राजस्थान में एक आईपीएस अधिकारी पर अपने साले के नाबालिग बेटे को कथित तौर पर अपने पास रखने का आरोप लगा है. बच्चे के माता-पिता ने उसे वापस दिलाने के लिए हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की, लेकिन अदालत ने राहत देने से इनकार कर दिया. याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि दंपत्ति बच्चे को लौटाने से इनकार कर रहे हैं. जबकि ना तो उन्होंने बच्चे को विधिक रूप से गोद दिया है और ना ही माता-पिता ने ऐसा कोई औपचारिक सहमति पत्र दिया है. कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि गोद लेने को लेकर विवाद का निपटारा सिविल अदालत में ही संभव है. इसका निपटारा बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका के तहत नहीं किया जाना चाहिए.
डॉक्टर की सलाह पर बहन को सौंपा था बच्चा
आईपीएस अधिकारी और उनकी पत्नी ने अदालत को बताया कि उन्होंने 8 मई 2025 को आगरा में गोद लेने की रस्म पूरी की थी और बच्चे के माता-पिता ने फोन पर सहमति दी थी. उनका कहना है कि तब से बच्चा उनके साथ रह रहा है और वे उसे बेहतर शिक्षा व देखभाल दे रहे हैं. जबकि बच्चे के पिता का कहना है कि उनकी बहन (आईपीएस अधिकारी की पत्नी) का आईवीएफ इलाज चल रहा था. डॉक्टर की सलाह पर उन्होंने अपने बेटे को कुछ समय के लिए उनके पास भेजा था.
अदालत ने अवैध हिरासत मानने से किया इनकार
जस्टिस इंद्रजीत सिंह और जस्टिस भुवन गोयल की खंडपीठ ने कहा कि बच्चे को अवैध हिरासत में नहीं माना जा सकता. अदालत ने स्पष्ट किया कि बच्चे की कस्टडी से जुड़ा विवाद बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका के दायरे में नहीं आता. इसके लिए पक्षकारों को सक्षम सिविल अदालत में याचिका दायर करनी होगी.
बुआ-फुफा के पास ही रहे बच्चा- कोर्ट
अदालत ने अपने आदेश में कहा, "बच्चे को जैविक माता-पिता ने स्वेच्छा से बुआ-फूफा के पास छोड़ा था, इसलिए इसे अवैध हिरासत नहीं कहा जा सकता. बच्चा लंबे समय से उनके साथ रह रहा है और वर्तमान वातावरण में अभ्यस्त हो चुका है. फिलहाल उसके हित में यही है कि वह वहीं रहे."
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