- सुप्रीम कोर्ट की रिपोर्ट के अनुसार एक पेड़ की सालाना आर्थिक कीमत करीब 74,500 रुपये होती है
- कई पेड़ 100 साल से ज्यादा जीवित रहते हैं और उनकी कुल आर्थिक कीमत करोड़ों रुपये तक होती है
- वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के अनुसार ग्लोबल इकॉनमी का करीब आधा हिस्सा सीधे पेड़ों और प्रकृति पर निर्भर
हम घरों में बिजली इस्तेमाल करते हैं, तो उसका बिल हर महीने आ जाता है. फोन, इंटरनेट, शॉपिंग, ओटीटी का भी बिल कंपनियां हमें भेज देती हैं. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जिन पेड़ों की वजह से हम सांस लेते हैं और जिंदा हैं, अगर उन्होंने हमें बिल भेजना शुरू कर दिया तो क्या होगा? हम एक ही दिन में कंगाल हो जाएंगे.
आज यानी 5 जून को हर साल की तरह दुनियाभर में 'विश्व पर्यावरण दिवस' (World Environment Day 2026) मनाया जा रहा है. तो हम आपको एक ऐसा ही खास गणित बता रहे हैं, जिसे जानकर हैरानी होगी. एक पेड़ अपने जीवनकाल में करोड़ों रुपये की ऑक्सीजन और अन्य चीजें हम इंसानों पर कुर्बान कर देता है. इसके बदले पेड़ कभी बिल नहीं भेजता. यह हम नहीं कह रहे. ये बात सुप्रीम कोर्ट की एक रिपोर्ट में सामने आई है. आइए जानते हैं कि एक अकेला पेड़ चुपचाप आपको कैसे करोड़ों रुपये का कर्जदार बना रहा है?
सुप्रीम कोर्ट के पैनल की रिपोर्ट
सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित एक हाई लेवल एक्सपर्ट कमेटी ने अपनी रिपोर्ट ने पेड़ों की कीमत का ऐतिहासिक फॉर्मूला दिया था. इस कमेटी में प्रसिद्ध पर्यावरणविद् सुनीता नारायण भी शामिल थीं. कमेटी ने साल 2021 में अपनी रिपोर्ट पेश की. इस रिपोर्ट के अनुसार, एक पेड़ की सालाना आर्थिक कीमत 74,500 रुपये होती है. इसमें से अकेले मुफ्त ऑक्सीजन की कीमत ही 45 हजार रुपये सालाना है. इसके अलावा पेड़ मिट्टी के संरक्षण, पानी को रिसायकल और पक्षियों को घर देते हैं. सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि कई पेड़ 100 साल से ज्यादा तक जिंदा रहते हैं. ऐसे पेड़ों की कीमत 1 करोड़ से ज्यादा तक होती है.

देशों की जीडीपी से ज्यादा की ऑक्सीजन फ्री में दे रहे पेड़
सुप्रीम कोर्ट के अलावा दुनिया के अन्य कई संगठनों ने पेड़ों से फ्री में मिलने वाली ऑक्सीजन की कीमत आंकी. वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (WEF) की 'नेचर रिस्क राइजिंग' रिपोर्ट में कहा है कि दुनिया की कुल जीडीपी का आधे से ज्यादा हिस्सा यानी 44 ट्रिलियन डॉलर की वैश्विक अर्थव्यवस्था सीधे तौर पर प्रकृति और पेड़ों पर टिकी है. अगर प्रकृति मुफ्त में ये सेवाएं देना बंद कर दे, तो इंसानी अर्थव्यवस्था पूरी तरह ढह जाएगी.
इसके अलावा वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फंड (WWF) की रिपोर्ट में प्रकृति द्वारा फ्री में दी जाने वाली सेवाओं की कीमत दुनिया की जीडीपी से ज्यादा है. रिपोर्ट कहती है कि धरती पर पेड़ों समेत सभी प्राकृतिक संसाधनों द्वारा इंसानों को दी जाने वाली मुफ्त सेवाओं की कुल सालाना कीमत 125 से 140 ट्रिलियन डॉलर आंकी गई है. यह कीमत दुनिया के सभी देशों की कुल जीडीपी से करीब डेढ़ गुना ज्यादा है.
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