Who is Bhumeshwari Devi: खेल की दुनिया में कई ऐसी कहानियां हैं, जो सिर्फ मेडल नहीं बल्कि जिंदगी के सफर में जो भी संघर्ष हुआ उसे बयां करती हैं. मणिपुर की धाविका 'हुइड्रोम भूमेश्वरी देवी' की कहानी भी ऐसी ही है. एक वक्त था जब वह दौड़ इसलिए नहीं लगाती थीं कि रिकॉर्ड बनाएं, बल्कि इसलिए कि घर की आर्थिक मदद हो सके. आज वही खिलाड़ी अपने दम पर भारतीय एथलेटिक्स में पहचान बना चुकी हैं और उनका सबसे बड़ा सपना ओलंपिक में देश का प्रतिनिधित्व करना है.
इंफाल वेस्ट जिले के *हुइड्रोम अवांग लीकाई* गांव में पली-बढ़ीं भूमेश्वरी की जिंदगी तब बदल गई, जब 2012 में उनके पिता का निधन हो गया. परिवार की जिम्मेदारी उनकी मां पर आ गई और आर्थिक हालात बेहद मुश्किल हो गए. ऐसे में भूमेश्वरी ने खेल को सिर्फ अपने जुनून तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे परिवार का सहारा बना लिया.
सातवीं कक्षा में पढ़ाई के दौरान उन्होंने पहली बार 19 किलोमीटर की इंटर-स्कूल दौड़ में हिस्सा लिया. इस प्रतियोगिता में दूसरे स्थान के साथ उन्हें 5 हजार रुपये की इनामी राशि मिली. यह रकम उनके परिवार के लिए किसी बड़ी राहत से कम नहीं थी. इसके बाद उन्होंने लगातार प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेना शुरू किया. संसाधनों की कमी ऐसी थी कि कई बार उन्हें बिना जूतों के ही दौड़ना पड़ा. उन्होंने 21 किलोमीटर की हाफ मैराथन भी नंगे पैर पूरी की. कठिन परिस्थितियों ने उनके कदम जरूर रोके, लेकिन उनके इरादे नहीं डगमगाए.
लगातार मेहनत का नतीजा तब मिला, जब भूमेश्वरी ने पहली *एशियन अंडर-23 एथलेटिक्स चैंपियनशिप* की 800 मीटर स्पर्धा में कांस्य पदक जीतकर भारत का नाम रोशन किया. इस प्रदर्शन के बाद उन्हें देश की उभरती हुई धाविकाओं में गिना जाने लगा.
उनका संघर्ष यहीं खत्म नहीं हुआ. मणिपुर में हिंसा के दौरान उन्हें अपना घर भी छोड़ना पड़ा, लेकिन उन्होंने मुश्किल हालात को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया. ट्रैक पर लौटकर उन्होंने फिर साबित किया कि मेहनत और हौसले के आगे हालात ज्यादा देर तक टिक नहीं सकते.
आज भूमेश्वरी देवी का लक्ष्य साफ है भारत के लिए बड़े अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पदक जीतना और एक दिन ओलंपिक में तिरंगा लहराना. उनकी कहानी बताती है कि सपनों की मंजिल तक पहुंचने के लिए सबसे जरूरी चीज सुविधाएं नहीं, बल्कि हिम्मत और लगातार मेहनत है.
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं