रेलवे ट्रैक की सुरक्षा और रखरखाव की और बेहतर निगरानी के लिए अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और मल्टी-सेंसर तकनीकों का इस्तेमाल किया जाएगा. रेलवे के अनुसार, आईआईटी गुवाहाटी और भुवनेश्वर द्वारा तैयार की जा रही "ऑटोनॉमस यूनिटरी सिस्टम फॉर इंस्पेक्शन एंड मॉनिटरिंग ऑफ परमानेंट वे" नामक यह उन्नत तकनीकी प्रणाली ट्रैक की सेहत का रियल-टाइम आकलन करेगी. आईआईटी गुवाहाटी के प्रोफेसर और प्रसिद्ध वैज्ञानिक प्रो. अश्विनी के. नंदा के अनुसार, इस प्रणाली में रेलवे ट्रैक की स्थिति पर लगातार निगरानी रखने के लिए कई तरह के सेंसर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डिजिटल ट्विन तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा. सेंसरों से मिलने वाले आंकड़ों का एआई के जरिए विश्लेषण होगा, जिससे किसी संभावित खराबी या जोखिम का पहले से पता लगाया जा सकेगा. इससे रेलवे को समय रहते मरम्मत और रखरखाव करने में मदद मिलेगी तथा दुर्घटनाओं की संभावना कम होगी.
नई तकनीकी को तेजी से अपना रहा रेलवे
पूर्वोत्तर रेलवे के महाप्रबंधक चेतन कुमार श्रीवास्तव ने कहा कि रेलवे नेटवर्क का तेजी से विस्तार हो रहा है. ऐसे में भविष्य की जरूरतों को देखते हुए रेलवे नई तकनीकों को तेजी से अपना रहा है. उन्होंने कहा कि तकनीकी नवाचार और पर्यावरण संरक्षण दोनों साथ-साथ चलने चाहिए, ताकि रेलवे व्यवस्था अधिक सुरक्षित, स्मार्ट और टिकाऊ बन सके.
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पूर्वोत्तर रेलवे के मुख्य जनसम्पर्क अधिकारी कपिंजल किशोर शर्मा ने कहा कि रेलवे आधुनिक डिजिटल तकनीकों और हरित पहलों को साथ लेकर सेवाओं को और अधिक सुरक्षित, कुशल तथा पर्यावरण के अनुकूल बनाने के लिए लगातार प्रयास कर रहा है. एआई आधारित यह ट्रैक मॉनिटरिंग जैसी तकनीकें भविष्य में रेलवे सुरक्षा और परिचालन दक्षता को नई दिशा दे सकती हैं.
आईआईटी गुवाहाटी और भुवनेश्वर मिलकर कर रहे काम
रेलवे बोर्ड के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि ये रोबोटिक मॉडल अभी तैयार नहीं हुआ है. इस पर आईआईटी गुवाहाटी और आईआईटी भुवनेश्वर मिलकर काम कर रहें हैं. पहले ईस्ट कोस्ट रेलवे और पूर्वोत्तर रेलवे ने अलग-अलग इस मॉडल प्रयास शुरू किया था लेकिन अब दोनों जोन आईआईटी के साथ मिलकर कार्य कर रहें हैं. उन्होंने कहा कि अभी यह तकनीकी विकसित नहीं हुई है पर इस काम तेजी से चल रहा है. लेकिन जब यह बनकर तैयार हो जाएगी तो इसे ट्रायल के तौर पर पूर्वोत्तर रेलवे में इस्तेमाल किया जाएगा और अगर यह सफल रहा तो फिर चरणबद्ध तरीके से देशभर लागू करेंगे.
क्यों जरूरी है यह तकनीकी?
दरअसल, पूर्वोत्तर रेलवे के अंतर्गत भारत के 7 पूर्वी राज्य शामिल हैं. इन राज्यों की भौगोलिक और मौसम संबंधी चुनौतियां देश के अन्य हिस्सों की तुलना में अलग है. यहां पहाड़ी इलाके, घने जंगल, भारी बारिश और भूस्खलन जैसी समस्याएं सामान्य हैं. ऐसे में इन जगहों में रेलवे ट्रैक को नुकसान पहुंचने का खतरा ज्यादा रहता है. एआई आधारित सिस्टम ट्रैक की स्थिति पर लगातार नजर रखकर संभावित खतरे की पहले ही जानकारी दे सकता है. असम समेत पूर्वोत्तर के कई हिस्सों में हर साल बाढ़ आती है. ऐसे में कई बार ट्रैक के नीचे की मिट्टी कमजोर हो जाती है. यही वजह है कि सेंसर आधारित तकनीक ट्रैक में होने वाले छोटे-छोटे बदलावों को भी पहचान सकती है, जिससे समय रहते कार्रवाई हो जाएगी.
दुर्घटनाओं की रोकथाम और दूरस्थ क्षेत्रों में बढ़ेगी निगरानी
रेलवे अधिकारियों के अनुसार, पूर्वोत्तर रेलवे जोन के कई रेलमार्ग दूरस्थ और दुर्गम क्षेत्रों से गुजरते हैं, क्योंकि अभी ट्रैक निरीक्षण का बड़ा हिस्सा कर्मचारियों पर निर्भर है, ऐसे में इन जगहों पर बार-बार टीम भेजना आसान नहीं है. यही वजह है कि एआई और डिजिटल ट्विन तकनीक के जरिए मुख्यालय से ही ट्रैक की स्थिति की 24x7 निगरानी की जा सकेगी. उन्होंने कहा कि स्मार्ट ट्रैक मैनेजमेंट सिस्टम किसी भी खामी का तुरंत अलर्ट देता है, जिससे पटरी टूटने, धंसने या अन्य तकनीकी खराबियों से होने वाली दुर्घटनाओं का खतरा कम रहेगा. यह सिस्टम मरम्मत की लागत कम करने के साथ संसाधनों का बेहतर उपयोग करेगा.
रेलवे का मानना है कि यह तकनीक ट्रेनों की समयबद्धता में सुधार करेगी. अधिकारियों के अनुसार, कई बार ट्रैक की खराबी के कारण ट्रेनों की गति कम करनी पड़ती है या सेवाएं प्रभावित होती हैं लेकिन नई तकनीकी से समय रहते समस्या का पता चलेगा जिससे ट्रेनों का संचालन अधिक सुरक्षित और सुचारू हो जाएगा.
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