- संजय राउत ने दावा किया है कि उनका गठबंधन बहुमत के आंकड़े से केवल 6 सीट दूर है
- कयास है कि AIMIM के समर्थन से शिवसेना बीजेपी को सत्ता से बाहर रखने की रणनीति बना रही है
- बीजेपी और शिंदे गुट में मेयर पद को लेकर विवाद चल रहा है
देश की सबसे अमीर महानगरपालिका, BMC के सिंहासन पर कब्जा करने के लिए खेल अब बेहद तीखा और पेचीदा हो गया है. एनडीटीवी से एक्सक्लूसिव बातचीत में शिवसेना (UBT) के सांसद और प्रवक्ता संजय राउत ने एक ऐसा बम फोड़ा है, जिसने महायुति के खेमे में खलबली मचा दी है. राउत का दावा है कि वे बहुमत के जादुई आंकड़े 114 से महज 6 कदम दूर हैं. लेकिन बड़ा सवाल यह है कि आखिर ये 6 कदम कहां से पूरे होंगे?
राउत का '108' वाला फॉर्मूला: क्या AIMIM भी शामिल?
संजय राउत जब कहते हैं कि उनके पास 108 का आंकड़ा है, तो गणित बहुत कुछ बयां करता है. उद्धव गुट (65), कांग्रेस (24), शरद पवार की एनसीपी और अन्य छोटे दलों को मिलाकर भी यह आंकड़ा 108 तक नहीं पहुंचता. ऐसे में कयास लगाए जा रहे हैं कि क्या असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM भी पर्दे के पीछे से उद्धव ठाकरे को समर्थन देने को तैयार है? सियासी गलियारों में चर्चा जोरों पर है कि क्या बीजेपी को रोकने के लिए उद्धव ठाकरे अब मुस्लिम वोटों और ओवैसी के साथ जाने का जोखिम उठाएंगे?

विपक्ष की क्या है तैयारी?
अगर 108 के आंकड़े में मुस्लिम बहुल सीटों वाले पार्षद शामिल हैं, तो इसका मतलब साफ है, बीजेपी को सत्ता से बाहर रखने के लिए विपक्षी गठबंधन किसी भी हद तक जाने को तैयार है. संजय राउत ने उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे पर बड़ा प्रहार करते हुए कहा कि शिंदे अपने ही पार्षदों से डरे हुए हैं. राउत के मुताबिक, शिंदे सेना के पार्षदों को बांद्रा और कल्याण-डोंबिवली के तीन अलग-अलग होटलों में नजरबंद किया गया है. राउत का दावा है कि जो शिंदे कल तक ED के डर से उद्धव का साथ छोड़ गए थे, आज उन्हें डर है कि उनके पार्षद पाला बदल लेंगे. दूसरी तरफ, राउत ने कहा कि "हमारे (UBT) पार्षद खुलेआम घूम रहे हैं, घरों पर मजे कर रहे हैं, हमें किसी का डर नहीं.
महायुति में अंदरूनी कलह
भले ही महायुति (BJP + शिंदे + अजित पवार) सबसे मजबूत दिख रही हो, लेकिन अंदरूनी कलह चरम पर है. बीजेपी (89 सीटें) किसी भी कीमत पर अपना मेयर चाहती है. सूत्र बताते हैं कि वे ढाई-ढाई साल के फॉर्मूले पर भी राजी नहीं हैं और साफ कह चुकी है 30 जनवरी को बीएमसी में बीजेपी का मेयर बनेगा. एकनाथ शिंदे अपने 29 पार्षदों के दम पर ढाई साल का मेयर पद या सबसे पावरफुल स्टैंडिंग कमेटी का अध्यक्ष पद मांग रहे हैं.
चर्चा तेज है की शिंदे स्टैंडिंग कमेटी की कमान चाहते हैं. मुंबई महानगरपालिका में स्थायी समिति स्टैंडिंग कमेटी का अध्यक्ष पद मेयर से भी अधिक प्रभावशाली माना जाता है क्योंकि असली 'तिजोरी की चाबी' इसी अध्यक्ष के पास होती है। जहां मेयर का पद मुख्य रूप से सम्मान और समन्वय का होता है, वहीं स्टैंडिंग कमेटी का चेयरमैन बीएमसी के करोड़ों रुपये के बजट और विकास कार्यों से जुड़े तमाम वित्तीय प्रस्तावों को मंजूरी देने वाली सर्वोच्च शक्ति है.

बीजेपी-शिवसेना में खटपट!
बीएमसी के नियम के अनुसार, 50 लाख रुपये से ऊपर का कोई भी टेंडर या प्रोजेक्ट तब तक पास नहीं हो सकता, जब तक उसे स्टैंडिंग कमेटी की हरी झंडी न मिल जाए. यही कारण है कि इसे नगर निगम का वॉचडॉग कहा जाता है. शहर में सड़कें बननी हों, पानी की पाइपलाइन बिछानी हो या बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स, हर फाइल को इसी कमेटी के अध्यक्ष की टेबल से होकर गुजरना पड़ता है, जिससे इस पद पर बैठने वाला व्यक्ति प्रशासन और ठेकेदारों पर सीधा नियंत्रण रखता है. और BJP शिंदे के हाथ ये सौंपने के मूड में नहीं.
कांग्रेस करेगी खेल?
सवाल ये भी उठ रहे हैं की अगर बात बिगड़ी, तो क्या बीजेपी फिर से पुराने साथी उद्धव (65) के पास जाएगी? दोनों मिल जाएं तो आंकड़ा 154 पहुंच जाता है, लेकिन क्या उद्धव बिना 'मेयर' की कुर्सी के मानेंगे? कांग्रेस किसी भी सूरत में बीजेपी का मेयर नहीं चाहती. इसलिए वह उद्धव या शिंदे, जो भी बीजेपी के खिलाफ खड़ा होगा, उसे शायद समर्थन देने को तैयार हो जाए. वहीं, राज ठाकरे की मनसे (6 सीटें) उद्धव के साथ तो है लेकिन मुंबई की राजनीति में हवा बदलते देर नहीं लगती.
क्या दिमागी खेल खेल रहे हैं राउत?क्या संजय राउत का 108 वाला दावा सिर्फ एक मनोवैज्ञानिक दबाव है, या वाकई में 'मुस्लिम कार्ड' के सहारे मातोश्री पर राज करने की तैयारी हो चुकी है? मुंबई मेयर का चुनाव अब महज एक संख्या बल का खेल नहीं, बल्कि विचारधाराओं के टकराव और अस्तित्व की लड़ाई बन चुका है। "खेला" तो अब शुरू हुआ है, बस देखते जाइए!
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