विज्ञापन

 इलाहाबाद हाईकोर्ट का अहम फैसला: मुस्लिम पर्सनल लॉ के बावजूद कस्टडी मामलों में ‘गार्जियंस एण्ड वार्ड्स एक्ट’ होगा लागू

Allhabad High Court verdict: हाईकोर्ट ने दोहराया कि किसी भी नाबालिग की कस्टडी का फैसला यांत्रिक तरीके से नहीं किया जा सकता. इसके लिए जरूरी है कि सभी तथ्यों, परिस्थितियों और सबूतों की गहन जांच की जाए. कोर्ट ने कहा कि बच्चे की भलाई का आकलन किए बिना कोई भी फैसला न्यायसंगत नहीं माना जा सकता. इस प्रक्रिया में पक्षकारों से बातचीत और सभी पहलुओं की जांच आवश्यक होती है.

 इलाहाबाद हाईकोर्ट का अहम फैसला: मुस्लिम पर्सनल लॉ के बावजूद कस्टडी मामलों में ‘गार्जियंस एण्ड वार्ड्स एक्ट’ होगा लागू
इलाहाबाद हाईकोर्ट का अहम फैसला: मुस्लिम पर्सनल लॉ के बावजूद कस्टडी मामलों में ‘गार्जियंस एंड वार्ड्स एक्ट’ होगा लागू
NDTV

Allhabad High Court Verdict on Muslim Family: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नाबालिग बच्चों की कस्टडी से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत आने वाले पक्षों को भी ‘गार्जियंस एण्ड वार्ड्स एक्ट, 1890' के तहत कस्टडी मांगने से रोका नहीं जा सकता. कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में अंतिम निर्णय का आधार हमेशा बच्चे का कल्याण होता है, जो किसी भी अन्य कानूनी पहलू से ऊपर है.

कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि भले ही पक्षकार व्यक्तिगत कानूनों से शासित हों, लेकिन कस्टडी और अभिभावकता के मामलों में अदालत का अधिकार क्षेत्र ‘गार्जियंस एंड वार्ड्स एक्ट' के तहत बना रहता है. न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि पारिवारिक न्यायालय को नाबालिग की कस्टडी, अभिभावकता और मुलाकात के अधिकार से जुड़े मामलों की सुनवाई करने का पूरा अधिकार है. ऐसे मामलों में व्यक्तिगत कानून मार्गदर्शक हो सकते हैं, लेकिन अंतिम निर्णय बच्चे के हित को ध्यान में रखकर ही लिया जाएगा.

 ‘बच्चे का हित सर्वोपरि' सिद्धांत पर जोर

हाईकोर्ट ने दोहराया कि किसी भी नाबालिग की कस्टडी का फैसला यांत्रिक तरीके से नहीं किया जा सकता. इसके लिए जरूरी है कि सभी तथ्यों, परिस्थितियों और सबूतों की गहन जांच की जाए. कोर्ट ने कहा कि बच्चे की भलाई का आकलन किए बिना कोई भी फैसला न्यायसंगत नहीं माना जा सकता. इस प्रक्रिया में पक्षकारों से बातचीत और सभी पहलुओं की जांच आवश्यक होती है.

 हैबियस कॉर्पस याचिका पर कोर्ट ने क्यों नहीं किया हस्तक्षेप

इस मामले में एक मुस्लिम महिला ने अपने बच्चों की कस्टडी के लिए बंदी प्रत्यक्षीकरण (हैबियस कॉर्पस) याचिका दायर की थी. हालांकि कोर्ट ने इस याचिका पर सीधे हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया. कोर्ट ने कहा कि हैबियस कॉर्पस की कार्यवाही संक्षिप्त प्रकृति की होती है और इसमें कस्टडी से जुड़े जटिल तथ्यों की विस्तृत जांच संभव नहीं है. ऐसे मामलों के लिए पारिवारिक न्यायालय ही उचित मंच है.

याचिकाकर्ता को फैमिली कोर्ट जाने का निर्देश

न्यायालय ने याचिकाकर्ता महिला को सलाह दी कि वह अपने बच्चों की कस्टडी के लिए सक्षम पारिवारिक न्यायालय का दरवाजा खटखटाए. कोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट के पास सभी पहलुओंजैसे अभिभावकता, कस्टडी और बच्चे के हित—की विस्तृत जांच करने और कानून के अनुसार उचित आदेश देने का अधिकार है.

यह भी पढ़ें- किंगपिन पर यूपी की सबसे बड़ी चोट: 80 करोड़ से ज्यादा की संपत्ति जब्त, 34 प्रॉपर्टी सीज

याचिकाकर्ता महिला ने आरोप लगाया था कि उसके पति ने दहेज की मांग पूरी न होने पर उसे घर से निकाल दिया और उसके नाबालिग बच्चों को उससे अलग कर दिया. महिला की ओर से यह दलील दी गई कि मुस्लिम कानून के तहत छोटे बच्चों की कस्टडी मां को मिलनी चाहिए. वहीं, प्रतिवादी पक्ष ने कहा कि पिता के पास बच्चों का रहना कानून के खिलाफ नहीं है. 

यह भी पढ़ें-  गोरखपुर का गजब जुगाड़! पेट्रोल की किल्लत में मैकेनिक का 'डबल टंकी' अवतार, पंप पर मची अफरा-तफरी

NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं

फॉलो करे:
Listen to the latest songs, only on JioSaavn.com