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कांवड़ यात्रियों द्वारा छोड़े गए कचरे से गोमुख-गंगोत्री का पर्यावरण खतरे में, फैला कचरे का अंबार

गोमुख और गंगोत्री क्षेत्र में श्रद्धालुओं द्वारा छोड़ा गया भारी मात्रा में कचरा पर्यावरण के लिए बड़ा खतरा बन गया है. वन विभाग ने विशेष अभियान चलाकर 57 बोरे कूड़ा एकत्र किया है.

कांवड़ यात्रियों द्वारा छोड़े गए कचरे से गोमुख-गंगोत्री का पर्यावरण खतरे में, फैला कचरे का अंबार
गोमुख और गंगोत्री में कचरा पर्यावरण के लिए बड़ा खतरा बन गया है.

सावन माह की कांवड़ यात्रा समाप्त हो चुकी है, लेकिन उत्तराखंड के पवित्र धार्मिक स्थलों पर इसके निशान अब भी साफ दिखाई दे रहे हैं. हरिद्वार से लेकर गंगोत्री और गोमुख तक बड़ी मात्रा में कूड़ा-कचरा जमा होने से पर्यावरण पर गंभीर खतरा मंडराने लगा है. हजारों श्रद्धालु गंगाजल लेने और धार्मिक आस्था के साथ यात्रा पर पहुंचे थे, लेकिन उनके लौटने के बाद कई स्थानों पर प्लास्टिक, पुराने कपड़े और अन्य अपशिष्ट के ढेर नजर आ रहे हैं.

गोमुख से गंगोत्री तक मिला 57 बोरे कचरा

कांवड़ यात्रा के बाद वन विभाग ने गोमुख और गंगोत्री क्षेत्र में विशेष सफाई अभियान चलाया. अभियान के दौरान गंगोत्री से गोमुख तक लगभग 57 बोरे कूड़ा-कचरा एकत्र किया गया. इसमें 22 बोरे प्लास्टिक कचरा और 35 बोरे पुराने कपड़े तथा अन्य अपशिष्ट शामिल थे. यह कचरा विभिन्न स्थानों पर श्रद्धालुओं द्वारा छोड़ा गया था. एकत्रित कूड़े को उचित निस्तारण के लिए कनखू बैरियर तक पहुंचाया गया.

61 हजार से अधिक श्रद्धालुओं की आवाजाही

सावन माह में बड़ी संख्या में कांवड़ यात्री उत्तराखंड पहुंचे. आंकड़ों के अनुसार गंगोत्री धाम में 57,957 और यमुनोत्री धाम में 5,415 कांवड़ यात्री पहुंचे. वहीं 1,561 श्रद्धालुओं ने गोमुख से गंगाजल भरा. बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की आवाजाही के कारण क्षेत्र में कचरे का दबाव भी बढ़ गया. कई यात्रियों ने पुराने कपड़े और अन्य सामग्री रास्तों तथा खुले क्षेत्रों में छोड़ दी.

ईको सेंसिटिव जोन के लिए बढ़ी चिंता

गंगोत्री और गोमुख क्षेत्र हिमालय के बेहद संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा हैं. यह क्षेत्र दुर्लभ वन्य जीवों, वन संपदा और महत्वपूर्ण जैव विविधता के लिए जाना जाता है. गंगोत्री धाम को प्लास्टिक प्रतिबंधित और ईको सेंसिटिव क्षेत्र घोषित किया गया है. इसके बावजूद यात्रा के दौरान नियमों का व्यापक उल्लंघन देखने को मिला. सड़क किनारे और वन क्षेत्रों में फैला कचरा अब भागीरथी नदी तक पहुंचने का खतरा पैदा कर रहा है.

गंगा और वन संपदा पर खतरे की घंटी

विशेषज्ञों का मानना है कि प्लास्टिक और ठोस कचरा न केवल नदी की स्वच्छता को प्रभावित करता है बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुंचा सकता है. यदि समय रहते प्रभावी व्यवस्था नहीं की गई तो गंगा के उद्गम क्षेत्र की प्राकृतिक सुंदरता और जैव विविधता पर भी असर पड़ सकता है.

वन विभाग का स्वच्छता अभियान बना राहत

वन विभाग के कर्मचारियों और मजदूरों ने कठिन परिस्थितियों में सफाई अभियान चलाकर क्षेत्र को काफी हद तक साफ किया. विभाग का कहना है कि गंगा की निर्मलता बनाए रखने और हिमालयी पर्यावरण की रक्षा के लिए यात्रियों में जागरूकता बढ़ाना बेहद जरूरी है. विभाग की यह पहल पर्यावरण संरक्षण के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को भी दर्शाती है.

जिम्मेदार तीर्थयात्रा की जरूरत

गोमुख और गंगोत्री जैसे पवित्र स्थलों की स्वच्छता केवल सरकारी प्रयासों से संभव नहीं है. पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि तीर्थयात्रियों और पर्यटकों को भी जिम्मेदारी निभानी होगी. आस्था के साथ स्वच्छता का संदेश अपनाकर ही गंगा के उद्गम स्थल और हिमालय की नाजुक पारिस्थितिकी को सुरक्षित रखा जा सकता है.

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