राजस्थान में नगर निगम चुनाव 2026 में अजमेर दक्षिण की तुलना में अजमेर उत्तर विधानसभा क्षेत्र का सियासी मुकाबला इस बार कहीं ज्यादा दिलचस्प नजर आ रहा है. अजमेर उत्तर से विधायक व विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी के सामने उनके ही राजनीतिक परिवार से जुड़े रहे नेताओं की ओर से अलग-अलग मोर्चों पर चुनौती खड़ी होती दिखाई दे रही है. नगर निगम चुनाव से पहले दो बार के पूर्व महापौर धर्मेंद्र गहलोत ने भाजपा की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा देकर सियासी हलचल तेज कर दी.
धर्मेंद्र गहलोत को कांग्रेस का समर्थन
गहलोत ने वीडियो जारी कर विधायक वासुदेव देवनानी पर विरोधियों को कमजोर करने और दबाव की राजनीति करने के आरोप लगाए. उन्होंने कहा कि चुनाव के समय पुराने दो मामलों में नोटिस भेजकर दबाव बनाया जा रहा है, लेकिन वे झुकने वाले नहीं हैं. गहलोत के भाजपा छोड़ने के बाद कांग्रेस ने भी उन्हें समर्थन देने के संकेत दिए हैं.
सबसे बड़ा राजनीतिक मुकाबला अजमेर उत्तर के वार्ड नंबर 4 में देखने को मिल सकता है, जहां विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी का निवास क्षेत्र आता है. पूर्व महापौर धर्मेंद्र गहलोत ने अपनी पत्नी हेमा गहलोत को इसी वार्ड से निर्दलीय चुनाव मैदान में उतारने का ऐलान किया है. दूसरी ओर पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा से बगावत कर निर्दलीय मैदान में उतर चुके ज्ञान सारस्वत ने भी अजमेर उत्तर के वार्ड 1, 2 और 3 में अपने तथा परिवार के सदस्यों को चुनाव लड़ाने की तैयारी का ऐलान किया है.
हेमा ने BJP के बागी ज्ञान सारस्वत को बांधी राखी
रक्षाबंधन के मौके पर हेमा गहलोत और भाजपा से बागी ज्ञान सारस्वत के बीच राखी का पर्व मनाया जाना भी चुनावी माहौल में चर्चा का विषय बन गया है. हेमा गहलोत ने ज्ञान सारस्वत को राखी बांधी और दोनों ने एक-दूसरे की जीत का दावा करते हुए राजनीतिक एकजुटता का संदेश दिया. अब सवाल यह है कि क्या पूर्व भाजपा पदाधिकारियों और नेताओं की यह अलग-अलग चुनावी चुनौती भाजपा के लिए मुश्किलें बढ़ाएगी?

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खासकर वार्ड नंबर 4 में मुकाबला केवल पार्षद की सीट तक सीमित नहीं रहने वाला, बल्कि इसे विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी की प्रतिष्ठा से जोड़कर देखा जा रहा है. वहीं दूसरी ओर अजमेर उत्तर से विधायक और राजस्थान विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी की शांति और मौन अपने आप में उनकी राजनीतिक मजबूती दर्शाता है.
चुनावी माहौल में विरोधियों की ओर से लगातार उठाए जा रहे सवालों और बागियों की चुनौती के बावजूद देवनानी की ओर से अब तक खुलकर कोई बड़ा राजनीतिक पलटवार सामने नहीं आया है. सियासी गलियारों में यही चर्चा है कि “एक मौन 100 को हराता है”, ऐसे में देवनानी की यह खामोशी क्या चुनावी रणनीति है या फिर उनके आत्मविश्वास का संकेत-यह आने वाला नगर निगम चुनाव तय करेगा.
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