- राजस्थान में पहली बार लेपर्ड मॉनिटरिंग के लिए लगेगा साइलेंट डिवाइस सिस्टम
- 170 से ज्यादा लेपर्ड पर नजर रखेगा हाई ट्रैक सेंसर, रणथंभौर में नई पहल
- जंगल से गांव की ओर आया लेपर्ड तो तुरंत मिलेगा अलर्ट
राजस्थान के रणथंभौर टाइगर रिजर्व में लगातार बढ़ते मानव-वन्यजीव संघर्ष को रोकने और तेंदुए की मॉनिटरिंग के लिए वन विभाग नई तकनीक अपनाने जा रहा है. प्रदेश में पहली बार रणथंभौर में साइलेंट डिवाइस और हाई ट्रैक सेंसर लगाए जाएंगे, जिनकी मदद से जंगल से निकलकर आबादी की ओर बढ़ने वाले लेपर्ड की गतिविधियों का पता लगाया जा सकेगा. जैसे ही कोई वन्यजीव चिन्हित मार्ग से गांव या बस्ती की ओर बढ़ेगा, सिस्टम स्वतः अलर्ट जारी करेगा. वन विभाग को उम्मीद है कि इससे ग्रामीणों और वन्यजीवों दोनों की सुरक्षा सुनिश्चित हो सकेगी.
लेपर्ड मॉनिटरिंग को लेकर अलर्ट मोड पर वन विभाग
प्रदेश के सबसे बड़े वन्यजीव अभयारण्यों में शामिल रणथंभौर टाइगर रिजर्व में अब बाघों के साथ-साथ लेपर्ड की गतिविधियों पर भी विशेष निगरानी रखी जाएगी. इसके लिए वन विभाग अत्याधुनिक तकनीक का सहारा लेने जा रहा है. रणथंभौर में लेपर्ड की बढ़ती संख्या और उनके आबादी क्षेत्रों की ओर लगातार बढ़ते मूवमेंट को देखते हुए वन प्रशासन ने साइलेंट डिवाइस और हाई ट्रैक सेंसर लगाने की योजना तैयार की है. बताया जा रहा है कि राजस्थान के किसी भी टाइगर रिजर्व में इस तरह की तकनीक का यह पहला प्रयोग होगा.

इस डिवाइस से होगी मॉनिटरिंग
केरल मॉडल पर शुरू होगा प्रयोग
NDTV को रणथंभौर टाइगर रिजर्व के डीएफओ मानस सिंह ने बताया कि केरल में हाथियों की मॉनिटरिंग के लिए इस तकनीक का सफल उपयोग किया जा रहा है. उसी अनुभव के आधार पर रणथंभौर में लेपर्ड की निगरानी के लिए इसे लागू किया जाएगा. उन्होंने कहा कि यदि लेपर्ड आबादी क्षेत्र की ओर बढ़ता है तो सेंसर के जरिए तत्काल अलर्ट जारी होगा, जिससे ग्रामीणों को सुरक्षित किया जा सकेगा और वन विभाग समय पर कार्रवाई कर सकेगा.
अधिकारियों के अनुसार वहां सकारात्मक परिणाम मिलने के बाद अब रणथंभौर में इसी व्यवस्था को लेपर्ड की मॉनिटरिंग के लिए अपनाया जा रहा है. यदि यह प्रयोग सफल रहता है तो भविष्य में इसे अन्य क्षेत्रों में भी लागू किया जा सकता है.
कैसे काम करेगा साइलेंट डिवाइस और हाई ट्रैक सेंसर?
डीएफओ के अनुसार जंगल से निकलकर आबादी वाले क्षेत्रों की ओर जाने वाले मार्गों पर हाई ट्रैक सेंसर लगाए जाएंगे. जैसे ही कोई लेपर्ड या अन्य वन्यजीव इन मार्गों से गुजरेंगे, सेंसर उसकी गतिविधि को रिकॉर्ड करेगा. इसके बाद ऑटोमैटिक अलार्म सिस्टम सक्रिय हो जाएगा. अलार्म की आवाज इतनी तेज होगी कि सैकड़ों मीटर दूर तक सुनी जा सकेगी. इससे आसपास के ग्रामीणों को समय रहते सतर्क होने का मौका मिलेगा. वन विभाग का मानना है कि अलार्म की आवाज सुनकर लेपर्ड भी वापस जंगल की ओर लौट सकता है.

तेंदुए की चहलकदमी
रणथंभौर में 170 से अधिक लेपर्ड
रणथंभौर टाइगर रिजर्व में वर्तमान में 170 से अधिक लेपर्ड होने का अनुमान है. भोजन और क्षेत्रीय विस्तार की तलाश में अक्सर ये वन्यजीव जंगल की सीमाओं से निकलकर गांवों और बस्तियों तक पहुंच जाते हैं. पिछले कुछ वर्षों में लेपर्ड और लोगों के आमने-सामने आने की घटनाओं में बढ़ोतरी दर्ज की गई है. कई बार ऐसे हालात भय और संघर्ष की स्थिति पैदा कर देते हैं. वन विभाग का मानना है कि नई तकनीक ऐसे मामलों को कम करने में मददगार साबित हो सकती है.
इन क्षेत्रों को किया गया चिन्हित
रणथंभौर टाइगर रिजर्व के डीएफओ मानस सिंह के अनुसार शुरुआती चरण में उन इलाकों को प्राथमिकता दी गई है जहां लेपर्ड की आवाजाही अधिक रहती है. इनमें सवाई माधोपुर के पुराने शहर के आसपास के क्षेत्र, फलोदी रेंज का दूमोंदा, हिंदवाड़ और टोडरा क्षेत्र शामिल हैं. वन विभाग ने जंगल और आबादी के बीच मौजूद प्रमुख पगडंडियों तथा कच्चे रास्तों की पहचान भी कर ली है. इन्हीं स्थानों पर सेंसर और डिवाइस लगाए जाएंगे.
ग्रामीणों की सुरक्षा रहेगा मुख्य उद्देश्य
डीएफओ मानस सिंह ने बताया कि इस योजना का मुख्य उद्देश्य किसी भी वन्यजीव के आबादी क्षेत्र में प्रवेश करने से पहले ग्रामीणों तक सूचना पहुंचाना है. उन्होंने कहा कि कई बार रात के समय लेपर्ड गांवों के नजदीक पहुंच जाते हैं और लोगों को इसकी जानकारी नहीं मिल पाती. ऐसे में समय रहते अलर्ट मिलने से लोग सुरक्षित स्थानों पर जा सकेंगे और किसी भी अप्रिय घटना की संभावना कम होगी.
सफल रहा तो पूरे पैराफेरी क्षेत्र में होगा विस्तार
वन विभाग ने स्पष्ट किया है कि यह योजना फिलहाल पायलट प्रोजेक्ट के रूप में शुरू की जा रही है. इसके परिणामों का मूल्यांकन किया जाएगा. यदि रणथंभौर में साइलेंट डिवाइस और हाई ट्रैक सेंसर प्रभावी साबित होते हैं तो इन्हें भविष्य में टाइगर रिजर्व के सभी पैराफेरी क्षेत्रों और आबादी से सटे इलाकों में भी लगाया जाएगा. अधिकारियों का मानना है कि तकनीक आधारित निगरानी से वन्यजीव संरक्षण को मजबूती मिलेगी और मानव-वन्यजीव संघर्ष में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकेगी.
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