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दुनिया के गरीब देशों ने उठाया संसार को बचाने वाला कदम, बन रही 8000 किलोमीटर ग्रेट ग्रीन वॉल

20 से ज्यादा अफ्रीकी देश, अंतरराष्ट्रीय संगठनों, डेवलपमेंट बैंकों और पर्यावरण समूहों के साथ मिलकर इस पहल का समर्थन कर रहे हैं. हाल के अनुमानों से पता चलता है कि लगभग 30 मिलियन हेक्टेयर जमीन को पहले ही बहाल किया जा चुका है.

दुनिया के गरीब देशों ने उठाया संसार को बचाने वाला कदम, बन रही 8000 किलोमीटर ग्रेट ग्रीन वॉल
अफ्रीका के ग्रेट ग्रीन वॉल की तस्वीर.
  • अफ्रीका ने ग्रेट ग्रीन वॉल परियोजना की शुरुआत की, जो सहारा के पास सूखे इलाके में 8,000 किलोमीटर तक फैली है
  • इस पहल का उद्देश्य पेड़ लगाने के साथ-साथ खराब जमीन को उपजाऊ बनाना और जलवायु परिवर्तन से मुकाबला करना है
  • ग्रेट ग्रीन वॉल में जंगलों, घास के मैदानों, खेती की जमीन और दलदली इलाकों की बहाली भी शामिल है

एक पहल पूरी दुनिया बदल देती है. गांधी, लेनिन, लिंकन के विचारों ने पूरी दुनिया को एक नई दिशा दी. इसी तरह दुनिया के नक्शे में सबसे पिछड़ा माने जाने वाला अफ्रीका एक राह दिखा रहा है. पहले जब लोग ग्लोबल वार्मिंग की बातें सुनते थे तो लगता था कि ये दूर की कौड़ी है. मगर भारत से लेकर यूरोप तक इसका असर अब दिखने लगा है. भारत में गर्मी से लेकर बारिश और सर्दी सब पर असर दिख रहा है. दिल्ली से लेकर बिहार तक की हवा में प्रदूषण घुल गया है. अमेरिका से लेकर यूरोप तक गर्मी से तप रहे हैं. तो अब ग्लोबल वार्मिंग सिर्फ एक चेतावनी नहीं बल्कि हकीकत है.  

अफ्रीका ने मार ली बाजी

पूरी दुनिया बातों में लगी रही. एक-दूसरे पर आरोप लगाती रही, मगर अफ्रीकी देशों ने इस पर काम शुरू कर दिया.  चीन की ग्रेट वॉल  की तरह अफ्रीका ने ग्रेट ग्रीन वॉल पर काम शुरू कर दिया. 'ग्रेट ग्रीन वॉल' को अफ्रीकी संघ ने 2007 में शुरू किया था. अब इसका असर दिख रहा है. हालांकि, इसका लक्ष्य इतना बड़ा है कि इसे पूरा होने में अभी कई साल और लगेंगे. सेनेगल के अटलांटिक तट से लेकर लाल सागर पर जिबूती के तट तक फैली यह परियोजना, पर्यावरण से जुड़ी अब तक की सबसे बड़ी और महत्वाकांक्षी परियोजनाओं में से एक है. यह पहल सहारा रेगिस्तान से सटे साहेल के आंशिक रूप से सूखे इलाके में लगभग 8,000 किलोमीटर तक फैली है. 

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मकसद सिर्फ पेड़ लगाना नहीं

इसका मकसद सिर्फ पेड़ लगाना नहीं है. इस परियोजना का लक्ष्य खराब हो चुकी जमीन को फिर से उपजाऊ बनाना, रेगिस्तान बनने की प्रक्रिया को रोकना, खाद्य सुरक्षा को मजबूत करना, लाखों नौकरियां पैदा करना और समुदायों को जलवायु परिवर्तन के अनुकूल ढलने में मदद करना है. 'ग्रेट ग्रीन वॉल' में पेड़ लगाने के साथ-साथ जंगलों, घास के मैदानों, खेती की जमीन और दलदली जमीन को फिर से ठीक करने का काम भी शामिल है. इस पहल से दुनिया के जलवायु परिवर्तन से सबसे ज्यादा प्रभावित इलाकों में से एक में फिर से जान आ रही है.

शुरुआती योजना लगभग 8,000 किलोमीटर लंबी और करीब 15 किलोमीटर चौड़ी पेड़ों की एक लगातार पट्टी बनाने की थी. मगर, धीरे-धीरे वैज्ञानिकों और पर्यावरण संरक्षण करने वालों को एहसास हुआ कि पेड़ों की सिर्फ एक लाइन लगाने के बजाय जमीन और प्राकृतिक इलाकों को फिर से ठीक करना ज्यादा असरदार होगा. आज, यह पहल स्थानीय हालात के हिसाब से जंगलों, घास के मैदानों, वेटलैंड्स (नम भूमि), खेती की जमीन और वहां की मूल वनस्पतियों को फिर से जीवित करने पर ध्यान देती है. चीन और भारत भी अब इसी तरह की पहल कर रहे हैं. भारत के गुजरात में ग्रीन वॉल बनाई जा रही है. यह दीवार गुजरात के पोरबंदर से शुरू होकर राजस्थान और हरियाणा से होते हुए दिल्ली-हरियाणा सीमा (पानीपत) तक जाएगी. इस ग्रीन वॉल की कुल लंबाई 1,400 किलोमीटर और चौड़ाई 5 किलोमीटर होगी.

साहेल इलाका दशकों से रेगिस्तान में तब्दील होने, लंबे समय तक सूखे, जमीन की गुणवत्ता खराब होने और जलवायु परिवर्तन जैसी समस्याओं का एक साथ सामना कर रहा है. इस इलाके में रहने वाले लाखों लोग अपनी आजीविका के लिए खेती और पशुपालन पर निर्भर हैं. उपजाऊ जमीन के खराब होने और बारिश के अनिश्चित होने की वजह से, यहां के लोगों को फसल की पैदावार घटने, भोजन की कमी और गरीबी जैसी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है.  'ग्रेट ग्रीन वॉल' का मकसद जमीन की सेहत सुधारकर, पानी रोकने की क्षमता बढ़ाकर, हरियाली बढ़ाकर और खेती की जमीन को ज्यादा उपजाऊ बनाकर इस स्थिति को बदलना है. इस पहल से जैव-विविधता के मजबूत होने और बेहतर मौकों की तलाश में लोगों को अपना घर छोड़ने पर मजबूर करने वाले दबाव को कम करने की भी उम्मीद है.

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अपने नाम के बावजूद, 'ग्रेट ग्रीन वॉल' पूरे महाद्वीप में फैली पेड़ों की कोई एक लगातार चलने वाली लाइन नहीं है. इसके बजाय, यह स्थानीय इकोसिस्टम के हिसाब से बनाए गए बहाली प्रोजेक्ट्स का एक समूह है. कुछ इलाकों में स्थानीय पेड़ लगाए जाते हैं. वहीं दूसरी जगहों पर, किसान अपने-आप उगने वाली वनस्पतियों की रक्षा करते हैं, घास के मैदानों को फिर से ठीक करते हैं, मिट्टी की क्वालिटी सुधारते हैं, बारिश का पानी जमा करते हैं या खेती के ज्यादा टिकाऊ तरीके अपनाते हैं. यह लचीला तरीका यह पक्का करने में मदद करता है कि बहाली की कोशिशें स्थानीय मौसम के हिसाब से हों, न कि किसी एक ही समाधान पर निर्भर रहें जो हर जगह लागू हो. 

30 मिलियन हेक्टेयर जमीन अब सेहतमंद

20 से ज्यादा अफ्रीकी देश, अंतरराष्ट्रीय संगठनों, डेवलपमेंट बैंकों और पर्यावरण समूहों के साथ मिलकर इस पहल का समर्थन कर रहे हैं. हाल के अनुमानों से पता चलता है कि लगभग 30 मिलियन हेक्टेयर जमीन को पहले ही बहाल किया जा चुका है. हालांकि यह काफी बड़ी प्रगति है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना ​​है कि प्रोजेक्ट के 2030 के सभी लक्ष्यों को हासिल करने के लिए और फंडिंग, मजबूत क्षेत्रीय सहयोग और संघर्ष वाले इलाकों में बेहतर सुरक्षा की जरूरत होगी. इसकी सफलता सिर्फ लगाए गए पेड़ों की संख्या से नहीं मापी जाएगी, बल्कि बेहतर मिट्टी, फलते-फूलते वन्यजीवों, ज्यादा सुरक्षित आजीविका और बदलते मौसम का सामना करने की बेहतर क्षमता से मापी जाएगी. हालांकि, अभी इसमें बहुत ज्यादा प्रगति नहीं हुई है.

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