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जिसने फिजिक्स को बदल दिया वो फिजिक्स में फेल हो गया था, NEET-JEE की तैयारी करने वाले देख लें स्विट्जरलैंड से NDTV की ये रिपोर्ट

आज, ETH ज्यूरिख में  आगंतुक वहां तस्वीरें, पत्र, उनके द्वारा पिए जाने वाले पाइप की प्रतिकृति (रेप्लिका), कहानियां, आवाज की रिकॉर्डिंग और यहां तक कि मोजे का किस्सा भी देखते हैं. फिर भी शायद सबसे अहम वस्तु अदृश्य है. वह है इससे मिलने वाली सीख.

जिसने फिजिक्स को बदल दिया वो फिजिक्स में फेल हो गया था, NEET-JEE की तैयारी करने वाले देख लें स्विट्जरलैंड से NDTV की ये रिपोर्ट
यूनिवर्सिटी के रिकॉर्ड बताते हैं कि आइंस्टीन अक्सर लेक्चर छोड़ देते थे.
ETH

मानव इतिहास के सबसे महान वैज्ञानिकों में से एक के बारे में यह एक बहुत कम ज्ञात तथ्य है कि वे फिजिक्स की क्लास में फेल हो गए थे. जी हां, अल्बर्ट आइंस्टीन को ज्यूरिख के फेडरल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (ETH) में पढ़ाई के दौरान फेलिंग ग्रेड मिला था. तब इसे स्विस फेडरल पॉलिटेक्निक के तौर पर जाना जाता था.

उनकी यह असफलता इस प्रतिष्ठित संस्थान के अभिलेखागार (आर्काइव्स) में सुरक्षित उनके मार्कशीट में दर्ज है. यह इस बात की याद दिलाता है कि शैक्षणिक विफलताएं हमेशा किसी व्यक्ति के भविष्य को तय नहीं करती हैं. ETH के रिकॉर्ड में आइंस्टीन को 'एक औसत छात्र से नोबेल पुरस्कार विजेता' के तौर पर दर्ज किया गया है.

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Photo Credit: Pallava Bagla/NDTV

भारत में नेशनल एलिजिबिलिटी कम एंट्रेंस टेस्ट (NEET) जैसी मेडिकल प्रवेश परीक्षाओं और इंजीनियरिंग प्रवेश के लिए जॉइंट एंट्रेंस एग्जाम (JEE) की उत्सुकता से तैयारी कर रहे लाखों छात्रों और उनके मार्क्स- रैंकिंग को लेकर चिंतित माता-पिता के लिए आइंस्टीन की कहानी एक पैगाम है कि सफलता हमेशा एक सीधी रेखा में नहीं चलती. कभी-कभी एक छात्र जो औपचारिक शिक्षा के कड़े ढांचे के भीतर संघर्ष करता है, वह आगे चलकर दुनिया को बदल सकता है.

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जब एनडीटीवी (NDTV) के साइंस एडिटर पल्लव बागला ने स्विट्जरलैंड में ETH ज्यूरिख का दौरा किया, तो इस प्रसिद्ध भौतिक विज्ञानी के छात्र लॉकर पर केंद्रित एक उल्लेखनीय संग्रहालय प्रदर्शनी के जरिए आइंस्टीन के विश्वविद्यालय के दिन जीवंत हो उठे.

आज, यह लॉकर विश्वविद्यालय के सबसे पसंदीदा आकर्षणों में से एक बन गया है. ये दुनिया भर के पर्यटकों, विज्ञान प्रेमियों और छात्रों को उस व्यक्ति के जीवन की एक झलक पाने के लिए आकर्षित करता है जिसने भौतिकी में क्रांति ला दी थी.

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यह नया रूप दिया गया शानदार लकड़ी का लॉकर एक छात्र के स्टोरेज कैबिनेट से कहीं अधिक है. यह आइंस्टीन के जीवन की एक खिड़की है. इसके अंदर उनके परिवार की तस्वीरें, पत्रों और लेखों की कॉपियां, उनके निजी तौर-तरीकों के बारे में कहानियां और जर्मन भाषा में बोलते हुए उनकी आवाज की रिकॉर्डिंग शामिल हैं. आगंतुक खुद आइंस्टीन को सुन सकते हैं, जो इतिहास को जीवंत कर देता है.

वहां उनकी पहली पत्नी मिलेवा मैरिक, उनके बच्चों हैंस अल्बर्ट और एडुआर्ड और बाद में उनकी दूसरी पत्नी एल्सा लोवेनथल की तस्वीरें हैं. इस प्रदर्शनी में आइंस्टीन के कुछ लेखन और किस्से भी शामिल हैं जो उनके लीक से हटकर व्यक्तित्व को हमारे सामने लाती है.

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एक कहानी जो आगंतुकों को खूब रास आती है, वह है आइंस्टीन का मोजे न पहनना. ETH की इंटरनेशनल कम्युनिकेशन ऑफिसर मैरिएन लुसिएन ने एक समुद्र तट पर आइंस्टीन की एक तस्वीर की ओर इशारा करते हुए एक मशहूर किस्सा सुनाया. 

उन्होंने कहा, "आइंस्टीन कभी मोजे पहनना पसंद नहीं करते थे. अपने एक सहकर्मी को लिखे पत्र में, आइंस्टीन लिखते हैं कि सबसे गंभीर अवसरों पर भी, वे बिना मोजे पहने ही निकल जाते थे और मोजे न पहनने की इस कमी को ऊंचे जूते पहनकर छिपा लेते थे."

उन्होंने यह भी बताया कि आइंस्टीन ने बिना मोजे पहने ही व्हाइट हाउस का दौरा किया था और अमेरिकी राष्ट्रपति वॉरेन जी. हार्डिंग से मुलाकात की थी.

अल्बर्ट आइंस्टीन ETH में अपने सहकर्मियों के साथ

अल्बर्ट आइंस्टीन ETH में अपने सहकर्मियों के साथ
Photo Credit: ETH

लेकिन सबसे दिलचस्प कहानी आइंस्टीन के शैक्षणिक ट्रांसक्रिप्ट पर हाथ से लिखे एक बड़े "1" से संबंधित है, जो कि एक फेल ग्रेड है (इसे प्रदर्शनी में प्रदर्शित नहीं किया गया है). मैरिएन बताती हैं, "1896 और 1900 के बीच एक छात्र के तौर पर अल्बर्ट आइंस्टीन के मूल ट्रांसक्रिप्ट से पता चलता है कि वे वास्तव में क्लास जाना पसंद नहीं करते थे."

वह आगे कहती हैं, "उनके ट्रांसक्रिप्ट में फिजिक्स के एक प्रैक्टिकल कोर्स के सामने हाथ से लिखा हुआ एक बहुत बड़ा नंबर एक (1) है और यह उनके ट्रांसक्रिप्ट के अन्य अंकों की तुलना में लगभग दोगुने आकार का है. और वह 'एक' फिजिक्स के प्रैक्टिकल कोर्स में फेलिंग ग्रेड का प्रतीक है. ये एक लैबोरेटरी कोर्स था जिसमें आइंस्टीन मुमकिन है कि शामिल ही नहीं हुए थे."

यह विडंबना असाधारण है. जिस छात्र ने बाद में फिजिक्स को पूरी तरह बदल दिया, वह फिजिक्स के एक कोर्स में फेल हो गया था. फिर भी इसके पीछे के कारण हमें आइंस्टीन के व्यक्तित्व के बारे में बहुत कुछ बताते हैं. 

ETH ज्यूरिख की तरफ से सुरक्षित रिकॉर्ड के अनुसार, युवा आइंस्टीन की नियमित लैब के काम में कम रुचि थी और वे ब्रह्मांड के थ्योरेटिकल सवालों से कहीं अधिक आकर्षित थे.

मार्च 1899 में, जब वे प्रैक्टिकल फिजिक्स पढ़ाने वाले प्रोफेसर जीन पर्नेट के सामने उपस्थित हुए, तो आइंस्टीन की खराब अटेंडडेंस और लैब के प्रति उत्साह की कमी को नजरअंदाज करना असंभव हो गया था क्योंकि वे नियमित रूप से क्लासेस बंक करते थे. प्रोफेसर ने आखिरकार उन्हें सबसे कम संभव ग्रेड देकर फेल कर दिया.

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ETH का आधिकारिक रिकॉर्ड प्रोफेसर और छात्र के बीच एक यादगार बातचीत को दर्ज करता है. जब प्रोफेसर ने उनसे पूछा कि उन्होंने भौतिकी के बजाय चिकित्सा (मेडिसिन), कानून (लॉ) या भाषाशास्त्र (फिलोलोजी) को क्यों नहीं चुना, तो आइंस्टीन ने जवाब दिया, "क्योंकि मेरे पास उनके लिए कोई प्रतिभा नहीं है, प्रोफेसर. मुझे कम से कम फिजिक्स में हाथ क्यों नहीं आजमाना चाहिए?"

वह आत्मविश्वास पूरी तरह से सही साबित होने वाला था. आइंस्टीन ने अक्टूबर 1896 में महज 17 साल की उम्र में ETH ज्यूरिख में दाखिला लिया था. तब भी वे अपने साथी छात्रों से अलग थे. दशकों बाद, उन्होंने अपने विश्वविद्यालय के दिनों को उल्लेखनीय ईमानदारी के साथ याद किया.

ETH रिकॉर्ड्स के अनुसार, आइंस्टीन ने 1955 में लिखा था कि एक अच्छे छात्र में जानकारी को आसानी से आत्मसात करने, लगन से लेक्चर नोट्स बनाने और सौंपे गए काम को ईमानदारी से पूरा करने की क्षमता होनी चाहिए. 

आइंस्टीन ने स्वीकार किया, "अफसोस की बात है कि मुझे एहसास हुआ कि मुझमें मौलिक रूप से इन सभी गुणों की कमी थी." इसके बजाय, उन्होंने खुद को 'एक आवारा और अकेला रहने वाला' बताया. ये शब्द अब आइंस्टीन की किंवदंती का हिस्सा हैं.

हालांकि, पारंपरिक शैक्षणिक अनुशासन में उनके पास जो कमी थी, उसकी भरपाई उन्होंने असाधारण जिज्ञासा से की. वे प्रकृति के सबसे गहरे रहस्यों को समझने के प्रति जुनूनी थे.

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ETH के रिकॉर्ड बताते हैं कि आइंस्टीन अक्सर लेक्चर्स छोड़ देते थे. उनके करीबी दोस्त मार्सेल ग्रॉसमैन अक्सर सावधानीपूर्वक तैयार किए गए लेक्चर नोट्स साझा करके उन्हें बचाते थे. ग्रॉसमैन के नोट्स ने आइंस्टीन को परीक्षाओं में पास होने और अंततः स्नातक (ग्रेजुएट) करने में मदद की.

तब भी, आइंस्टीन शायद ही कोई स्टार स्टूडेंट थे. उन्होंने 4.91 के औसत स्कोर के साथ स्नातक की उपाधि प्राप्त की और वे अपनी क्लास में नीचे के पायदान पर थे. ETH के रिकॉर्ड दिखाते हैं कि वे एकमात्र ऐसे स्नातक थे जिन्हें असिस्टेंटशिप की पेशकश नहीं की गई थी. इसके बाद उन्हें लगातार रिजेक्शन का सामना करना पड़ा.

उनके छात्र रिकॉर्ड को देखकर, बहुत कम लोग यह भविष्यवाणी कर सकते थे कि यह युवा एक दिन इतिहास का सबसे प्रसिद्ध वैज्ञानिक बनेगा.

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आइंस्टीन के जीवन का एक और महत्वपूर्ण अध्याय भी ETH ज्यूरिख से ही शुरू हुआ था. मिलेवा मैरिक एक प्रतिभाशाली सर्बियाई छात्रा थीं. वह आइंस्टीन की क्लास में इकलौती महिला थीं. दोनों की मुलाकात फिजिक्स और गणित की पढ़ाई के दौरान हुई और जल्द ही उनके बीच एक करीबी रिश्ता बन गया.

मैरिएन लुसिएन ने एनडीटीवी को बताया, "यह अल्बर्ट आइंस्टीन की पहली पत्नी हैं. जब उन्होंने यहां पढ़ाई की थी, तब वह क्लास में अकेली महिला थीं."

आइंस्टीन उनका बहुत सम्मान करते थे. एक खत में आइंस्टीन ने मिलेवा को लिखा था, "मैं कितना खुश होऊंगा जब हम दोनों मिलकर सापेक्ष गति (relative motion) पर अपने काम को एक सफल निष्कर्ष पर ले जाएंगे."

इतिहासकार अभी भी आइंस्टीन के वैज्ञानिक कार्यों में मिलेवा के योगदान की सीमा पर बहस करते हैं. जिस बात पर कोई विवाद नहीं है, वह यह है कि वह असाधारण रूप से प्रतिभाशाली थीं और उन्होंने उनके शुरुआती जीवन में एक बड़ी भूमिका निभाई थी.

इस जोड़े ने शादी की और उनके बच्चे हुए. लेकिन आखिरकार यह शादी टूट गई. तब तक आइंस्टीन की प्रसिद्धि बढ़ रही थी. उन्होंने मिलेवा को तलाक दे दिया और बाद में अपनी चचेरी बहन एल्सा से शादी कर ली.

अल्बर्ट आइंस्टीन और उनकी पहली पत्नी मिलेवा मैरिक की मुलाकात ETH में हुई थी.

अल्बर्ट आइंस्टीन और उनकी पहली पत्नी मिलेवा मैरिक की मुलाकात ETH में हुई थी.
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ETH ज्यूरिख में डिस्प्ले के पास खड़ी मैरिएन लुसिएन, एल्सा की एक तस्वीर की ओर इशारा करते हुए कहती हैं, "वह वही हैं जो मिलेवा से तलाक के बाद उनके साथ रहीं और वे उनकी पहली चचेरी बहन थीं. इसलिए उस समय के हिसाब से यह काफी हद तक विवादास्पद था." 

बीसवीं सदी की शुरुआत के सामाजिक मानकों के अनुसार अपनी चचेरी बहन से शादी करना वास्तव में विवादास्पद था. ग्रेजुएशन होने के बाद, आइंस्टीन का करियर तुरंत उड़ान नहीं भर सका. वह बर्न में स्विस पेटेंट कार्यालय में काम मिलने से पहले वे अस्थायी नौकरियों में भटकते रहे.

विडंबना यह है कि विश्वविद्यालय की लैब्स और शैक्षणिक राजनीति से दूर, इसी स्थान पर उनकी प्रतिभा निखरकर सामने आई. अपने खाली समय में काम करते हुए, आइंस्टीन ने शोध पत्रों की एक ऐसी सीरीज तैयार की जिसने विज्ञान को हमेशा के लिए बदल दिया.

आइंस्टीन के बारे में सबसे बड़ी गलतफहमियों में से एक उनके नोबेल पुरस्कार को लेकर है. ज्यादातर लोग यह मानते हैं कि उन्हें 'थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी' (सापेक्षता के सिद्धांत) के लिए फिजिक्स का नोबेल पुरस्कार मिला था. ऐसा नहीं है. आइंस्टीन को वास्तव में फोटोइलेक्ट्रिक इफेक्ट (प्रकाश विद्युत प्रभाव) और पीजोइलेक्ट्रिसिटी पर उनके काम के लिए नोबेल पुरस्कार मिला था, न कि थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी के लिए.

फोटोइलेक्ट्रिक इफेक्ट ने यह समझाया कि कैसे प्रकाश किसी सामग्री से इलेक्ट्रॉनों को मुक्त कर सकता है. इस क्रांतिकारी खोज ने क्वांटम फिजिक्स की नींव स्थापित करने में मदद की.

उस काम का प्रभाव आज भी जारी है. आधुनिक तकनीकें जैसे कि सोलर सेल्स, इलेक्ट्रॉनिक इमेजिंग सिस्टम और डिजिटल दुनिया के कई हिस्से उन वैज्ञानिक सिद्धांतों से जुड़े हैं जिन्हें खोजने में आइंस्टीन ने मदद की थी. प्रकाश और पदार्थ की जो समझ उनके काम से उभरी, वह तकनीकी आधार का हिस्सा बन गई जो जीपीएस (GPS) नेविगेशन और स्मार्टफोन संचार में इस्तेमाल की जाने वाली प्रणालियों सहित अनगिनत आधुनिक उपकरणों को सपोर्ट करती है.

ETH यूनिवर्सिटी

ETH यूनिवर्सिटी
Photo Credit: Pallava Bagla/NDTV

आज, ETH ज्यूरिख में  आगंतुक वहां तस्वीरें, पत्र, उनके द्वारा पिए जाने वाले पाइप की प्रतिकृति (रेप्लिका), कहानियां, आवाज की रिकॉर्डिंग और यहां तक कि मोजे का किस्सा भी देखते हैं. फिर भी शायद सबसे अहम वस्तु अदृश्य है. वह है इससे मिलने वाली सीख.

एक युवा जो फिजिक्स की क्लास में फेल हो गया था, वह दुनिया का सबसे प्रसिद्ध भौतिक विज्ञानी बना. एक छात्र जिसने खुद को आवारा और अकेला रहने वाला कहा, उसने नोबेल पुरस्कार जीता. एक ग्रेजुएट जिसे नौकरी पाने के लिए संघर्ष करना पड़ा, उसने अंतरिक्ष, समय, प्रकाश और ब्रह्मांड के प्रति मानवता की समझ को बदल दिया.

इसलिए अगली बार जब कोई बच्चा परीक्षा के बाद निराश होकर घर लौटे, तो याद रखें कि अल्बर्ट आइंस्टीन भी एक परीक्षा में फेल हुए थे.

NEET कठिन हो सकता है. JEE की प्रतियोगिता भयंकर हो सकती है. मार्क्स मायने रखते हैं, लेकिन वे सब कुछ नहीं हैं.

जुनून मायने रखता है. जिज्ञासा मायने रखती है. दृढ़ता मायने रखती है और कभी-कभी जो छात्र आज किसी क्लास में फेल होता है, वह शायद कल दुनिया बदलने की तैयारी कर रहा होता है.

(एनडीटीवी को प्रेजेंस स्विट्जरलैंड, संघीय विदेश मंत्रालय, स्विट्जरलैंड द्वारा ETH का दौरा करने के लिए आमंत्रित किया गया था)

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