Hydrogen Bus: देश में प्रदूषण कम करने और क्लीन एनर्जी को बढ़ावा देने के लिए अब हाइड्रोजन बसों पर तेजी से काम किया जा रहा है. हाइड्रोजन फ्यूल सेल टेक्नोलॉजी से चलने वाली ये बसें न केवल पर्यावरण के लिए सुरक्षित हैं, बल्कि डीजल और सीएनजी बसों के मुकाबले ज्यादा बेहतर ऑप्शन मानी जा रही हैं. खास बात यह है कि इन बसों से धुएं के बजाय केवल पानी की भाप निकलती है. ऐसे में आने वाले सालों में हाइड्रोजन बसें देश के ट्रांसपोर्ट सिस्टम में बड़ा बदलाव ला सकती हैं.
कैसे काम करती है हाइड्रोजन बस
हाइड्रोजन बसें फ्यूल सेल टेक्नोलॉजी पर बेस्ड होती हैं. इनमें बस की छत पर हाई-प्रेशर टैंकों में हाइड्रोजन गैस भरी जाती है. इसके बाद यह हाइड्रोजन फ्यूल सेल स्टैक तक पहुंचाई जाती है, जहां बाहर की हवा से ली गई ऑक्सीजन के साथ इसका केमिकल रिएक्शन होता है. इस प्रोसेस से बिजली पैदा होती है, जो बस की इलेक्ट्रिक मोटर को चलाती है. खास बात यह है कि इस पूरे प्रोसेस में किसी प्रकार का धुआं या जहरीली गैस नहीं निकलती. बस से केवल पानी की भाप निकलती है, इसलिए इसे पूरी तरह पर्यावरण अनुकूल तकनीक माना जाता है.
सीएनजी बसों पर क्या पड़ेगा असर
हाइड्रोजन बसें सीएनजी बसों की तुलना में ज्यादा स्वच्छ और आधुनिक ऑप्शन हैं. फिलहाल कई जगहों पर सीएनजी में हाइड्रोजन मिलाकर H-CNG टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल शुरू किया गया है. इससे कार्बन उत्सर्जन कम होता है. हालांकि, भविष्य में जैसे-जैसे हाइड्रोजन प्रोडक्शन और रीफ्यूलिंग इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलप होगा, हाइड्रोजन बसें धीरे-धीरे सीएनजी बसों की जगह ले सकती हैं. इन बसों को चलाने का खर्च भी कम होने की उम्मीद है, जिससे लोगों के लिए सफर सस्ता हो सकता है.
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हाइड्रोजन बसों के फायदे
हाइड्रोजन बसों का सबसे बड़ा फायदा शून्य उत्सर्जन है. इससे वायु प्रदूषण कम करने में बड़ी मदद मिल सकती है. इसके अलावा ये बसें एक बार टैंक भरने पर लगभग 600 किलोमीटर तक चल सकती हैं. लंबी दूरी की यात्रा के लिए इसे डीजल और सीएनजी से ज्यादा बेहतर ऑप्शन माना जा रहा है.
इन बसों को रीफ्यूल करने में भी बहुत कम समय लगता है. जहां बैटरी बेस्ड इलेक्ट्रिक बसों को चार्ज होने में लंबा समय लगता है, वहीं हाइड्रोजन बसों में कुछ ही मिनटों में फ्यूल भरा जा सकता है.
ये बसें बेहद कम शोर करती हैं, जिससे शोर प्रदूषण (Noise Pollution) भी घटता है.
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