विज्ञापन

2011 में 18 महिलाओं की मौत, अब एक साथ 8 प्रसूताओं की बिगड़ी तबीयत; जोधपुर के अस्पताल की घटना का सच क्या है? Part-2

राजस्थान के सरकारी अस्पताल में डिलीवरी के बाद प्रसूताओं की मौत और महिलाओं में होने वाली गंभीर दिक्कतों को लेकर NDTV की पड़ताल की सीरीज का यह पार्ट जोधपुर के अस्पताल में हुई घटना पर केंद्रित है. यहां जोधपुर पार्ट-2 पढ़िए...

2011 में 18 महिलाओं की मौत, अब एक साथ 8 प्रसूताओं की बिगड़ी तबीयत; जोधपुर के अस्पताल की घटना का सच क्या है? Part-2
जोधपुर के अस्पताल में एक साथ 8 प्रसूताओं की तबीयत बिगड़ने की घटना पर NDTV की पड़ताल

जब 2011 में जोधपुर के एक सरकारी अस्पताल में खराब IV फ्लूइड से 18 महिलाओं की मौत हुई थी तो उस घटना ने सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की असलियत को सामने लाकर रख दिया था. 18 महिलाओं की जान जाने के बाद वादा किया गया कि ऐसी स्थिति फिर कभी नहीं आएगी. जून में हुई कुछ इसी तरह की घटना ने राजस्थान की सबसे बुरी मेडिकल घटनाओं में से एक की ही यादें फिर से ताजा कर दीं. 15 साल बाद फिर से वही सवाल खड़े होने लगे हैं कि क्या अतीत की घटनाओं से कभी सबक लिया गया? प्रसूताओं की मौत के मामले की जांच के बीच फिर से यह सवाल काफी अहम हो गए हैं. राजस्थान के सरकारी अस्पतालों में प्रसव के बाद होने वाली मौतों और गंभीर समस्या की पड़ताल के लिए NDTV ने राज्य के कई जिलों का दौरा किया. 3 भागों की सीरीज के पार्ट-1 में कोटा के न्यू मेडिकल कॉलेज अस्पताल में प्रसव के बाद महिलाओं की मौत की पड़ताल की.

वहीं, सरकारी अस्पतालों में प्रसूताओं की मौतों और डिलीवरी के बाद होने वाली गंभीर दिक्कतों की NDTV की जांच का पार्ट 2 जोधपुर पर फोकस है, जबकि इस सीरीज का तीसरा पार्ट बीकानेर के अस्पताल पर केंद्रित रहेगा.

डिलीवरी के बाद बिगड़ी थी तबीयत

NDTV ने अस्पतालों का दौरा किया, प्रभावित परिवारों से मुलाकात की और बचे हुए लोगों, डॉक्टरों, अधिकारियों और जांचकर्ताओं से बात की. दरअसल, पिछले महीने (जून) जोधपुर के पावटा अस्पताल में सिजेरियन डिलीवरी के बाद 8 महिलाओं की तबीयत अचानक बिगड़ गई. इन महिलाओं में एक ही समय में एक जैसे लक्षण- कंपकंपी, घबराहट, बहुत ज़्यादा ब्लीडिंग, लो ब्लड प्रेशर और किडनी की दिक्कतें सामने आए. 

एक साथ महिलाओं की तबीयत बिगड़ने पर शक हुआ कि आखिर इन सभी को हुआ क्या था, जिससे इन महिलाओं की तबीयत बिगड़ी और लक्षण भी एक जैसे रहे.
Latest and Breaking News on NDTV

इस मामले से जुड़े डॉक्टरों और सूत्रों ने माना कि ये आठ महिलाएं एक ही क्लस्टर में आती हैं. सूत्रों ने बताया कि सर्जरी के बाद गंभीर रूप से बीमार पड़ी इन महिलाओं में से हर एक को IV ड्रिप का एक नया बैच दिया गया था. उन्होंने बताया कि दी गई दूसरी कोई भी दवा नए बैच की नहीं थी. सूत्रों ने NDTV को बताया कि लोकल कल्चर रिपोर्ट, लिनन, कॉटन मटीरियल, ऑपरेशन थिएटर की हालत और मेडिकल इक्विपमेंट के टेस्ट की रिपोर्ट आ गई है और सब तय मानकों के अनुरूप हैं. IV फ्लूइड और दवाओं पर ज़रूरी रिपोर्ट का अभी भी इंतज़ार है और जिसके आने में छह हफ़्ते तक लग सकते हैं. 

केंद्र ने राजस्थान सरकार से मांगी डिटेल्ड रिपोर्ट

दिल्ली AIIMS और जोधपुर AIIMS के विशेषज्ञों की उच्च स्तरीय कमेटियां इन घटनाओं की जांच कर रही हैं. केंद्र सरकार ने राजस्थान सरकार से भी एक डिटेल्ड रिपोर्ट मांगी है. NDTV से बातचीत में पावटा हॉस्पिटल के एडिशनल सुपरिटेंडेंट कुलबीर सिंह चोपड़ा ने कहा, "यह सब 20 जून को शुरू हुआ. आठ C-सेक्शन हुए, दोपहर में आठ मरीज़ों को ठंड लगने लगी, तो हमने प्रिंसिपल सर को बताया और वह एक टीम के साथ आए. दो नई प्रसूताओं को MDM हॉस्पिटल के ICU में रेफर किया गया और बाकी छह को ज़्यादा स्ट्रॉन्ग एंटीबायोटिक्स दी गईं. उन सभी पर नज़र रखी जा रही थी. दो मरीज़ों को इसलिए रेफर किया गया, क्योंकि उन्हें कोमोरबिडिटीज़ थीं."

पावटा अस्पताल में भर्ती सभी छह महिलाओं को डिस्चार्ज कर दिया गया है. कोमोरबिडिटीज़ वाली दो महिलाओं में से जिन्हें एडवांस ट्रीटमेंट के लिए AIIMS जोधपुर रेफर किया गया था, उनमें से एक को डिस्चार्ज कर दिया गया है और दूसरी को ICU से जनरल वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया है. सूत्रों के मुताबिक, जिस तरह से एक के बाद एक महिलाएं बीमार पड़ीं, उससे जांच करने वालों को शक है कि उनके शरीर में पहले से मौजूद कोई टॉक्सिन गया होगा. हालांकि, अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि जब तक पेंडिंग रिपोर्ट नहीं मिल जातीं, यह एक वर्किंग हाइपोथीसिस है.

पाओटा हॉस्पिटल के एनेस्थिसियोलॉजिस्ट डॉ. वीएस राठौर ने कहा, "यहां बहुत सी चीजें जैसे दवाएं, IV फ्लूइड और सभी इंजेक्शन जब्त कर लिए गए हैं, इन सबको लेकर संशय है. उस दिन इस्तेमाल किया गया IV फ्लूइड (रिंगर्स लैक्टेट) का बैच नया था और दूसरी दवाएं रूटीन थीं." वहीं, इस मामले पर राजस्थान के चिकित्सा मंत्री गजेंद्र सिंह खींवसर ने NDTV को बताया कि रिंगर्स लैक्टेट के सैंपल आने पर उनकी जांच की गई थी और जब उनमें कुछ गड़बड़ियां पाई गईं तो इलाज से पहले उन्हें वापस ले लिया गया. हालांकि, डॉक्टरों ने कहा कि यह सिर्फ एक बैच के लिए था.

डॉ. एसएन मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ. बीएस जोधा के अनुसार, कुछ मरीजों में तेजी से हालत बिगड़ने की वजह एक प्रीफॉर्म्ड एंडोटॉक्सिन (एक तरह का बैक्टीरियल टॉक्सिन) हो सकता है, हालांकि अभी कोई नतीजा निकालना जल्दबाजी होगी. उन्होंने कहा कि अभी तक, मरीजों के सैंपल की रिपोर्ट में कोई बैक्टीरियल ग्रोथ नहीं दिखी है. ऐसे में हमें लग रहा है कि यह किसी तरह का प्रीफॉर्म्ड एंडोटॉक्सिन हो सकता है, लेकिन एक साथ होने वाली घटनाओं के सही कारण का अंदाजा लगाना थोड़ा जल्दबाजी होगी."

डॉ. जोधा ने ज़ोर देकर कहा कि इन्वेस्टिगेटर हर मुमकिन सोर्स की जांच कर रहे हैं, जिसमें इंट्रावीनस फ्लूइड, सर्जिकल इक्विपमेंट और इलाज के दौरान इस्तेमाल होने वाले दूसरे मटीरियल शामिल हैं. उन्होंने आगे कहा कि प्रेग्नेंसी खुद ही मरीज़ की इम्यूनिटी बदल देती है और कोमोरबिडिटी के साथ-साथ एनीमिया जैसी कंडीशन वाले मरीज़ों को गंभीर कॉम्प्लीकेशंस का ज़्यादा रिस्क होता है. 

दवाओं के भंडारण को लेकर सवाल

2011 में महिलाओं की मौत के गवाह डॉ. जोधा ने कहा, "हमें हमेशा पहले से मौजूद बीमारियों के बारे में पता नहीं चल पाता. हम बेसिक टेस्ट करते हैं. यह एक चुनौती है, सर्जरी के दौरान कई वजहों से खून बह सकता है और उसके बाद इन्फेक्शन हो सकता है. कभी-कभी मरीज़ की हालत तेज़ी से बिगड़ती है और हम SOPs का पालन करने की पूरी कोशिश करते हैं, लेकिन आखिरकार यह एक टीम का काम है. हमें मैन्युफ़ैक्चरर्स, स्टोरेज और ट्रांसपोर्ट सिस्टम पर भरोसा है और हमें टेस्ट रिपोर्ट पर भी यकीन करना पड़ता है. हम इन सभी पर निर्भर हैं और कोल्ड चेन और ट्रांसपोर्टेशन के लिए उन पर भरोसा करते हैं, लेकिन जब हमें ऐसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, तो हमें एहसास होता है कि हमें और भी सावधान रहने की ज़रूरत है."

जोधपुर AIIMS में ICU के बाहर अपने 5 साल के बेटे के साथ टहलते हुए सुमेर

जोधपुर AIIMS में ICU के बाहर अपने 5 साल के बेटे के साथ टहलते हुए सुमेर

AIIMS जोधपुर में ICU के बाहर मरीज़ों में से एक सोनू के पति सुमेर ने कहा, "उसे इन्फेक्शन हो गया था. पेशाब नहीं आ रहा था. डॉक्टरों ने हमें बताया कि उसके किडनी और लिवर में समस्या थी. हमने सुना है कि ऐसा कुछ दवाओं की वजह से हो सकता है." वहीं, उनके बगल में उनका पांच साल का बच्चा उनका हाथ खींच रहा था. वह इतना छोटा था कि समझ नहीं पा रहा था कि परिवार कई दिनों से घर से दूर क्यों है और क्यों एक इंटेंसिव केयर यूनिट (ICU) के बाहर जवाबों का इंतज़ार कर रहा है.

रावत राम की पत्नी ललिता को AIIMS जोधपुर रेफर किया गया था और अब उन्हें छुट्टी दे दी गई है. वह कहते हैं, "हमने उम्मीद छोड़ दी थी, लेकिन इलाज अच्छा रहा, हम अभी भी बहुत तनाव में हैं." पाओटा अस्पताल से छुट्टी पाने वाली तस्लीम की सास हबीदा बानू ने उस दिन को याद करते हुए कहा, "डिलीवरी के दो घंटे बाद वह बीमार पड़ गई और उसे ब्लीडिंग होने लगी. उसे सांस लेने में तकलीफ़ हो रही थी. उन्हें खून चढ़ाना पड़ा."

अस्पताल के फ़र्श पर बैठे हुए ललिता के पति रावत राम

अस्पताल के फ़र्श पर बैठे हुए ललिता के पति रावत राम
Photo Credit: NDTV

स्वास्थ्य मंत्री गजेंद्र सिंह खींवसर ने कहा कि कोटा, जोधपुर और बीकानेर की घटनाएँ एक-दूसरे से जुड़ी हुई नहीं हैं. मंत्री ने कहा, "मैं आपको यकीन दिला सकता हूं कि हमारे सरकारी अस्पताल हर दिन बहुत बड़ी संख्या में मरीज़ों का इलाज करते हैं. हमारे डॉक्टरों के पास जो अनुभव है, वो कई प्राइवेट अस्पतालों के पास नहीं है."

स्वास्थ्य मंत्री ने भीषण गर्मी और मरीज़ों की पहले से मौजूद बीमारियां और हाई-रिस्क रेफरल जैसे कारणों का ज़िक्र किया. इन सभी दवाओं और इंजेक्शन को बनने के बाद एक खास तापमान पर रखना ज़रूरी होता है. फैक्ट्री से ये वेयरहाउस में जाती हैं. वेयरहाउस से इन्हें डिस्ट्रीब्यूटर के पास भेजा जाता है. डिस्ट्रीब्यूटर से अस्पताल पहुँचने से पहले इन्हें फिर से ट्रांसपोर्ट किया जाता है. इसके बाद अस्पताल इन्हें अपने स्टोर में भेजता है और आखिर में ये ऑपरेशन थिएटर तक पहुंचती हैं. जब तापमान ज़्यादा होता है तो ट्रांसपोर्ट और स्टोरेज के इन सभी चरणों में किसी खास इंजेक्शन की असरदार क्षमता कम हो सकती है.

अधिकारियों ने बताया कि ड्रग कंट्रोलर स्टोर और अस्पतालों में रैंडम जांच करते हैं और तब भी जांच करते हैं, जब डॉक्टर किसी समस्या की ओर इशारा करते हैं. अधिकारी ने कहा, "लैब टेस्ट किए जाते हैं और अगर टेस्ट रिपोर्ट ठीक होती हैं, तो दवाएं जारी कर दी जाती हैं. अगर वे टेस्ट में फेल हो जाती हैं, तो उन्हें फेंक दिया जाता है. मैन्युफैक्चरर डिस्ट्रीब्यूटर को दवाएं सप्लाई करता है. कभी-कभी, मैन्युफैक्चरर टेस्ट रिपोर्ट में हेरफेर करके दवाएं जारी कर सकते हैं. कभी-कभी उनके पास एक बैच के लिए तो सही रिपोर्ट होती है, लेकिन दूसरे के लिए नहीं."

अधिकारी ने आगे समझाया कि हर महीने, अधिकारी जांच के लिए अलग-अलग दवाओं के सैंपल इकट्ठा करते हैं. ज़िले में दवाओं के लगभग एक लाख बैच आ सकते हैं और कोई गड़बड़ी मिलने पर कार्रवाई की जाती है. आखिरकार, यह पक्का करने की ज़िम्मेदारी मैन्युफैक्चरर की होती है कि वे कोई धोखाधड़ी न करें. कोल्ड चेन बनाए रखने जैसी ज़रूरी बातें भी होती हैं, इसमें किसी भी तरह की रुकावट से दवाएं खराब हो सकती हैं." 

(हर्षा कुमारी सिंह के इनपुट के साथ)

यह भी पढ़ें- 'रोता हुआ बच्चा, दीवार पर मृत मां की तस्वीर', कोटा के न्यू मेडिकल कॉलेज में प्रसूताओं की मौत का सच क्या है? Part-1

पूरी स्टोरी पढ़ें

NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं

फॉलो करे:
Rajasthan News, Jodhpur News, Jodhpur Hospital News, Jodhpur Hospitals Reality Check, Kota Hospital C Section News Today
Listen to the latest songs, only on JioSaavn.com