विज्ञापन

NDTV Exclusive: 'देश ने उम्मीद नहीं छोड़ी,' ध्यानचंद को भारत रत्न नहीं मिलने पर छलका पूर्व कप्तान का दर्द

ध्यानचंद के बेटे अशोक कुमार ने NDTV से EXCLUSIVE बात करते हुए कहा कि, 'देशभर में ध्यानचंद की 26 मूर्तियां लगाई गई हैं. उनके नाम पर हॉकी इंडिया का मेजर ध्यानचंद लाइफटाइम अवार्ड भी है. पर मुझे हैरानी है कि उन्हें अब तक ‘भारत रत्न’ का सम्मान क्यों नहीं मिल पाया है.'

NDTV Exclusive: 'देश ने उम्मीद नहीं छोड़ी,' ध्यानचंद को भारत रत्न नहीं मिलने पर छलका पूर्व कप्तान का दर्द
Major Dhyanchand
NDTV

हर साल की तरह इस बार भी राष्ट्रीय खेल दिवस मनाते वक्त मेजर ध्यानचंद की जयंती पर भारतीय हॉकी के गोल्डन दिनों को याद किया जा रहा है. ध्यानचंद के बेटे और पूर्व भारतीय कप्तान अशोक कुमार को त्रिपुरा सरकार ने उनके मूर्ति के अनावरण के लिए ख़ास तौर पर बुलाया है. अशोक कुमार ज़ाहिर तौर पर बेहद और बच्चों की तरह उत्साहित भी दिख रहे हैं.

NDTV से EXCLUSIVE बात करते हुए पूर्व भारतीय कप्तान अशोक कुमार कहते हैं, “मैं इस वक्त भारत और बांग्लादेश के बॉर्डर पर हूं. मुझे अगरतला के बादरघाट स्टेडियम में ‘दद्दा'- मेजर ध्यानचंद की मूर्ति के अनावरण के लिए बुलाया गया है. थोड़ी देर में वहां पहुंच जाऊंगा.”

‘भारत रत्न की उम्मीद नहीं छोड़ी है'

NDTV से EXCLUSIVE बात करते हुए 1975 वर्ल्ड कप के फ़ाइनल में पाकिस्तान के खिलाफ विनिंग गोल करने वाले अशोक कुमार कहते हैं, “ये गर्व की बात है कि मेजर ध्यानचंद की जयंती पर राष्ट्रीय खेल दिवस 29 अगस्त को हर साल मनाया जाता है. दिल्ली के नेशनल स्टेडियम का नाम भी उनके नाम पर रख दिया गया है. देशभर में ध्यानचंद की 26 मूर्तियां लगाई गई हैं. उनके नाम पर हॉकी इंडिया का मेजर ध्यानचंद लाइफटाइम अवार्ड भी है जिसमें 30 लाख रुपये की इनामी रकम दी जाती है. देश में उनके नाम पर अनगिनत स्टेडियम भी हैं. पर मुझे हैरानी है कि उन्हें अब तक ‘भारत रत्न' का सम्मान क्यों नहीं मिल पाया है. पर मैंने तो उम्मीद नहीं छोड़ी है.”

Latest and Breaking News on NDTV

Ashok Dhyan Chand, Photo Credit: NDTV


आख़िर तक हॉकी के लिए जिये: आजादी से पहले और आजादी के बाद

पूर्व कप्तान अशोक कुमार NDTV संवाददाता विमल मोहन को बताते हैं, “ऐसा नहीं है कि ध्यानचंद साहब का योगदान भारतीय हॉकी के लिए सिर्फ आज़ादी के पहले ही रहा है. ध्यानचंद के साथ भारतीय टीम ने 1928, 1932 और 1936 के ओलिंपिक्स में गोल्ड मेडल तो जीते ही. वर्ल्ड वॉर के दौरान 1940 और 1944 में ओलिंपिक्स नहीं हो पाए वरना भारत और ध्यानचंद के नाम तब (आजादी से पहले) 5 गोल्ड मेडल होते.”

आजादी के बाद 1948 के लंदन ओलिंपिक्स में भी उन्हें टीम में जगह मिल सकती थी. लेकिन उन्होंने युवाओं को मौक़ा देना बेहतर समझा. कप्तान किशन लाल और उपकप्तान केडी सिंह, बलबीर सिंह सीनियर और लेज़्ली क्लॉडियस की टीम ने ध्यानचंद की परंपरा को मज़बूती से आगे बढ़ाया और वहां भी गोल्ड मेडल जीता.

आजादी के बाद भी संवारते रहे देश की हॉकी

ध्यानंद के लिए हॉकी इश्क और जुनून से बढ़कर रहा. अपने करियर के आखिरी दो साल में उन्होंने ओडिशा के बाराबती स्टेडियम में हॉकी खिलाड़ियों को जमकर संवारा. यही नहीं 1948-49 में ईस्ट अफ्रीका के दौरे पर अफ़्रीकी देशों ने टीम इंडिया के साथ मेजर ध्यानचंद के आने की शर्त रख दी. अशोक कुमार बताते हैं कि उस आखिरी विदेश दौरे पर भी 43-44 साल की उम्र में ध्यानचंद ने 55 से 60 गोल किये.

जब डॉन ब्रैडमैन से मिले ध्यानचंद

गोल मशीन, मैजिशियन और द विज़ार्ड के नाम से मशहूर मेजर ध्यानचंद के नाम घरेलू हॉकी में 1000 से ज़्यादा और 185 अंतरराष्ट्रीय हॉकी मैचों में 570 गोल किये. 1926 से 1949 यानी क़रीब 44 सील की उम्र तक ध्यानचंद हॉकी खेलते रहे. ये मशहूर किस्सा है कि जब ध्यानचंद 1935 में एडिलेड में (1936 के बर्लिन ओलिंपिक से पहले) सर डॉन ब्रैडमैन से मिले तो वो उनसे प्रभावित हुए बिन नहीं रह सके. ब्रैडमैन ने कहा, “वो हॉकी में ऐसे गोल करते हैं जैसे हम क्रिकेट में रन बनाते हैं.”

29 अगस्त को मेजर ध्यानचंद का जयंती मनाते वक्त हॉकी प्रेमियों की उम्मीद कायम रहती है कि एक दिन ध्यानचंद को भी सचिन तेंदुलकर की तरह एक दिन ‘भारत रत्न' ज़रूर मिलेगा.

ये भी पढ़ें-  ‘तूफानी बल्लेबाज ही नहीं, विकेट टेकर भी हूं'; वैभव सूर्यवंशी के बयान ने अब बल्लेबाजों को दी 'टेंशन'

पूरी स्टोरी पढ़ें

NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं

फॉलो करे:
Other Sports
Listen to the latest songs, only on JioSaavn.com