यूपी विधानसभा चुनाव को लेकर मुस्लिम वोटों को अपने खेमे में करने की क़वायद में जुटे राजनैतिक दलों को सबसे ज़्यादा डर असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम से लग रहा है. एक तरफ ओवैसी एक के बाद मुस्लिम बहुल ज़िलों में बड़ी सभाएं कर रहे हैं तो दूसरी तरफ मुस्लिमों से जुड़े मुद्दों पर उनके नेताओं के मेल मुलाकात करने की नीति के जरिए एमआईएम मुस्लिमों को ये संदेश देने की कोशिश में है कि उनके लिए अगर कोई खड़ा है तो वो एमआईएम ही है.
एआईएमआईएम के प्रदेश अध्यक्ष शौकत अली शनिवार को प्रयागराज में अतीक अहमद के बेटे अबान के जनाज़े के शामिल हुए. इस दौरान उनकी छोटी सी मुलाकात अतीक के बेटों उमर और अली से हुई. प्रयागराज के कसारी मसारी में जिस क़ब्रिस्तान में एक्सीडेंट में मरे अबान को दफ़नाया जाना था, उसी के बगल में स्थित मस्जिद में एमआईएम के प्रदेश अध्यक्ष शौकत अली मौजूद थे. जेल से पे-रोल पर जनाज़े में शामिल होने आए उमर और अली जब उस मस्जिद में गए, तभी शौकत अली से उनकी छोटी सी मुलाक़ात हुई.
एमआईएम के प्रदेश अध्यक्ष शौकत अली अब इस मुलाक़ात को लेकर मुस्लिम नेताओं से सवाल कर रहे हैं कि आख़िर अबान के जनाज़े में कोई मुस्लिम नेता क्यों शामिल होने नहीं आया. एमआईएम ये सवाल समाजवादी पार्टी और कांग्रेस दोनों से पूछ रही है. चूंकि अतीक सपा से सांसद और विधायक रहा था, ऐसे में ओवैसी की पार्टी का निशाना सपा पर तो है ही, वो सवाल कांग्रेस के इमरान प्रतापगढ़ी से पूछकर कांग्रेस को निशाने पर लेने की कोशिश कर रहे हैं.
बहराइच की मटेरा विधानसभा सीट से एआईएमआईएम के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने अपने प्रदेश अध्यक्ष शौकत अली को प्रत्याशी बनाया है. मटेरा की सड़कों पर नुक्कड़ सभाएं करके शौकत अली कांग्रेस सांसद इमरान प्रतापगढ़ी पर निशाना साधते हुए मुस्लिम समाज से कह रहे हैं कि जो लोग अतीक भाई के नाम से शेर पढ़कर नेता बन गए, वो कमज़र्फ़ अतीक के बेटे के जनाज़े में नहीं गए. उन्होंने कहा कि अतीक के परिवार को साल भर के अंदर ख़त्म कर दिया गया.
शौकत अली ने अपनी सभाओं के ये सवाल पूछना शुरू कर दिया है कि सिर्फ यूपी नहीं बल्कि पूरे देश का कोई मुसलमान नेता अतीक के बेटे के जनाज़े में शामिल होने नहीं गया. आख़िर वो किससे डरते हैं? उन्होंने कहा कि कोई ग़ाज़ी का नाम लेकर सत्ता में आ गया और कोई अतीक के नाम से अपनी राजनीति चमका गया लेकिन जनाज़े में एमआईएम से उनके अलावा किसी राजनैतिक दल का कोई शामिल होने नहीं आया. वो कहते हैं कि उन्होंने अली और उमर से कहा कि हौसला मत हारना.
एमआईएम इस मुद्दे को यहीं नहीं छोड़ने वाली है. एक तरफ़ ओवैसी सपा की तरफ़ सम्मानजनक हिस्सेदारी के ज़रिए दोस्ती का हाथ बढ़ाते हुए दिखाई देते हैं तो दूसरी तरफ़ सपा के गढ़ में घुसकर लगातार मुसलमानों को ये समझाने की कोशिश में हैं कि उनके अलावा मुसलमानों की बात को रखने वाला अब कोई नहीं है. ओवैसी ने यूपी में लगभग 200 सीटों पर लड़ने की घोषणा की है. हालांकि वो फोकस सिर्फ उन 40 सीटों पर कर रहे हैं जहां मुस्लिम आबादी विधानसभा चुनाव के नतीजों में जीत हार तय करती है. इसी वजह से उन्होंने बहराइच, सहारनपुर, बिजनौर और मुरादाबाद ज़िलों में सभाएं की हैं.
आंकड़ों की बात करें तो यूपी में मुस्लिम वोटों की संख्या 18-20 प्रतिशत मानी जाती है. राजनैतिक विशेषज्ञ ये मानते हैं कि मुसलमान उसको वोट करता है जो बीजेपी को हराने में सक्षम हो. बीते तीन दशकों में मुसलमानों का सबसे अधिक वोट समाजवादी पार्टी के पक्ष में जाता दिखाई दिया है. ओवैसी की एआईएमआईएम ने इससे पहले भी यूपी विधानसभा का चुनाव लड़ा है लेकिन उनको अब तक एक भी सीट पर जीत नसीब नहीं हुई है. हालांकि मुस्लिम बहुल सीटों पर ये माना जाता है कि एमआईएम को मिलने वाले वोट सपा के खाते से निकालकर ओवैसी के पास गए हैं.
समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता मोहम्मद आज़म ख़ान ने कहा कि शौकत अली का अबान के जनाज़े में शामिल होना उनका व्यक्तिगत मामला है. उन्होंने कहा कि यूपी में अगर एमआईएम संभावनाएँ तलाश रही है तो इसमें कोई दिक्कत नहीं है लेकिन अगर बीजेपी को हराना है तो समान विचार वाले लोगों को साथ आना होगा. सपा को जवाब देते हुए एआईएमआईएम प्रवक्ता शादाब चौहान ने कहा कि ये दुर्भाग्य है कि जिस पार्टी से अतीक सांसद विधायक रहे, वो दल धर्म देखकर आज एक ट्वीट करने तक को तैयार नहीं है. बीजेपी सपा और एमआईएम को एक सिक्के के दो पहलू बताकर तंज कर रही है.
फ़िलहाल एआईएमआईएम मुसलमानों के बीच जाकर मुसलमानों की बात कह रही है और निशाना पर सीधे तौर पर इंडिया अलायन्स के सपा और कांग्रेस जैसे दल हैं. एमआईएम जिस तरह मुसलमानों के मुद्दों को उठा रही है, उससे उसे वोट मिलेगा या नहीं, ये तो भविष्य बताएगा लेकिन एमआईएम के रुख़ से सबसे ज़्यादा अगर कोई परेशान है तो वो समाजवादी पार्टी है. अगर ओवैसी मुसलमानों के एक हिस्से को अपनी तरफ़ खींच लेते हैं तो ज़ाहिर है नुक़सान सपा को होगा और फ़ायदा बीजेपी ले जा सकती है.
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