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This Article is From Aug 09, 2025

दर्द, आंसू, चमत्कार... धराली पहुंचे रिपोर्टर की रुला देने वाली आंखोंदेखी

NDTV की टीम के लिए धराली तक पहुंचना बिल्कुल भी आसान नहीं था. रिपोर्टर किशोर रावत भागीरथी रेंज की पहाड़ी को लांघकर 2 दिनों तक 30 किमी. का मुश्किल रास्ता पैदल चलकर और बिना खाए-पिए वहां पहुंचे. यह पूरा स्ता बेहद खतरनाक था.धराली पहुंचकर उन्होंने लोगों का दर्ज जाना.

धराली के लोगों का दर्द जान नहीं थमेंगे आंसू.
  • धराली में बादल फटने से आई भीषण बाढ़ ने हजारों लोग प्रभावित है, जिनमें से 1300 से अधिक को बचाया जा चुका है.
  • प्राकृतिक आपदा में कई परिवारों ने अपने घर, जमीन और सभी संपत्तियां खो दी हैं. वे राहत शिविरों में रह रहे हैं.
  • बाढ़ से धराली में कई मकान, वाहन और प्रसिद्ध मंदिर मलबे में दफन हो गए हैं,. 7 लगों की मौत की पुष्चाटि हुई है.
धराली:

उत्तराखंड के उत्तरकाशी के धराली में मंगवार दोपहर को बादल फटने से ऐसी तबाही मची कि इसके निशान चार दिन बाद भी उतने ही हरे हैं, जितने कि पहले दिन थे. हर गुुजरते दिन के साथ दर्द और भी बढ़ता जा रहा है. अब तक 1300 लोगों को रेस्क्यू (Dharali Rescue Operation)  किया जा चुका है. वहीं 7 लोगों की मौत हो चुकी है. लेकिन उनका क्या, जन्होंने अपना सबकुछ गंवा दिया.  न रहने के लिए घर बचा है और न ही खाने के लिए रोटी, करें तो क्या करें. इस हादसे ने परिवार को भी छीन लिया है. NDTV की टीम ने ग्राउंड जीरो पर पहुंचकर प्रभावित लोगों से बात की और उनका दर्द जाना. जिसे सुनकर किसी का भी कलेजा मुंह को आ जाए. दर्ज उकी आंखों और आवाज में साफ दिखाई दे रहा है.

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जान हथेली पर रख धराली पहुंची NDTV की टीम

NDTV की टीम के लिए धराली तक पहुंचना बिल्कुल भी आसान नहीं था. तबाही के बाद कई इलाकों में पहुंचने का कोई रास्ता नहीं है. इन जगहों पर सिर्फ हेलीकॉप्टर से ही जाना संभव है. मीडिया के कई कैमरे हेलीकॉप्टर से उन जगहों पर पहुंच रहे है. लेकिन NDTV के रिपोर्टर किशोर रावत भागीरथी रेंज की पहाड़ी को लांघकर 2 दिनों तक 30 किमी. का मुश्किल रास्ता पैदल चलकर और बिना खाए-पिए वहां पहुंचे. यह पूरा स्ता बेहद खतरनाक था. वहां पर बहुत ज्यादा फिसलन थी. किशोर रावत और उनकी टीम ऊंची चढ़ाई और फिसलन भरी खाई को पार कर आखिरकार धराली पहुंच ही गई.

'हमारे पास न घर है, न ज़मीन, न कपड़े,' मंदिर में रह रही महिला का दर्द

धराली में जहां सैलाब आया था वहां से करीब 100 मीटर दूर सोमेश्वर मंदिर में एक कैंप लगा है, जहां करीब 150 लोगों का खाना बन रहा है. गांव की महिलाएं कैंप में मौजूद लोगों के लिए खाना बना रही हैं. इस तबाही में अपना घर खोने के सदमे से उबरने की कोशिश कर रहीं सुशीला भी धराली गांव में सोमेश्वर मंदिर के एक राहत शिविर में 150 अन्य लोगों के लिए खाना बना रही हैं. उनको अब सिर्फ सरकार से ही आस है. उन्होंने सरकार से घर मुहैया कराने की गुहार लगाते हुए भरे हुए मन से कहा, "हमारे पास न घर है, न ज़मीन, न कपड़े, हम निःशब्द हैं,".

बता दें कि मंदिर के राहत शिविर में रह रहे सभी लोग बादल फटने से आई भीषण बाढ़ में अपना सब कुछ खो चुके हैं. मंदिर में मौजूद बर्तनों में ही न लोगों के लिए खाना बनया जा रहा है. वहां मौजूद महिलाओं ने कहा कि हमारा सब कुछ बह चुका है. इन महिलाओं ने मांग की सरकार हम लोगों को विस्थापित करें. बता दें कि धराली से हादसे के बाद अभी तक 1300 लोगों को रेस्क्यू किया जा चुका है.

धराली में बाढ़ ने घरों, वाहनों और एक प्रसिद्ध मंदिर को भी मलबे के ढेर में दफन कर दिया है. इस आपदा में 7 लोगों की जान जा चुकी है. वहीं कई लोग लापता हैं. उनको ढूढने के लिए अधिकारी और भारतीय सेना मिलकर रेस्क्यू ऑपरेशन चला रहे है.

मैंने मौत देखी, नहीं लगा कि मैं ज़िंदा बच पाऊंगा

NDTV की टीम ने मलबे से बच निकले भलविंदर सिंह पवार से भी बात की, जिनका मलबे के ढेर से बच निकलने का वीडियो जमकर वायरल हो रहा है. जिनमें वह घायल हालत में दिखाई दे रहे हैं. बाढ़ के तेज़ बहाव से जूझते हुए वह मलबे से बाहर निकल आए. उन्होंने एनडीटीवी को बताया, "मैंने मौत देखी और मुझे नहीं लगा कि मैं ज़िंदा बच पाऊंगा. मेरे सामने सिर्फ़ दो ही हालात थे. या तो मैं ढहते हुए किसी घर के नीचे फंस जाऊं या फिर तेज़ी से मेरी ओर आ रहे मलबे में बह जाऊं."  उन्होंने कहा कि बाबा केदार की कृपा से ही वह जिंदा बचे हैं.

पवार को ये भी नहीं पता है कि उन दो लोगों का क्या हुआ जिन्हें उन्होंने पानी में फंसा देखा था. दोनों सुरक्षित निकलने की कोशिश कर रहे थे. लेकिन वह खुद चोटों और ज़ख्मों के साथ बच निकले. उकी एक आंख पर जख्म साफ दिखाई दे रहा था. मौत को सामने से देख रहे पवार को कल्प केदार मंदिर याद आ रहा था. इस शिव मंदिर में वह रोज प्रार्थना करते थे, जो अब मलबे में दफन हो गया है. तबाही के मंजर के बीच पवार ने कहा, "मुझे नहीं लगता कि गांव फिर पहले जैसा हो पाएगा. हमारी ऊर्जा और हिम्मत खत्म हो चुकी है. हमारे पास कुछ भी नहीं बचा है. जिन लोगों ने अपने छोटे बच्चों को खोया है, वे अभी तक इस सदमे से उबर भी नहीं पाए हैं."

नेपाल के 10 साल के सुशील का दर्द

नेपाल के 10 साल के सुशील ने धराली आपदा में अपने पिता समेत परिवार के सात सदस्यों को खो दिया है. उसके दर्द का तो अंदाजा लगा पाना भी मुश्किल है. उसका दर्द रुला देने वाला है. शुक्रवार को धराली में NDTV टीम की मुलाकात सुशील से हुई. उसने बताया, 'जब सैलाब आया तो पापा ने कॉल किया बोले 'मुझे बचा बेटे, मैं आधा डूब चुका हूं'. सुशील अब अपने पिता समेत परिवार के 7 लोगों को तलाश रहा है. एनडीटीवी से बातचीत में सुशील ने बताया कि उस दिन यहां बम-बारूद फटने जैसा भारी मलबा आ गया था. सुशील के परिवार के 7 लोग इस हादसे के बाद से लापता है. वह अब परिवार को ढूढने के मिशन पर है.

धराली में इस वक्त दिखाई दे रहे हज़ारों टन मलबे के नीचे गांव के कई होटल भी हैं. NDTV के बाढ़ प्रभावित इलाके का दौरा करने पर पता चला कि जहां कभी इमारतें हुआ करती थीं, वहां अब सिर्फ़ दलदल, कीचड़ और पत्थर ही बचे हैं. खोज और बचाव अभियान जोरों पर है. सुरक्षा बलों खोजी कुत्तों और ड्रोनों की मदद ले रहे हैं. अब तक 500 से ज़्यादा लोगों को बचाया जा चुका है.

सैलाब आया, सबकुछ बहा ले गया

बादल फटने के बाद खीरगंगा नदी में ऐसा सैलाब आया, जो धराली में होटल से लेकर होम स्टे तक सबकुछ अपने साथ बहाकर ले गया. मलबे से अब तक1300 से ज्यादा लोगों को बाहर निकाला जा चुका है. रेस्क्यू ऑपरेशन अब तक जारी है. धराली में अब क्या हालात है? इसे जानने-समझने के लिए NDTV की टीम गांव में पहुंच चुकी है. हालांकि टीम का यहां तक पहुंचना बिल्कुल भी आसान नहीं था.

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