दवा के लाइसेंस वाले 80 साल पुराने कानून में बदलाव को लेकर सरकार की ओर से अधिसूचना जारी कर दी गई है. केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने ड्रग्स रूल्स , 1945 में संशोधन की अधिसूचना जारी करते हुए कहा कि यह संशोधन दवा नियामक प्रणाली को अधिक पारदर्शी, जवाबदेह और विश्वसनीय बनाना मुख्य उद्देश्य है. इसके तहत अब यदि कोई कंपनी या आवेदक दवा के लाइसेंस या मंजूरी के लिए फर्जी या मनगढ़ंत वैज्ञानिक डेटा जमा करता है, तो उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई होगी.
अधिसूचना में बताया गया है कि दवा के लाइसेंस में किसी भी तरह की गड़बड़ी की गई तो, केवल आवेदन खारिज करने या लाइसेंस रद्द करने तक ही कार्रवाई सीमित नहीं रहेगी. अब ऐसे आवेदकों को एक निश्चित अवधि तक नए आवेदन करने से भी प्रतिबंधित किया जा सकेगा. यह प्रतिबंध राज्य या केंद्र की संबंधित लाइसेंसिंग अथॉरिटी द्वारा लगाया जाएगा
कार्रवाई से पहले क्या होगी प्रक्रिया?
बताया गया है कि किसी भी दंडात्मक कार्रवाई से पहले संबंधित आवेदक को शो-कॉज नोटिस दिया जाएगा. जिसके बाद आवेदक को अपना पक्ष रखने का मौका मिलेगा. यदि वह निर्णय से असंतुष्ट है तो आवेदक को अपील करने का अधिकार भी दिया जाएगा.
सरकार ने यह कदम क्यों उठाया?
सरकार ने बताया कि दवाओं की गुणवत्ता, सुरक्षा और प्रभावशीलता का मूल्यांकन वैज्ञानिक डेटा के आधार पर होता है. यदि डेटा फर्जी या गलत हो, तो दवा की गुणवत्ता पर सवाल उठ सकते हैं. इससे मरीजों की सुरक्षा को खतरा भी हो सकता है. इस वजह से पूरी नियामक प्रक्रिया की विश्वसनीयता प्रभावित होती है. ऐसे में सरकार ने यह कदम उठाया है.
इस संशोधन से क्या लाभ होंगे?
- इस नए संशोधन से दवा कंपनियों में जवाबदेही बढ़ेगी.
- फर्जी दस्तावेज और गलत डेटा देने वालों पर रोक लगेगी.
- दवाओं की मंजूरी विश्वसनीय वैज्ञानिक प्रमाणों के आधार पर होगी.
- मरीजों को अधिक सुरक्षित और गुणवत्तापूर्ण दवाएं मिलने में मदद मिलेगी.
- भारत की दवा नियामक व्यवस्था वैश्विक मानकों के अनुरूप और मजबूत होगी.
- नियमों का पालन करने वाली दवा कंपनियों को बढ़ावा मिलेगा और अनियमित कंपनियों पर सख्त कार्रवाई होगी.
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