"आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI बनाने वाले लोग दिल से ये मानते हैं कि ये दशक खत्म होने से पहले हम सभी को खत्म कर सकता है," हाल ही में एक रिसर्चर ने इस बात को कह कर तहलका मचा दिया है. उन्होंने बताया कि इसी डर के चलते उन्होंने सितंबर की शुरुआत में AI क्षेत्र की दिग्गज कंपनी Anthropic को छोड़ने का फैसला किया.
Jacob Coxon ने चेतावनी देते हुए कहा, "इंसानों की कोई भी अन्य एक्टिविटी इस स्तर का खतरा पैदा नहीं करती." तब से Jacob Coxon के कई साथियों और इस क्षेत्र के अन्य रिसर्चर ने भी इसी तरह के विचार शेयर किए हैं. जिसकी वजह से दुनिया भर में चिंता और अलर्ट की स्थिति पैदा हो गई है.
एडवांस AI सिस्टम से मानवता को खतरा
AI रिसर्चर्स और सिक्योरिटी एक्सपर्ट्स के बीच किए गए सर्वे से पता चलता है कि ये चिंता लगातार बढ़ रही है कि अत्यधिक एडवांस AI सिस्टम्स आने वाले समय में दुनिया के लिए विनाशकारी या अस्तित्व का संकट बन सकते हैं. नोबेल पुरस्कार विजेता और 'गॉडफादर ऑफ AI' कहे जाने वाले Geoffrey Hinton का मानना है कि इस बात की 10 प्रतिशत संभावना है कि AI एक दशक के भीतर सभी इंसानों को खत्म कर सकता है. उन्होंने बीबीसी से बातचीत में कहा, "मुझे यह बात बिल्कुल भी तर्कहीन नहीं लगती है." हालांकि, सभी अनुमान इतने डरावने नहीं हैं.
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MIT AI रिस्क इनिशिएटिव की एक रिपोर्ट के अनुसार, 270 से अधिक अंतरराष्ट्रीय AI एक्सपर्ट ने अनुमान लगाया है कि यदि जल्द ही कड़े सुरक्षा उपाय नहीं अपनाए गए, तो अगले पांच वर्षों के भीतर AI सिस्टम्स द्वारा बड़ी तबाही मचाने की 10 प्रतिशत आशंका है. इस तबाही का मतलब 10 लाख से अधिक लोगों की मौत या 100 अरब डॉलर से ज्यादा का फाइनेंशियल नुकसान हो सकता है.
AI से होने वाले बड़े नुकसान
एक्सपर्ट्स का कहना है कि AI से सबसे बड़ी तबाही तब आ सकती है जब ये सिस्टम्स ऐसी कैपिबिलिटी हासिल कर लें जो बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचा सकती हैं. अगर एआई धोखा देना, साइबर हमले, हथियारों का विकास, हेरफेर या खुद की कॉपियां बनाना शुरू कर दें तो बड़ी तबाही मचेगी. साथ ही अगर इंसान खुद साइबर हथियार बनाने या नए और खतरनाक रासायनिक, जैविक व परमाणु हथियारों को विकसित करने के लिए AI का इस्तेमाल करने लगें तो भी भारी नुकसान हो सकता है.

इसके अलावा, AI के जरिए सत्ता और ताकत का सेंट्रलाइजेशन ऑफ पावर और झूठी खबरों का तेजी से फैलना भी इसके सबसे बड़े खतरों में गिना जाता है. दुनिया पहले ही इस दिशा में कदम बढ़ा चुकी है. सेनाएं युद्ध के मैदान में टारगेट तय करने, लॉजिस्टिक्स और ड्रोन ऑपरेशन्स के लिए AI के इस्तेमाल के प्रयोग कर रही हैं.
Anthropic और गूगल जैसी कंपनियों ने खुलासा किया है कि उनके AI मॉडल्स का इस्तेमाल जैविक हथियार बनाने के प्रयासों में किया गया है. इसके अलावा, दुनिया पहले ही देख चुकी है कि कैसे OpenAI के सैकड़ों एजेंट्स ने एक होकर अपने टेस्टिंग एनवायरनमेंट को तोड़ दिया और दूसरी AI फर्म पर हमला बोल दिया.
लेकिन जेफ्री हिंटन का कहना है कि तबाही मचाने के लिए AI सिस्टम्स को असल दुनिया में कोई फिजिकल कदम उठाने की भी जरूरत नहीं है. उन्होंने कहा, "ये सिर्फ लोगों से बातचीत करके और उन्हें प्रभावित करके पूरी तरह से अफरा-तफरी का माहौल पैदा कर सकता है, साथ ही ये खतरनाक कंप्यूटर प्रोग्राम और जैविक वायरस भी खुद डिजाइन करने में कैपेबल होगा."

AI कंपनियों के प्रमुखों ने इस तरह के खतरों को लेकर तब चेतावनी दी थी, जब OpenAI को अपना पहला AI चैटबॉट लॉन्च किए हुए केवल एक साल ही हुआ था.
साल 2023 के मध्य में, OpenAI के सैम ऑल्टमैन, Anthropic की डेनिएला अमोदेई, गूगल डीपमाइंड की लीला इब्राहिम और अन्य टेक दिग्गजों ने एक बयान पर हस्ताक्षर किए थे. इसमें उन्होंने महामारी और परमाणु युद्ध के खतरों की तरह ही "AI से पैदा होने वाले अस्तित्व के विनाश के जोखिम" को कम करने को ग्लोबल प्रॉयोरिटी बनाने की मांग की थी.
अमेरिका और चीन में अंधी दौड़
लेकिन क्या उन्होंने इस खतरे से निपटने के लिए पर्याप्त कदम उठाए हैं? विशेषज्ञों और AI एक्टिविस्ट्स का मानना है कि ऐसा नहीं हुआ है. क्या वे AI के विकास की रफ्तार को धीमा कर सकते हैं? ऐसा तब तक संभव नहीं है जब तक कि उनके देश ऐसा न चाहें. AI डेवलपमेंट के दो सबसे बड़े केंद्र अमेरिका और चीन (और उनकी AI कंपनियां) इस अंधी दौड़ में उलझे हुए हैं ताकि वे भविष्य पर राज कर सकें.
विशेषज्ञों का तर्क है कि ज्यादा से ज्यादा सक्षम AI बनाने की इस होड़ में सुरक्षा को पीछे छोड़ दिया गया है और सारा ध्यान केवल स्पीड पर है. एमआईटी की रिपोर्ट में इस AI रेस को मानवता के लिए टॉप पांच खतरों में से एक बताया गया है. इस जोखिम को कम करने के लिए टेक जगत के इंटरनल लोग मांग कर रहे हैं कि AI के विकास की रफ्तार को धीमा किया जाए और अमेरिका व चीन इस तकनीक के भविष्य को लेकर आपसी सहमति पर आएं.
साल 2024 में 'एक्जिस्टेंशियल रिस्क ऑब्जर्वेटरी' द्वारा किए गए एक सर्वे में पाया गया कि 50 प्रतिशत से अधिक अमेरिकी AI से जुड़े इन अस्तित्व के खतरों को लेकर बेहद चिंतित थे.
'AI पॉलिसी इंस्टीट्यूट' के एक अन्य सर्वे के अनुसार, 83 प्रतिशत अमेरिकी चाहते हैं कि AI के विकास की रफ्तार को धीमा या रेगुलेट किया जाए, जबकि 65 प्रतिशत का कहना है कि यदि चीन आपसी तालमेल और तय स्पीड पर सहमत नहीं होता है, तो भी अमेरिकी कंपनियों को खुद ही अपनी रफ्तार धीमी कर लेनी चाहिए.
तो आखिर इस संभावित महा-विनाश को कैसे टाला जा सकता है? विशेषज्ञों का कहना है कि इसका जवाब इस बात में छिपा है कि हम AI को कैसे डिजाइन करते हैं. AI के गॉडफादर जेफ्री हिंटन कहते हैं, "हमें इसे इस तरह डिजाइन करने का तरीका खोजना होगा जिससे यह इंसानों को खत्म करने या हमसे पीछा छुड़ाने के बारे में सोचे ही नहीं."
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