिसके चलते वे तेजी से विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गए.
Source: Proceedings of the Royal Society B: Biological Sciences, State Key Laboratory of Geomicrobiology and Environmental Changes
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