- उत्तराखंड में बर्फबारी का पैटर्न पिछले कुछ सालों में तेजी से बदला है.
- सितंबर महीने में केदारनाथ, बद्रीनाथ में अब तक 3 बार बर्फबारी हो चुकी है.
- मौसम वैज्ञानिकों ने उत्तराखंड में बर्फबारी के बदलते पैटर्न पर अहम जानकारी दी है.
उत्तराखंड में पिछले 2 दिनों में हुई बारिश और बर्फबारी ने तापमान काफी नीचे ला दिया है. सितंबर के आखिरी दिनों में पहाड़ी क्षेत्र में हुई बर्फबारी ने मौसम के मिजाज को पूरी तरह से बदल दिया है. ऐसा मौसम काफी लंबे समय बाद ऐ देखने को मिला है कि जब सितंबर के महीने में एक नहीं बल्कि तीन बार हिमालय क्षेत्र में बर्फबारी हुई है, जिसे एक और यह अच्छे संकेत माने जा रहे हैं, लेकिन वही वैज्ञानिकों ने इसमें कुछ चिंता भी जताई है. जिसमें अगर बर्फबारी के दो तीन दौर गुजरे तो बर्फबारी तो रहेगी. लेकिन बढ़ते तापमान की वजह से बर्फ को जमने का समय नहीं मिल पाएगा.
हिमालय के ग्लेशियरों पर भी असर
पूरी दुनिया में ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन का असर सीधे न सिर्फ आर्कटिक और अंटार्कटिका के ग्लेशियर पर पढ़ रहा है, बल्कि हिमालय रीजन पर भी मौजूद हजारों ग्लेशियर पर इसका असर हो रहा है. ग्लोबल वार्मिंग से तापमान बढ़ रहा है और जलवायु परिवर्तन की वजह से समय पर बारिश नहीं हो पा रही है, अगर बारिश हो भी रही है तो अचानक से तेज मूसलाधार बरसात होती है. वही जलवायु परिवर्तन का असर दूसरा यह हो रहा है कि गर्मियों का सीजन लंबा हो गया है, बर्फ जितनी सर्दियों के सीजन में पढ़ती थी उतनी पढ़ तो रही है, लेकिन उसे बर्फ को जमने का समय नहीं मिल पा रहा है. इसके अलावा दिसंबर के आखिरी हफ्ते और जनवरी-फरवरी में पढ़ने वाली बर्फ अब अप्रैल तक जा रही है कभी-कभी मई तक भी बर्फबारी देखने को मिल रही है. जिससे पूरा मौसम ही बदल रहा है.
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उत्तराखंड में हो रही बर्फबारी
शनिवार और रविवार यानी 26 सितंबर और 27 सितंबर को उत्तराखंड में बर्फबारी हुई है. खास बात यह है कि सितंबर के आखिरी दिनों में साढ़े तीन हजार मीटर से ऊपर के उच्च हिमालय क्षेत्र में जमकर बर्फबारी हुई है, इसके अलावा गंगोत्री यमुनोत्री केदारनाथ बद्रीनाथ हेमकुंड साहिब, आदि कैलाश, गूंजी जैसे क्षेत्रों में भी बर्फबारी हुई है. इस बार सितंबर के महीने में तीन बार हिमालय क्षेत्र में बर्फबारी हो चुकी है. जो अच्छे संकेत माने जा रहे हैं. क्योंकि बर्फबारी का पैटर्न तेजी से बदल रहा है. आम तौर पर हिमालय क्षेत्र में बर्फबारी सर्दियों के महीने में होती है, जो वेस्टर्न डिस्टरबेंस की वजह से रहती है. लेकिन पिछले कुछ समय से बर्फबारी का पैटर्न बिल्कुल बदल चुका है और इसकी वजह ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन है.
क्यों बदला बर्फबारी का मौसम
वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ़ हिमालयन जियोलॉजी के पूर्व वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ डीपी डोभाल ने जानकारी देते हुए बताया कि हिमालय के ग्लेशियर को मॉनसून सीजन और विंटर सीजन में बर्फ मिलती है. डॉ डीपी डोभाल ने बताया कि मॉनसून सीजन में सितंबर के महीने में बर्फ पड़ती है, लेकिन पिछले कुछ समय से ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन की वजह से बर्फ कम पड़ रही है और जो बर्फ पड़ भी रही है उसको जमने का समय नहीं मिल पा रहा है. वायुमंडल में तापमान बढ़े हुए हैं और धरती का सरफेस भी गरम है, यही वजह है कि जब भी बर्फ पड़ती है तो वह तेजी से पिघल जाती है. डॉ डोभाल के मुताबिक इस बार सितंबर के आखिरी दिनों में जबरदस्त बर्फबारी हुई है और यह अच्छे संकेत है. लेकिन जिस तरीके से तापमान बढ़ा हुआ है, वह बर्फ को जल्दी पिघला भी सकता है.
10 सालों में बड़ा परिवर्तन
डॉ डीपी डोभाल के मुताबिक पिछले 10 सालों में यह लंबा परिवर्तन आया है. इसकी वजह जलवायु परिवर्तन है, जलवायु परिवर्तन में गर्मियों का सीजन लंबा हो गया है और जो सर्दियों में पढ़ने वाली बर्फ अब आगे की तरफ शिफ्ट हो गई है. यानी पिछले कुछ समय में यह देखने को मिला है बर्फ जनवरी और फरवरी में गिरने के बजाय अब अप्रैल मार्च यहां तक कि मई के महीने तक पड़ रही है. इसके अलावा 4000 मीटर तक बारिश हो रही है, जबकि 3000 मीटर तक हल्की बारिश और बर्फबारी होती थी धीरे-धीरे बर्फबारी ऊपर खिसक गई है. जिससे स्नो लाइन 4000 मीटर तक चली गई है. इसके अलावा वैज्ञानिक यह भी मानते हैं कि जैसे-जैसे ट्री लाइन स्लो लाइन तक पहुंच रही है जिससे उच्च हिमालय क्षेत्र के वातावरण में बदलाव हो रहा है ग्लेशियर पर इसका सीधा असर हो रहा है.
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