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देवबंद में मस्जिद के नीचे शिव मंदिर होने का दावा, हिंदू संगठन के नेता बोले- शिवलिंग नहीं मिला तो फांसी दे देना

दावा किया गया है कि दारुल उलूम परिसर में स्थित मस्जिद के नीचे प्राचीन शिव मंदिर मौजूद है. इस पूरे मामले पर सहारनपुर प्रशासन का कहना है कि यह प्रकरण सिटी मजिस्ट्रेट के स्तर पर विचाराधीन है. जिलाधिकारी अरविंद चौहान के मुताबिक, संबंधित मांग पत्र सिटी मजिस्ट्रेट को सौंपा गया है.

देवबंद में मस्जिद के नीचे शिव मंदिर होने का दावा, हिंदू संगठन के नेता बोले- शिवलिंग नहीं मिला तो फांसी दे देना
  • देवबंद में दारुल उलूम मदरसे के मस्जिद के नीचे प्राचीन शिव मंदिर होने का हिंदू रक्षा दल ने दावा किया है.
  • ललित शर्मा ने प्रशासन से मस्जिद के नीचे शिवलिंग और मंदिर के अवशेषों की वैज्ञानिक खुदाई कराने की मांग की है.
  • सहारनपुर प्रशासन ने कहा है कि बिना ठोस साक्ष्य या न्यायालय के आदेश के जांच शुरू नहीं की जाएगी.

उत्तर प्रदेश के सहारनपुर से करीब 40 किलोमीटर दूर स्थित देवबंद का दारुल उलूम एशिया के सबसे बड़े मदरसों में गिना जाता है. इस संस्थान को लेकर एक हिंदूवादी संगठन ने नया विवाद खड़ा कर दिया है. दावा यह किया गया है कि दारुल उलूम परिसर में स्थित मस्जिद के नीचे एक प्राचीन शिव मंदिर मौजूद है. हिंदू रक्षा दल के उत्तराखंड प्रदेश अध्यक्ष ललित शर्मा गुरुवार को करीब दो दर्जन समर्थकों के साथ सहारनपुर पहुंचे और जिलाधिकारी कार्यालय के सामने धरने पर बैठ गए. कुछ घंटे धरना देने के बाद उन्होंने प्रशासन को मांग पत्र सौंपा और देहरादून के लिए रवाना हो गए. लेकिन उनके दावे ने सहारनपुर में विवाद को जन्म दे दिया.

शुक्रवार को एनडीटीवी ने जब ललित शर्मा से बातचीत की, तो पता चला कि वे इस समय देहरादून में हैं और फिलहाल सहारनपुर लौटने का कोई इरादा नहीं रखते. हैरानी की बात यह रही कि अपने दावे के समर्थन में वह न तो कोई ठोस तर्क दे सके और न ही कोई प्रमाण प्रस्तुत कर पाए. इस मामले में एनडीटीवी ने जिलाधिकारी, बीजेपी नेताओं, सहारनपुर के इतिहासकारों और दारुल उलूम देवबंद के प्रवक्ता से बातचीत कर पड़ताल की.

'14 फीट नीचे शिवलिंग और मंदिर के अवशेष'

हिंदू रक्षा दल के प्रदेश अध्यक्ष ललित शर्मा ने दावा किया कि दारुल उलूम परिसर में स्थित मस्जिद के नीचे एक प्राचीन शिव मंदिर मौजूद है. उनके अनुसार, जमीन से लगभग 14 फीट नीचे शिवलिंग और मंदिर के अवशेष हैं. उन्होंने प्रशासन से पूरे परिसर की वैज्ञानिक जांच और खुदाई कराने की मांग की है. उनका कहना है कि उन्हें यह जानकारी स्थानीय लोगों और अन्य स्रोतों से मिली है. उन्होंने यहां तक कहा कि यदि खुदाई में मंदिर नहीं मिला, तो उन्हें फांसी दे दी जाए. साथ ही इस मामले को लेकर अदालत में जनहित याचिका दाखिल करने की भी बात कही.

हिंदू रक्षा दल के प्रदेश अध्यक्ष ललित शर्मा

हिंदू रक्षा दल के प्रदेश अध्यक्ष ललित शर्मा

इस पूरे विवाद पर सहारनपुर प्रशासन का कहना है कि मामला सिटी मजिस्ट्रेट के पास है. जिलाधिकारी अरविंद चौहान ने बताया कि मांग पत्र उन्हें ही सौंपा गया है और अभी इसकी समीक्षा नहीं की गई है. एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि केवल मांग पत्र देने भर से जांच शुरू नहीं की जाती, इसके लिए ठोस साक्ष्य या न्यायालय का निर्देश आवश्यक होता है.

'मंदिर होने का कोई जिक्र नहीं'

सहारनपुर में बीजेपी से जुड़े नेता अजीत सिंह बताते हैं कि सहारनपुर का सबसे गहरा इतिहास स्वर्गीय केके शर्मा ने लिखा है. उनकी किताब है. सहारनपुर संदर्भ उसे पढ़ा है. लेकिन उसमें देवबंद दारुल उलूम के इतिहास को बताया गया है लेकिन मंदिर होने का कोई जिक्र नहीं है. हां मुस्लिम इसे देवबंद कहते हैं, जबकि हिन्दू इस देववन कहते हैं. अगर ललित शर्मा ने दावा किया है तो प्रशासन को उसकी जांच करवानी चाहिए. जब उनसे ललित शर्मा के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि वो उनको नहीं जानते हैं लेकिन उनको तथ्य दिखाना चाहिए.

इतिहासकार की नजर से देवबंद का इतिहास

इतिहासकार राजीव उपाध्याय, जिनकी पुस्तक ‘हमारा सहारनपुर' संस्कृति मंत्रालय द्वारा प्रकाशित है, बताते हैं कि सहारनपुर का इतिहास उत्तर वैदिक काल तक जाता है. देवबंद का प्राचीन नाम ‘देवीवन' बताया जाता है और पांडवों से जुड़ी कथाएं भी प्रचलित हैं. हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि 1857 की क्रांति के बाद ही दारुल उलूम की स्थापना हुई थी और इसके नीचे किसी मंदिर के होने का कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं मिलता. उन्होंने कहा कि अगर ऐसा कुछ होता तो अंग्रेजों के गजेटियर या अन्य अभिलेखों में इसका उल्लेख जरूर मिलता, लेकिन ऐसा कोई साक्ष्य अब तक सामने नहीं आया है.

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दारुल उलूम देवबंद के प्रवक्ता अशरफ उस्मानी ने इस दावे पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि वे इस तरह के बयानों को कोई महत्व नहीं देते और इस विषय पर टिप्पणी भी नहीं करना चाहते. वहीं, सहारनपुर के नगर काजी नदीम ने कहा कि दारुल उलूम की स्थापना 1857 के बाद शिक्षा और अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष के उद्देश्य से की गई थी. उनके मुताबिक, इस तरह के दावे आज के समय में कोई भी कर सकता है, लेकिन इनके समर्थन में कोई प्रमाण नहीं हैं.

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