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जब एक मां ने Einstein से पूछा, मैं क्‍या करूं कि बच्‍चा वैज्ञानिक बने...आइंस्‍टीन ने दिया ऐसा जवाब, सुनकर होश फाख्‍ता हो जाएंगे

महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन को असाधारण बुद्धिमत्ता और वैज्ञानिक खोजों के लिए जाना जाता है. लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि बच्चों की शिक्षा और बुद्धिमत्ता को लेकर उनके विचार कितने अलग थे.

जब एक मां ने Einstein से पूछा, मैं क्‍या करूं कि बच्‍चा वैज्ञानिक बने...आइंस्‍टीन ने दिया ऐसा जवाब, सुनकर होश फाख्‍ता हो जाएंगे

महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन को असाधारण बुद्धिमत्ता और वैज्ञानिक खोजों के लिए जाना जाता है. लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि बच्चों की शिक्षा और बुद्धिमत्ता को लेकर उनके विचार कितने अलग थे. ऐसा ही उनसे जुड़ा एक किस्‍सा बहुत मशहूर है. जिसमें एक मां ने उनसे पूछा कि वह क्‍या करे कि उसका बच्‍चा महान वैज्ञानिक बने, इसके जवाब में आइंस्‍टीन ने जो कहा था, उसे सुनकर किसी के भी होश उड़ जाएं.    

मशहूर है कहानी- आइंस्‍टीन ने दिया मजेदार जवाब 

एक मां ने आइंस्टीन से पूछा कि वह चाहती है कि उसका बेटा भविष्य में महान वैज्ञानिक बने, तो उसे क्या करना चाहिए. आइंस्टीन ने तुरंत जवाब दिया, 'उसे परी कथाएं पढ़ाइए'. मां को यह उत्तर अजीब लगा. उसने सोचा कि शायद महान वैज्ञानिक बनने के लिए गणित, विज्ञान और कठिन अध्ययन की आवश्यकता होगी. जब उसने दोबारा पूछा कि बच्चे को और अधिक बुद्धिमान बनाने के लिए क्या करना चाहिए, तो आइंस्टीन ने फिर कहा, 'और अधिक परी कथाएं पढ़ाइए'.   

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जवाब के पीछे गहरी सोच 

पहली नजर में यह जवाब अजीब लग सकता है, लेकिन इसके पीछे गहरी सोच छिपी है. आइंस्टीन का मानना था कि कल्पनाशक्ति (Imagination) किसी भी महान वैज्ञानिक, आविष्कारक या विचारक की सबसे बड़ी ताकत होती है. परी कथाएं बच्चों को नई दुनिया की कल्पना करने, अलग तरह से सोचने और रचनात्मकता विकसित करने का अवसर देती हैं.   

आइंस्टीन की सोच 

आइंस्टीन ने कई बार कहा था कि केवल तथ्यों को याद कर लेना ही बुद्धिमत्ता नहीं है. असली बुद्धिमत्ता नए विचार पैदा करने, समस्याओं को अलग दृष्टिकोण से देखने और जिज्ञासा बनाए रखने में है. उनका मानना था कि कहानियां बच्चों के मन में सवाल पैदा करती हैं और उन्हें सोचने के लिए प्रेरित करती हैं. यही गुण आगे चलकर वैज्ञानिक सोच का आधार बनते हैं.   

पारंपरिक शिक्षा पद्धति के आलोचक

आइंस्टीन पारंपरिक शिक्षा पद्धति के आलोचक थे. उनका विश्वास था कि सीखना मजेदार होना चाहिए. वे मानते थे कि जब बच्चे किसी विषय में रुचि लेते हैं और उसे खुशी के साथ सीखते हैं, तब उनका विकास सबसे बेहतर होता है.   

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