कुछ साल पहले चर्चा में आने के बाद से ही, स्टीपलचेजर अविनाश साबले ने तेजी से खुद को इस पीढ़ी के भारत के सबसे बेहतरीन लंबी दूरी के धावक के तौर पर स्थापित कर लिया है.साबले ने 2015 के बाद ही दौड़ को एक करियर विकल्प के रूप में अपनाया था. एक साधारण परिवार से आने वाले अविनाश के लिए यहां तक की यात्रा इतनी आसान नहीं थी. माता-पिता किसान थे, स्कूल जाने के लिए उन्हें हर दिन छह किलोमीटर दौड़ना पड़ता, क्योंकि कोई सार्वजनिक परिवहन उपलब्ध नहीं था. तमाम संघर्षों से जूझते हुए अविनाश आज लंबी दौड़ में भारत के प्रमुख धावक हैं और सोमवार को जब एक बार फिर वह एक्शन में होंगे तो उनसे पदक की उम्मीद होगी.
माता-पिता ईंट भट्टे में मजदूर
अविनाश ने बड़े होकर कभी भी खेल की महत्वाकांक्षा नहीं रखी और अपने परिवार का भरण-पोषण करने के लिए सेना में शामिल होने का मन पहले ही बना लिया था. 13 सितंबर 1994 को महाराष्ट्र के बीड जिले के अष्टि तालुका के एक छोटे से गांव मंडवा में जन्में अविनाश साबले के माता-पिता ईंट भट्टे में काम करते थे. तीन भाई-बहनों में सबसे बड़े अविनाश अपने माता-पिता की मुश्किलों को बचपन से समझते थे.
इनाम के 100 रुपये से मजदूरी के 150 तक
अविनाश स्कूल के दिनों से ही रेस में हिस्सा लेते थे, लेकिन उन्हें अधिक सफलता नहीं मिली थी. अपने शिक्षकों के कहने उन्होंने एक इवेंट में 500 मीटर की रेस हिस्सा लिया था और 500 मीटर का इनाम जीता था.लेकिन 10वीं कक्षा में आने के बाद उन्होंने स्पोर्ट्स से दूरी बनाई क्योंकि उन्हें अपने माता-पिता का काम में हाथ बटाना था. बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार, अविनाश ने पढ़ाई के साथ-साथ अपने चाचा के साथ सौ रुपये की दिहाड़ी पर मिस्त्री का काम करने का फैसला किया. अपने बारहवें साल में, अविनाश ने सुबह में अपना कॉलेज जारी रखा तो दोपहर में मजदूरी का काम किया. लेकिन फुल टाइम काम नहीं करने के कारण अविनाश को 150 के बदले सौ रुपये ही मिलते थे.
सियाचिन से सिक्किम तक हुी तैनाती
अविनाश से जब 12वीं की पढ़ाई पूरी की तो उन्होंने भारतीय सेना में भर्ती होने का फैसला लिया और उन्हें इसमें सफलता भी मिली. वह 5 महार रेजिमेंट का हिस्सा बने. उन्हें सियाचिन, राजस्थान और सिक्किम में तैनात किया गया था. अपनी सर्विस के शुरुआती दो सालों में ही, अविनाश सियाचिन की कड़कड़ाती शर्दी का सामना किया और राजस्थान के रेगिस्तानी इलाकों की चिलचिलाती धूप का भी. यह 50 डिग्री तक पहुंच जाता था.
2015 में से दौड़ में अपनाया करियर
अविनाश साबले को स्पोर्ट्स रनिंग के बारे में 2015 में पता चला, जब वे सेना के एथलेटिक्स प्रोग्राम से जुड़े. शुरुआत में उन्हें क्रॉस-कंट्री प्रतियोगिताओं के लिए चुना गया और जल्द ही उनकी प्रतिभा सबके सामने आ गई. इस भारतीय एथलीट ने सिर्फ़ एक साल तक ट्रेनिंग की थी कि वे उस 'सर्विसेज' टीम का हिस्सा बन गए जिसने टीम प्रतियोगिता जीती और व्यक्तिगत नेशनल क्रॉस-कंट्री चैंपियनशिप में पांचवां स्थान हासिल किया.
एक सलाह से बदला पूरा करियर
हालांकि, इसके बाद साबले चोटिल हुए. ट्रेनिंग में शामिल ना होने पर उनका वजन काफी बढ़ गया था. कुछ लोगों ने उन्हें नजारअंदाजा करना शुरू किया. लेकिन साबले इससे टूटे नहीं बल्कि उनके हौसले और मजबूत हुए और इस धावक ने मजबूती से वापसी की. रिकवरी के बाद उन्होंने तेजी से अपना वजन घटाया. लेकिन साबले के करियर में अहम मोड़ 2017 में आया, जह सेना के कोच अमरीश कुमार ने उनको स्टीपलचेज कैटेगरी आजमाने के लिए कहा. अविनाश साबले और भारतीय एथलेटिक्स, दोनों के लिए बहुत फ़ायदेमंद साबित हुआ.
फिर नहीं देखा पीछे मुड़कर
अविनाश साबले ने स्टीपलचेज में तुरंत अपनी छाप छोड़ी. 2017 फेडरेशन कप में वे पांचवें स्थान पर रहे और फिर उसी साल चेन्नई में हुई ओपन नेशनल्स में 3000 मीटर स्टीपलचेज के नेशनल रिकॉर्ड से वे बस नौ सेकंड पीछे रह गए.
साबले ने एक दफे इएसपीएन को बताया था,"स्टीपलचेज एक बहुत ही टैक्टिकल (रणनीति वाली) रेस है. इसलिए ज़्यादातर समय मुझसे कहा जाता था कि भारत में यह रिकॉर्ड तोड़ना मुमकिन नहीं है क्योंकि यहां कोई ऐसा नहीं है जो उस तरह की रफ़्तार (पेस) बना सके. इसलिए मुझे खुद ही अपनी रफ़्तार तय करनी पड़ती थी."
2018 की शुरुआत में ट्रेनिंग के दौरान अविनाश साबले का टखना टूट गया था. उन्होंने जल्दबाजी में दौड़ना शुरू कर दिया, जिसकी वजह से वे उस साल के एशियाई खेलों के लिए क्वालिफाई नहीं कर पाए.
हालांकि, उन्होंने जल्द ही वापसी की और अपना लक्ष्य हासिल किया. भुवनेश्वर में 2018 ओपन नेशनल्स में, अविनाश साबले ने 3000 मीटर स्टीपलचेज़ में 8:29.88 का समय लिया और 30 साल पुराने नेशनल रिकॉर्ड को 0.12 सेकंड से तोड़ दिया. इससे पहले यह रिकॉर्ड गोपाल सैनी ने 1981 में टोक्यो में हुई एशियाई चैंपियनशिप में बनाया था.
इसका नतीजा यह हुआ कि 2019 में पटियाला में हुए फेडरेशन कप में सेबल ने दूसरी बार नेशनल रिकॉर्ड तोड़ा. उन्होंने 8:28.94 का समय लिया, जो उनके पिछले रिकॉर्ड से लगभग एक सेकंड कम था. इसकी वजह से उन्हें दोहा में IAAF वर्ल्ड चैंपियनशिप में दौड़ने का मौका भी मिला. इस तरह, 1991 में दीना राम के बाद वर्ल्ड चैंपियनशिप में दौड़ने वाले वे पहले भारतीय पुरुष स्टीपलचेज़र बन गए.
अविनाश साबले ने इसके बाद कई रिकॉर्ड तोड़े.
भारतीय धावक ने हांगझोऊ 2023 में पुरुषों की 5000 मीटर दौड़ में 13:21.09 का शानदार समय निकालकर सिल्वर मेडल जीता था. अविनाश साबले को गोल्ड मेडल जीतने से रोकने के लिए बहरीन के बिरहानु बालेव को गेम्स रिकॉर्ड बनाने वाला प्रदर्शन करना पड़ा.
अविनाश साबले की उपलब्धियां और पर्सनल बेस्ट
- पुरुषों की 3000m स्टीपलचेज़ में नेशनल रिकॉर्ड - 8:09.91
- पुरुषों की हाफ मैराथन में नेशनल रिकॉर्ड - 1:00:30s
- पुरुषों की 5000m दौड़ में पर्सनल बेस्ट - 13:19.30s
- पुरुषों की 3000m स्टीपलचेज़ में एशियाई खेलों का रिकॉर्ड - 8:19.50
- पुरुषों की 3000m स्टीपलचेज़ में सिल्वर मेडल - दोहा 2019 एशियाई एथलेटिक्स चैंपियनशिप
- पुरुषों की 3000m स्टीपलचेज़ में सिल्वर मेडल - बर्मिंघम 2022 कॉमनवेल्थ गेम्स
- पुरुषों की 3000m स्टीपलचेज़ में गोल्ड मेडल - हांग्जो 2023 एशियाई खेल
- पुरुषों की 5000m दौड़ में सिल्वर मेडल - हांग्जो 2023 एशियाई खेल
- अर्जुन पुरस्कार - खिलाड़ियों के लिए भारत का दूसरा सबसे बड़ा सम्मान - 2022 में
- लगातार सात बार 3000m स्टीपलचेज़ का नेशनल रिकॉर्ड तोड़ा
- 68 वर्षों में 3000m स्टीपलचेज़ में ओलंपिक के लिए क्वालीफाई करने वाले पहले भारतीय
- पुरुषों की 3000m स्टीपलचेज़ में गोल्ड मेडल - गुमी 2025 एशियाई एथलेटिक्स चैंपियनशिप
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं