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मोबाइल की लत बच्चों को कैसे बना रही गुस्सैल-चिड़चिड़ा? CM योगी की चिंता पर जानें पेरेंट्स की राय

अभिभावकों ने कहा कि बच्चे मोबाइल की जिद करते हैं और अगर मोबाइल न मिले तो चिड़चिड़े हो जाते हैं. इस आदत पर समय रहते रोक लगाना जरूरी है. इसके लिए माता-पिता को भी सख्ती दिखाने की जरूरत है.

मोबाइल की लत बच्चों को कैसे बना रही गुस्सैल-चिड़चिड़ा? CM योगी की चिंता पर जानें पेरेंट्स की राय
मोबाइल की लत कैसे बच्चों को कर रही बीमार.
  • CM योगी ने छोटे बच्चों को मोबाइल फोन देने पर चिंता जताई और उन्हें पढ़ाई और अच्छी आदतों की ओर ध्यान देने को कहा
  • बच्चों का मोबाइल उपयोग उनके दिमाग की ग्रोथ, ध्यान, याददाश्त और व्यवहार पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है
  • मोबाइल पर अधिक समय बिताने से बच्चों में चिड़चिड़ापन, मानसिक तनाव, डिप्रेशन और नींद की समस्याएं बढ़ सकती हैं
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आज-कल की भागदौड़ भरी जिंदगी में मां-बाप बच्चों को ज्यादा समय नहीं दे पाते, नतीजन उनका ज्यादातर समय मोबाइल पर बीतता है. कई बार तो बच्चों की चिक-चिक से दूर रहने के लिए परिवार ही बच्चों के हाथ में मोबाइल थमा देता है. मोबाइल की ये लत बच्चों की आंखों के साथ दिमाग के लिए भी घातक है. बच्चों का मोबाइल पर बिताया गया समय उनके दिमाग की ग्रोथ, ध्यान, याददाश्त और व्यवहार पर असर डाल सकता है. ऐसे कई मामले देखने को भी मिलते हैं. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी छोटे बच्चों को मोबाइल फोन देने पर चिंता जताई है.

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मंगलवार को सीएम योगी ने कहा कि कम उम्र में बच्चों के हाथ में स्मार्टफोन आना उनके भविष्य के लिए ठीक नहीं है. उन्होंने माता-पिता को आगाह करते हुए कहा कि बच्चों को मोबाइल देने के बजाय पढ़ने-लिखने और अच्छी आदतों की ओर ले जाना चाहिए.अगर बच्चा छोटी उम्र में मोबाइल का आदी हो जाता है, तो वह जिद्दी हो सकता है. ज्यादा मोबाइल के इस्तेमाल से उनमें चिड़चिड़ापन आता है और आगे चलकर वे मानसिक तनाव और डिप्रेशन जैसी परेशानियों का शिकार भी हो सकते हैं.

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बच्चों को मोबाइल देने पर क्या है माता-पिता की राय?

सीएम योगी के इस बयान को लेकर एनडीटीवी ने मुरादाबाद में छोटे बच्चों के माता-पिता से बातचीत कर उनकी राय जानने की कोशिश की. NDTV पर ज्यादातर अभिभावकों ने मुख्यमंत्री की बात से सहमति जताई. उन्होंने कहा कि पहले बच्चे बाहर खेलते थे, किताबें पढ़ते थे, जिससे उनका दिमाग बेहतर तरीके से विकसित होता था.

अभिभावकों ने कहा कि अब बच्चे मोबाइल की जिद करते हैं और अगर मोबाइल न मिले तो चिड़चिड़े हो जाते हैं. उनका मानना है कि बच्चों की इस आदत पर समय रहते रोक लगाना जरूरी है. इसके लिए माता-पिता को भी सख्ती दिखाने की जरूरत है. उन्होंने यह भी कहा कि स्कूल से मिले होमवर्क के लिए भी बच्चे मोबाइल चलाते हैं, यह भी गलत है.

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स्क्रीन टाइम का दिमाग पर असर

दिसंबर के आखिरी हफ्ते में आई एक स्टडी के मुताबिक, बच्चों के स्क्रीन टाइम यानी मोबाइल, डिवाइस पर बिताया गया समय उनके दिमाग की ग्रोथ, ध्यान, याददाश्त और व्यवहार पर असर डाल सकता है. यह पाया गया कि मोबाइल और डिजिटल तकनीक बच्चों के दिमाग के प्रि-फ्रंटल कॉर्टेक्स हिस्से को प्रभावित करती है, जो एक्जीक्यूटिव फंक्शन्स जैसे कि प्लान बनाना, निर्णय लेना और ध्यान बनाए रखना कंट्रोल करता है.

यह स्टडी करीब 30,000 बच्चों पर की गई है. जिससे पता चला है कि स्क्रीन टाइम से न केवल सोचने की क्षमता प्रभावित होती है, बल्कि भाषा, ध्यान, स्मरण शक्ति और भावनात्मक कंट्रोल जैसे जरूरी हिस्सों पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है. एक अन्य रिसर्च में यह भी कहा गया है कि जिन बच्चों का मोबाइल स्क्रीन टाइम तीन घंटे से ज्यादा था, वे स्मार्ट स्टैण्डर्ड टेस्ट में कम प्रदर्शन करते पाए गए, जिससे पता चलता है कि स्क्रीन का ज्यादा इस्तेमाल कॉग्निटिव डेवेलपमेंट यानी दिमागी ग्रोथ को भी रोक सकता है.

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मोबाइल का दिमाग पर भावनात्मक प्रभाव

  • मोबाइल पर ज्यादा समय बिताने से बच्चों के फोकस यानी ध्यान क्षमता को कमजोर करता है. बहुत ज्यादा नोटिफिकेशन, सोशल मीडिया और गेमिंग बच्चों को बार-बार डिस्ट्रेक्ट करते हैं.
  • स्क्रीन टाइम बचपन में दिमाग के विकास को बदल सकता है. दो अलग-अलग हिस्सों जैसे मेमोरी, भाषा और विजुअल प्रोसेसिंग प्रभावित होती है.
  • मोबाइल का देर तक उपयोग नींद को भी प्रभावित करता है. रात्रि में स्क्रीन की नीली रोशनी मेलाटोनिन हार्मोन को कम करती है, जिससे बच्चे को नींद आने में देर होती है और नींद पूरी नहीं होती, जो दिमागी स्वास्थ्य के लिए खराब है.
  • ज़्यादा स्क्रीन समय बच्चों में चिड़चिड़ापन, मूडीनेस, आक्रामकता और चिंता जैसी समस्याएं बढ़ा सकता है.
  •  एक्सपर्ट्स के मुताबिक, व्यवहार में  यह बदलाव दुनियाभर में बच्चों में बढ़ रहा है क्योंकि स्क्रीन पर मनोरंजन अक्सर इंस्टेंट फीडबैक देता है, जिससे बच्चे बार-बार मोबाइल की ओर आकर्षित होते हैं.
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मोबाइल बच्चों की मानसिक सेहत के लिए कितना खतरनाक?

  • पिछले साल अगस्त में आई एक नई ग्लोबल स्टडी ने चेतावनी दी थी कि 13 साल की उम्र से पहले स्मार्टफोन मिलना बच्चों की मानसिक सेहत के लिए खतरनाक साबित हो सकता है. रिसर्च के मुताबिक, कम उम्र में फोन पाने वाले युवाओं में आत्महत्या के विचार और आक्रामकता की संभावना बढ़ जाती है.
  • दुनियाभर के 1 लाख से ज्यादा लोगों पर किए गए एक बड़े अध्ययन ने खुलासा किया है कि जो बच्चे 13 साल से कम उम्र में स्मार्टफोन का इस्तेमाल करने लगते हैं, उनकी मानसिक सेहत और भविष्य की भलाई पर गंभीर असर पड़ता है.
  • जर्नल ऑफ ह्यूमन डेवलपमेंट एंड कैपेबिलिटीज में प्रकाशित इस रिसर्च के मुताबिक, 18 से 24 साल की उम्र में पहुंच चुके वे युवा, जिन्हें बचपन में स्मार्टफोन मिला था, ज्यादा आक्रामकता, वास्तविकता से अलगाव, आत्महत्या के विचार और आत्मसम्मान की कमी जैसी समस्याओं का सामना कर रहे हैं.
  • स्टडी में यह भी पाया गया कि यह खतरा शुरुआती उम्र में सोशल मीडिया एक्सपोजर, साइबरबुलिंग, खराब नींद और पारिवारिक रिश्तों में खटास से और बढ़ जाता है.  इन कारणों से बच्चों का मानसिक विकास प्रभावित होता है और बड़े होने पर उन्हें गंभीर दिक्कतों का सामना करना पड़ता है.
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सैपियन लैब्स की रिपोर्ट

जून 2023 में आई सैपियन लैब्स की रिपोर्ट में रिसर्चर्स का स्टडी के आधार पर कहना है कि अगर आप बच्चों को कम उम्र में ही मोबाइल फोन दे रहे हैं, तो यह उनके संपूर्ण स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है. जितनी कम उम्र में बच्चों के हाथ में मोबाइल आएगा, मानसिक रोगों का खतरा उतना अधिक हो सकता है. रिपोर्ट में जेनरेशन Z (18-24 वर्ष की आयु) वाले 27,969 लोगों के डेटा का इस्तेमाल किया गया. इसमें बचपन में स्मार्टफोन के उपयोग और वर्तमान मानसिक स्वास्थ्य के बीच संबंधों के बारे में पता लगाने की कोशिश की गई.

इसके मुताबिक, जिन लोगों ने बहुत ही कम उम्र से मोबाइल पर अधिक समय बिताना शुरू कर दिया था, उनमें मानसिक विकास और मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित दिक्कतें अधिक देखी गई हैं. जिन पुरुषों को 6 साल की उम्र में पहली बार स्मार्टफोन मिला था उनमें 18 साल की उम्र में स्मार्टफोन का इस्तेमाल शुरू करने वालों की तुलना में मानसिक विकारों के विकास का खतरा 6 फीसदी और महिलाओं में यह जोखिम करीब 20 फीसदी अधिक था. बच्चे अगर रोजाना 5 से 8 घंटे ऑनलाइन बिताते हैं तो यह साल में 2,950 घंटे के बराबर हो सकता है. स्मार्टफोन से पहले बच्चों यह समय परिवार और दोस्तों के साथ बीतता था. ऑनला

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