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पर्यावरण दिवस: 'बीमार' हो रहा इंसानों का 'थर्ड पोल', एक्सपर्ट्स ने NDTV को बताया हिमालय को किससे है बड़ा खतरा

विश्व पर्यावरण दिवस पर पढ़िए NDTV की खास रिपोर्ट. हिमालय, जिसे ‘थर्ड पोल’ कहा जाता है, वह तेजी से बीमार हो रहा है. बढ़ते तापमान, प्लास्टिक कचरे और ब्लैक कार्बन के कारण ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, जिससे जल संकट और पर्यावरणीय खतरा बढ़ रहा है. जानिए पर्यावरणविद् क्या कह रहे हैं.

पर्यावरण दिवस: 'बीमार' हो रहा इंसानों का 'थर्ड पोल', एक्सपर्ट्स ने NDTV को बताया हिमालय को किससे है बड़ा खतरा
World Environment Day: प्लास्टिक, ब्लैक कार्बन और गर्मी से जूझ रहा हिमालय, विशेषज्ञों की चेतावनी

World Environment Day 2026: हर साल 5 जून को मनाया जाने वाला विश्व पर्यावरण दिवस इस बार एक गंभीर चेतावनी के साथ आया है. दुनिया का “थर्ड पोल” कहे जाने वाला हिमालय तेजी से बीमार हो रहा है. बढ़ता तापमान, बदलता मौसम, पिघलते ग्लेशियर और अनियोजित पर्यटन ने इस विशाल पर्वत श्रृंखला के अस्तित्व पर सवाल खड़े कर दिए हैं. वैज्ञानिकों का कहना है कि हिमालय केवल पहाड़ नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की जीवनरेखा है. यहां के ग्लेशियर एशिया की कई प्रमुख नदियों का स्रोत हैं. लेकिन जलवायु परिवर्तन और मानवीय गतिविधियों के दबाव ने हिमालय की पारिस्थितिकी को असंतुलित कर दिया है, जिससे भविष्य में पानी, मौसम और पर्यावरण पर गंभीर असर पड़ सकता है.

हिमालय दुनिया का ‘थर्ड पोल' क्यों कहलाता है?

हिमालय को दुनिया का थर्ड पोल कहा जाता है, हिमालय में मौजूद हजारों ग्लेशियर करोड़ों लोगों को पीने के पानी, खेती के लिए सिंचाई का पानी तो मिलता ही है, इसके अलावा यह भारत की जलवायु को भी संतुलित करता है. साथ ही हिमालय में कीमती जड़ी बूटियां भी मौजूद हैं. लेकिन आज हिमालय खतरे में है, लगातार हिमालय की सेहत खराब होती जा रही है और इसका कारण जलवायु परिवर्तन, तापमान का बढ़ना, जंगलों की आग, वाहनों से निकलता धुआं, पिघलते ग्लेशियर, समय पर बर्फबारी का ना होना ऐसे कई कारण है, जिसकी वजह से हम आज के समय यह कह रहे हैं कि हिमालय की सेहत खराब हो रही है.

हिमालय बीमार हो रहा है और हिमालय की सेहत और हिमालय को बीमार करने का पूरा श्रेय इंसानों पर जाता है, क्योंकि जिस तरीके से इंसान विकास की गति पकड़ रहा है उसी तरीके से पर्यावरण प्रकृति को नुकसान पहुंचा रहा है.

अगर यह कहा जाए कि हिमालय का सबसे महत्वपूर्ण पहलू ग्लेशियर है तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगा, क्योंकि हिमालय का वजूद उसमें मौजूद हजारों वह ग्लेशियर हैं जिनसे सैकड़ो नदियां निकलती है जो मानव को पीने का पानी के अलावा खेती के लिए भी पानी देती हैं.

विशेषज्ञों की चेतावनी: हिमालय का वजूद खतरे में

पर्यावरण विद् और प्रोफेसर एसपी सती ने एनडीटीवी से खास बातचीत में कहा कि हिमालय के सामने आज कई बड़ी चुनौतियां खड़ी हैं, क्योंकि इन चुनौतियों की वजह से हिमालय की सेहत तेजी से खराब हो रही है.

एसपी सती कहते हैं कि हिमालय के सामने जलवायु परिवर्तन, मौसमी चक्र में बदलाव, प्लास्टिक का कचरा, सभी ऐसे कारण है जो हिमालय के ग्लेशियर पर सीधा असर कर रहे हैं.

एसपी सती का कहना है कि हिमालय के ग्लेशियर की अगर सेहत खराब होती है और वह तेजी से पिघलते हैं तो हिमालय का वजूद मिट जाएगा, क्योंकि हिमालय का वजूद तभी है, जब हिमालय में मौजूद वह तमाम हजारों ग्लेशियर हैं. एसपी सती कहते हैं कि इंसान ने विकास की अंधी दौड़ में पर्यावरण को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचा है. हिमालय की सेहत को गिराने में हिमालय जैसे बेहद ही संवेदनशील क्षेत्र में आयोजित विकास सबसे बड़ा कारण है.

वहीं वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ़ हिमालय जियोलॉजी के वरिष्ठ वैज्ञानिक और ग्लेशियरलोजिस्ट डॉ मनीष मेहता ने एनडीटीवी को बताया कि हिमालय में पर्यटकों की आने की संख्या ज्यादा है और दबाव भी ज्यादा है. सिर्फ चार धाम क्षेत्र में ही नहीं बल्कि उत्तराखंड और हिमाचल या फिर लद्दाख क्षेत्र में लगातार पर्यटकों की संख्या बढ़ रही है.

ऐसे में हिमालय में संसाधन कम है और संसाधन कम होने की वजह से उसे पर भारी दबाव पड़ रहा है. डॉ मनीष मेहता ने बताया कि हिमालय में छोटे ग्लेशियर की संख्या ज्यादा है. लेकिन हिमालय में 50% बड़े ग्लेशियर का वॉल्यूम ज्यादा है यानी उनमें ज्यादा मात्रा में बर्फ है.

डॉ मनीष मेहता कहते हैं कि ग्लेशियर न सिर्फ उत्तराखंड बल्कि हिमाचल से लेकर लद्दाख और नॉर्थ ईस्ट तक लगभग सभी ग्लेशियर पिघल रहे हैं पीछे खिसक रहे हैं.

वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉक्टर मनीष मेहता कहते हैं कि रिकॉर्ड भी देखा गया है कि ग्लेशियर पीछे हटते भी है और आगे भी बढ़ते हैं, लेकिन वर्तमान समय में इंसानों का इंवॉल्वमेंट उच्च हिमालय क्षेत्र में ज्यादा होने के कारण ग्लेशियर की पिघलने की रफ्तार तेजी से बढ़ी है. कई ग्लेशियर जिनको नॉर्मल 2 मीटर या 6 मीटर प्रति वर्ष पीछे हटाना था, वो अब वह 12 मीटर प्रतिवर्ष पिघल रहे हैं. इसके अलावा बर्फबारी भी कम होने की वजह से ग्लेशियर की फीडिंग नहीं हो पा रही है.

तेजी से पिघल रहे ग्लेशियर

हिमालय के ग्लेशियर आज खतरे में है क्योंकि विशेषज्ञों के अनुसार हिमालय के ग्लेशियर लगातार पीछे खिसक रहे हैं, यानी वे तेज़ी से पिघल रहे हैं. कई अध्ययनों में यह सामने आया है कि ग्लेशियर हर साल 1 से 20 मीटर तक सिमट रहे हैं. इसका सीधा कारण ग्लोबल वार्मिंग और तापमान में लगातार वृद्धि है. पहले जहां ऊंचाई वाले इलाकों में बर्फ गिरती थी, अब वहां बारिश होने लगी है. 3000 मीटर से ऊपर के क्षेत्रों में अब 4000 मीटर तक बारिश दर्ज की जा रही है, जो जलवायु असंतुलन का संकेत है.

बदलता मौसम चक्र बढ़ा रहा संकट

हिमालय में मौसम चक्र पूरी तरह बदल चुका है. सर्दियों का समय छोटा होता जा रहा है, जबकि गर्मी लंबी हो रही है. पहले दिसंबर से फरवरी के बीच बर्फबारी होती थी, जिससे ग्लेशियरों को मजबूत होने का समय मिलता था. अब बर्फबारी देर से यानी मार्च से मई के बीच हो रही है, जिससे बर्फ जमने से पहले ही पिघल जाती है. इसका असर यह हो रहा है कि ग्लेशियरों को जरूरी बर्फ नहीं मिल पा रही, जिससे उनका आकार और ताकत लगातार घट रही है.

सर्दियों में पढ़ने वाली बर्फ भी अब समय पर नहीं पड़ रही है यानी सर्दियों में पढ़ने वाली बर्फ जब पड़ती थी तो उसको ग्लेशियर पर जमने का समय लगता था, लेकिन सर्दियों का मौसम छोटा हो रहा है गर्मियों का मौसम लंबा होता जा रहा है दिसंबर जनवरी और फरवरी में पढ़ने वाली बर्फ अब मार्च अप्रैल और मई के महीने में पढ़ रही है यानी पूरा मौसमी चक्र बदल चुका है बारिश भी समय पर नहीं हो रही है.

इसका सीधा असर ग्लेशियर की सेहत पर पड़ रहा है क्योंकि ग्लेशियर को मिलने वाली बर्फ अब नहीं मिल पा रही है और मिल भी रही है तो वह जल्द ही पिघल जाती है क्योंकि वायुमंडल और धरातल का तापमान बेहद गर्म होता जा रहा है. पूरे हिमालय रीजन में करीबन 12000 के करीब छोटे बड़े ग्लेशियर है. उत्तराखंड की बात करें तो उत्तराखंड गंगोत्री ग्लेशियर, सतोपंथ ग्लेशियर खतलिंग ग्लेशियर, बंदरपूछ ग्लेशियर, दूनगिरी ग्लेशियर, मिलम ग्लेशियर, पिंडारी ग्लेशियर, नामिक ग्लेशियर, पंचाचुली ग्लेशियर, अलकापुरी ग्लेशियर, नंदा देवी ग्लेशियर, ऐसे सैकड़ो ग्लेशियर है जिनकी सेहत लगातार खराब हो रही है इन ग्लेशियर की न सिर्फ लंबाई बल्कि चौड़ाई भी धीरे-धीरे कम हो रही है.

हिमालय में बढ़ता प्लास्टिक, बिगड़ता इकोसिस्टम

हिमालय पर एक दूसरा बड़ा खतरा प्लास्टिक का कचरा है और यह प्लास्टिक का कचरा अपने आप वहां नहीं पहुंच रहा है. इस प्लास्टिक के कचरे को पहुंचने में इंसानों का सबसे बड़ा योगदान है, क्योंकि अनियोजित तरीके से पर्यटन को बढ़ावा दिया जा रहा है. उत्तराखंड के उच्च हिमालय क्षेत्र में कई ऐसे पर्यटन स्थल हैं जहां भारी तादाद में पर्यटक जा रहे हैं, जो वहां पर प्लास्टिक का कचरा जिसमें प्लास्टिक की बोतल, पॉलिथीन और अन्य तरह का कूड़ा फैला रहे हैं, जिससे वहां का इकोसिस्टम खराब हो रहा है.

ब्लैक कार्बन: अदृश्य लेकिन खतरनाक संकट

हिमालय पर तीसरा सबसे बड़ा खतरा ब्लैक कार्बन का है. यह धीरे-धीरे हिमालय के ग्लेशियर को खा रहा है. ब्लैक कार्बन का उत्सर्जन सबसे ज्यादा उत्तराखंड में लगने वाली जंगलों की आग और उच्च हिमालय क्षेत्र में आने वाले तमाम वाहन हैं, जो लगातार धुआं छोड़ रहे हैं. वाहनों से निकलने वाले धुएं में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा सबसे ज्यादा होती है. कार्बन डाइऑक्साइड में ब्लैक कार्बन पार्टिकल्स जो की डीजल के जलने पर छोटे-छोटे कणों में धुएं के साथ बाहर निकलते हैं, वह उड़ते हुए हिमालय के ग्लेशियर पर बैठ रहे हैं. वहीं फॉरेस्ट फायर की वजह से भी ब्लैक कार्बन पार्टिकल्स हिमालय के ग्लेशियर पर बैठ रही है.

हिमालय के ग्लेशियर पर ब्लैक कार्बन पार्टिकल्स बैठने की वजह से सूर्य की जो रोशनी ग्लेशियर पर पड़ती है वह रिफ्लेक्ट होने के बजाय कार्बन पार्टिकल्स द्वारा अब्जॉर्ब कर ली जाती है, जिससे हिमालय के ग्लेशियर की पिघलने की रफ्तार और तेजी से बढ़ रही है.

ब्लैक कार्बन पार्टिकल्स वायुमंडल में उड़ते हैं और यहां पर भी सूर्य की रोशनी को यह अब्जॉर्ब करते हैं जिससे वायुमंडल का तापमान बेहद गर्म हो जाता है जिससे तापमान बढ़ता है और इसका असर हिमालय के ग्लेशियर के साथ आम इंसानों पर भी तेजी से पड़ता है.

अनियोजित विकास और कटते जंगलों का असर

हिमालय की सेहत खराब करने में चौथा कारण तेजी से इंफ्रास्ट्रक्चर का बढ़ना और जंगलों की कटाई है. हिमालय पर तेजी से सड़क इंफ्रास्ट्रक्चर बांध परियोजनाएं बनाने का काम हुआ है, पिछले कई दशक से हिमालय के जंगलों को काटा जा रहा है, जिसकी वजह से पूरा इकोसिस्टम खराब हो रहा है. हिमालय पर भारी निर्माण और जंगलों की कटाई के कारण पहाड़ों के दल और तीव्र व अस्थिर भी हो गए हैं, जिसकी वजह से जब बारिश आती है तो पानी नहीं रुक पाता और ऐसे में भारी मात्रा में लैंडस्लाइड होती है.

जलवायु परिवर्तन से बढ़ीं आपदाएं और जोखिम

हिमालय की सेहत खराब करने में पांचवा कारण जलवायु परिवर्तन मौसमी चक्र में बदलाव है, क्योंकि तेजी से तापमान बढ़ रहा है और तापमान बढ़ने की वजह से समय पर बारिश नहीं हो रही है या बारिश अचानक से भारी मात्रा में हो जाती है. इसके अलावा ऋतु परिवर्तन भी हो रहा है, जिसकी वजह से हिमालय में मौजूद पेड़ पौधे या अन्य प्रकार की जड़ी बूटियां के समय पर उगने या उन पर फूल आने का समय परिवर्तन हुआ है. जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालय में अक्सर बदल फटने या फिर अचानक बाढ़ जैसी कई घटनाएं देखने को मिली है. इसका उदाहरण 2013 की केदारनाथ आपदा, 2025 में उत्तरकाशी के धराली की आपदा, चमोली जिले में थराली की आपदा, चमोली जिले के ही जोशीमठ में रैणी गांव की आपदा है.

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