प्रोफ़ेशनल गोल्फर रिद्धिमा दिलावरी ने सोमवार को मुंबई में एनडीटीवी युवा के मंच पर न सिर्फ गोल्फ से जुड़ी चुनौतियों पर बात की बल्कि उन्होंने बतौर गोल्फर मानसिक चुनौतियों के साथ साथ अपने अगले लक्ष्य के बारे में भी बताया. रिद्धिमा दिलावरी ने काफी कम उम्र में गोल्फ की दुनिया में कदम रखा और अपना एक नाम बनाया. रिद्धिमा ने 2018 में प्रोफेशनल गोल्फर के तौर पर अपने करियर की शुरुआत की थी. उन्होंने महिला प्रो गोल्फ सर्किट में कई खिताब जीते हैं और भारत की प्रमुख महिला गोल्फरों में गिनी जाती हैं.
ओलंपिक है बड़ा लक्ष्य
एनडीटीवी युवा के मंच पर ग्रीन क्वीन सेशन में जब उनसे सवाल हुआ कि उनका अगला लक्ष्य क्या है, इस पर रिद्धिमा ने कहा,"मुझे लगता है कि 2028 में होने वाले ओलंपिक मेरे लिए एक बड़ा लक्ष्य हैं. गोल्फ़ में क्वालिफ़ाई करने के लिए हमारे देश को थोड़ी मेहनत करनी होगी. उम्मीद है कि हम ऐसा कर पाएंगे और यह निश्चित रूप से मेरे दिमाग में चल रही बातों में से एक है."
8 साल की उम्र से शुरू किया था गोल्फ
वहीं जब उनसे पूछा गया कि गोल्फर बनने से पहले रिद्धिमा कौन थी? इस पर उन्होंने कहा,"यह एक मुश्किल सवाल है क्योंकि मैंने गोल्फ़ खेलना तब शुरू किया था जब मैं. मैं लगभग 8 साल की थी और यह इतने लंबे समय से मेरी ज़िंदगी का हिस्सा रहा है कि मेरी पहचान गोल्फर रिद्धिमा से ही जुड़ी हुई है."
उन्होंने आगे कहा,"लेकिन मुझे लगता है कि खेल में एक ज़रूरी बात यह है कि आप अपनी पहचान को अपने खेल से अलग रखने की कोशिश करें. इसलिए मैं दूसरी चीज़ें भी करने की कोशिश करती हूं. मैं गोल्फ़ के अलावा भी अपनी ज़िंदगी जीने की कोशिश करती हूं. मैं ऐसे शौक पालने की कोशिश करती हूँ जो गोल्फ़ से अलग हों. लेकिन हां, यह सच है कि मेरी ज़िंदगी काफ़ी हद तक गोल्फ़ से जुड़ी हुई है."
गोल्फ में एआई के इस्तेमाल पर क्या कहा
वहीं जब उनसे गोल्फ में एआई के इस्तेमाल को लेकर उनसे सवाल हुआ तो उन्होंने कहा,"मुझे नहीं लगता कि एआई अभी इतना आगे बढ़ पाया है कि गोलफ़ स्विंग को देख सके, क्योंकि गोल्फ़ स्विंग बहुत मुश्किल होता है. और हमारे लेवल पर, बहुत छोटी-छोटी चीज़ें मायने रखती हैं. लेकिन गोल्फ़ में भी एआई काफ़ी आ रहा है. और धीरे-धीरे चीज़ें उस दिशा में बढ़ रही हैं. लेकिन मैं कहूंगी कि अभी नहीं. गोल्फ़ के मामले में मैं AI से ज़्यादा खुद पर भरोसा करती हूं."
गोल्फ खेलना कितना चुनौतीपूर्ण
वहीं प्रोफेशनल गोल्फ़र बनना कितना थकाने वाला होता है, इस पर रिद्धिमा ने कहा,"इसमें वैसी भाग-दौड़ या गहमागहमी नहीं होती जैसी दूसरे खेलों या कॉन्टैक्ट स्पोर्ट्स में होती है. लेकिन गोल्फ़ कितना थकाने वाला है? शारीरिक और मानसिक रूप से. मानसिक रूप से तो निश्चित रूप से और शारीरिक रूप से भी, हर खेल की तरह यह भी शरीर पर ज़ोर डालता है. लेकिन गोल्फ़ एक ऐसा खेल है जिसमें मानसिक और शारीरिक दोनों तरह की चुनौतियों का मिश्रण होता है, इसलिए यह बहुत थकाने वाला होता है क्योंकि आपको हर समय 100 प्रतिशत अपना फ़ोकस रहना पड़ता है."
रिद्धिमा ने आगे कहा,"कई बाहरी चीज़ों के बारे में भी सोचना पड़ता है. हर खेल अलग होता है और ज़ाहिर है कि रिएक्शन वाले खेलों की अपनी मुश्किलें होती हैं, लेकिन कभी-कभी जब खेल स्थिर (स्टेशनरी) होता है, तो आपको कई बाहरी चीज़ों पर ध्यान देना पड़ता है और कई अन्य बातें दिमाग में आ सकती हैं. इसलिए मुझे लगता है कि इसका मानसिक पहलू बहुत महत्वपूर्ण है, साथ ही तकनीक भी, जो बहुत जटिल है... और इन सब वजहों से यह काफ़ी थकाने वाला हो जाता है."
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