- मेजर मनोज तलवार ने कारगिल युद्ध में अदम्य साहस दिखाते हुए पॉइन्ट 5765 पर विजय प्राप्त की थी.
- मेजर तलवार की तैनाती सियाचिन के साल्तोरो रिज पर समय से पूर्व उनकी विशेष मांग पर हुई थी.
- उन्होंने असम में ऑपरेशन राइनो में उल्फा उग्रवादियों के खिलाफ भी बहादुरी दिखाई थी.
Major Manoj Talwar: कारगिल युद्ध 1999 में भारतीय वायुसेना के अदम्य साहस और IAF अफसरों की असली जिंदगी पर आधारित वेब सीरीज ‘ऑपरेशन सफेद सागर' इन दिनों सुर्खियों में है. इस बीच भारतीय सेना की इन्फैंट्री रेजिमेंट महार के मेजर मनोज तलवार की वह कहानी भी जान लीजिए, जिसने पाकिस्तान के नापाक मंसूबों पर पानी फेर दिया था. वह मेजर जो कारगिल में दुश्मन से शेर की तरह लड़े थे. भारतीय सेना के एक विशेष अभियान का नाम तो उनके नाम पर ही 'ऑपरेशन तलवार' रख दिया गया था.

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सैन्य परंपरा की तीसरी पीढ़ी
उनके पिता ने वर्ष 1962 के युद्ध और 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान लद्दाख में दुनिया के सबसे ऊंचे हवाई अड्डों में से एक के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. पिता की पोस्टिंग के चलते मनोज तलवार का बचपन कानपुर छावनी में बीता. फौजी माहौल में पले-बढ़े मनोज तलवार ने जब स्कूल में चित्रकला प्रतियोगिता हुई, तो उसमें उन्होंने एक 'युद्ध दृश्य' उकेरा था.
असम में ऑपरेशन राइनो में दिखाई बहादुरी
भारतीय सेना में जाने की अपने परिवार की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए मनोज तलवार ने आर्म्ड फोर्सेज मेडिकल कॉलेज और नेशनल डिफेंस एकेडमी दोनों की प्रवेश परीक्षाएं एक साथ उत्तीर्ण की थीं. हालांकि, डॉक्टर बनने की बजाय उन्होंने भारतीय सेना में अग्रिम मोर्चे पर देश के लिए लड़ने वाली इन्फैंट्री में अफसर बनने की ठानी. दिसंबर 1992 में मेजर मनोज को महार रेजिमेंट की तीसरी बटालियन (3 महार) में कमीशन प्राप्त हुआ. असम में 'ऑपरेशन राइनो' के तहत उल्फा उग्रवादियों के सफाए के लिए चलाए गए अभियानों में बहादुरी दिखाने पर उन्हें सेना मेडल से सम्मानित किया गया.

मनोज तलवार को फरवरी 1999 में उन्हें सियाचिन के साल्तोरो रिज पर तैनात किया गया था.
सियाचिन की दुर्गम चोटियों पर 'आउट ऑफ टर्न' तैनाती
भारतीय सेना ज्वाइन किए छह साल ही हुए थे कि फरवरी 1999 में उन्हें सियाचिन के साल्तोरो रिज पर तैनात किया गया. खास बात यह है कि दुनिया के सबसे ऊंचे युद्ध क्षेत्र सियाचिन में उनकी तैनाती खुद की विशेष मांग पर 'आउट ऑफ टर्न' (समय से पूर्व) हुई थी. उन्हें 9 महार बटालियन के साथ सियाचिन के साल्तोरो रिज पर भेजा गया था. मेजर मनोज तलवार की सियाचिन में तैनाती के महज तीन महीने में ही भारतीय सेना को पता चला कि मई 1999 में कारगिल की चोटियों पर पाकिस्तानी घुसपैठियों ने कब्जा जमा लिया है. तब टुरटुक सब-सेक्टर में दुश्मनों को खदेड़ने के लिए सेना ने एक विशेष अभियान की रूपरेखा तैयार की, जिसे उनके नाम पर 'ऑपरेशन तलवार' का कोडनेम दिया गया.

दिसंबर 1992 में मेजर मनोज को महार रेजिमेंट की तीसरी बटालियन (3 महार) में कमीशन प्राप्त हुआ
माइनस 60 डिग्री में भीषण गोलाबारी और पॉइन्ट 5765 पर तिरंगा
13 जून 1999 की अंधेरी और सर्द रात में, शून्य से 40 से 60 डिग्री नीचे के तापमान और खड़ी बर्फीली चट्टानों के बीच मेजर मनोज तलवार अपनी टुकड़ी के साथ आगे बढ़े. पाकिस्तानी सेना ने ऊपर से भारी गोलाबारी शुरू कर दी. इस भीषण हमले में एक जवान घायल हो जाने के बाद मेजर तलवार ने खुद मशीन गन उठाने का अदम्य साहस दिखाया और अपनी टुकड़ी को जवाबी कार्रवाई के लिए प्रेरित किया.
इस दौरान दुश्मनों के मोर्टार और ग्रेनेड के छर्रे लगने से मेजर मनोज तलवार बुरी तरह घायल हो गए, लेकिन उन्होंने दुश्मन को चकमा देने के लिए अपनी टुकड़ी को सामने से घेरने का आदेश दिया. 13 और 14 जून 1999 की मध्यरात्रि को अपने प्राणों की बाजी लगाकर उन्होंने कारगिल में पॉइन्ट 5765 पर कब्जा करके उस दुर्गम चोटी पर भारत का राष्ट्रीय ध्वज लहरा दिया.

मेजर मनोज तलवार 29 वर्ष की आयु में वे शहीद हो गए थे. पार्थिव शरीर 16 जून 1999 को उनके घर मेरठ पहुंचा था.
अंतिम सांस तक मुकाबला और शहादत
मेजर मनोज तलवार के इस अकल्पनीय शौर्य और बलिदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत 'वीर चक्र' से सम्मानित किया. उनके सामरिक योगदान के महत्व को देखते हुए पॉइन्ट 5765 को हमेशा के लिए 'तलवार टॉप' और 'तलवार बेस' का नाम दिया गया. इतना ही नहीं, 9 महार ने सियाचिन के तीसरे ग्लेशियर का नाम भी उनके सम्मान में 'मेजर मनोज तलवार ग्लेशियर' रखा है. मेरठ के कमिश्नरी चौक से उनके घर तक जाने वाले मार्ग को उनके नाम से जाना जाता है और वहां उनकी एक प्रतिमा भी स्थापित की गई है.
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