कृष्ण की नगरी मथुरा में होलिकादहन पर अजब नजारा देखने को मिला, जब कोसी कलां गांव फालेन के विश्व प्रसिद्ध पंडा मेला में भक्ति में डूबा शख्स आग उगलते अंगारों के बीच होलिका को पार करके निकल गया. ठीक होली के दिन इस गांव में पूरे रीतिरिवाज के साथ होलिका की प्रचंड अग्नि में से इसी गांव का रहने वाला संजू पंडा ऐसे निकल गया, जैसे वो आग में नहीं जमीन पर चल रहा हो.फालेन गांव में इस अनूठी परंपरा को लंबे समय से पूरा किया जाता रहा है. संजू पंडा ही नहीं, बल्कि सदियों से ये परंपरा चली आ रही है. पहले संजू पंडा के पिता और भाई इस आग से निकलते थे और अब संजू पंडा निकलते हैं.
संजू पंडा का घोर तप
भक्त प्रहलाद के मंदिर में संजू पंडा एक माह से घोर तप करते हैं और उपवास पर रहते हैं. पूरी निष्ठा से भगवान की पूजा अर्चना करते हैं. तभी इस अनूठे और आश्चर्य भरे काम को अंजाम दे पाते हैं. इस विश्व प्रसिद्ध पंडा मेले में भारत के ही नहीं कई देशो के श्रद्धालु यहां आते हैं. भक्तराज प्रह्लाद की नगरी फालैन में जब संजू पंडा आग के अंगारों से निकला तो उससे पहले उसने प्रह्लाद जी के मंदिर में हवन किया.
कृष्ण की नगरी मथुरा में होलिकादहन पर अजब नजारा देखने को मिला, जब कोसी कलां गांव फालेन के विश्व प्रसिद्ध पंडा मेला में भक्ति में डूबा शख्स आग उगलते अंगारों के बीच होलिका को पार करके निकल गया
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मथुरा होली की अनोखी परंपरा
करीब 3 घंटे तक हवन करने के बाद जब हवन की लौ ठंडी पड़ी तब संजू पंडा मंदिर से उठा और स्नान करने के लिए प्रह्लाद कुंड में चला गया. होली ब्रज का प्रमुख उत्सव है और इस उत्सव में अलग-अलग रूप देखने को मिलते हैं. कहीं पर लठमार होली होती है तो कही पर कपड़ा फाड़ हुरंगा,फूलों की होली तो कही चरकुला नृत्य. फालैन गांव मे सैकड़ों साल से चली आ रही प्रथा के अनुसार होलिका दहन के तत्काल बाद आग के शोलों के बीच से संजू पंडा ने निकल कर लोगों को दांतो तले अंगुली दबाने को मजबूर कर दिया.
कहा जाता है कि फालैन गांव भक्त प्रहलाद के वंशजों का गांव है. इसी कारण पंडा परिवार से एक व्यक्ति प्रति वर्ष अपनी इस वंशानुगत परंपरा को निभाता चला आ रहा है. होली की सुबह के जैसे ही 4 बजे वैसे ही संजू पंडा मंदिर से उठा और शुभ मुहूर्त में पंडा जी प्रह्माद मंदिर में जलने वाले दीपक को लौ पर अपना हाथ रखते हैं. जब उन्हें दीपक की लौ ठंडी महसूस होने लगने लगती है, उसी समय वो अपने सारे कपड़े उतार कर और एक मात्र तन पर अंगोछा पहन कर मंदिर के समीप स्थित कुंड में स्नान कर सीधे दौड़ते हुए तालाब से आते हैं और आठ दस मीटर के वर्गाकार क्षेत्र मे धधकती आग के बीच से सकुशल निकल जाते हैं.
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