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This Article is From Jan 20, 2026

अब मुझे रुकना है... महाराष्ट्र बीजेपी के दिग्गज नेता संदीप जोशी के फैसले के क्या हैं मायने?

फडणवीस के करीबी और भाजपा के वरिष्ठ नेता संदीप जोशी ने सक्रिय राजनीति से संन्यास ले लिया है. उनके फैसले को लेकर कई तरह के सवाल खड़े हो रहे हैं.

अब मुझे रुकना है... महाराष्ट्र बीजेपी के दिग्गज नेता संदीप जोशी के फैसले के क्या हैं मायने?
  • CM देवेंद्र फडणवीस के करीबी विधायक संदीप जोशी ने सक्रिय राजनीति से संन्यास लेने की घोषणा की है
  • जोशी ने अपने पत्र में राजनीति में बढ़ती दलबदल, अवसरवादिता और कुर्सी की स्पर्धा पर सीधे हमला किया है
  • भाजपा में नए नेताओं के शामिल होने से पुराने कार्यकर्ताओं में असंतोष और बगावत की स्थिति बनी है
मुंबई:

महाराष्ट्र भाजपा में पुराने और नए चेहरे के बीच चल रही खींचतान एक बार फिर सुर्खियों में है. मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के बेहद करीबी माने जाने वाले और लंबे समय तक उनके नागपुर कार्यालय के सचिव रहे विधायक व पूर्व महापौर संदीप जोशी ने सोमवार को अचानक सक्रिय राजनीति से संन्यास लेने की घोषणा कर भाजपा में हलचल बढ़ा दी. जोशी वर्तमान में विधान परिषद सदस्य हैं और उनकी सदस्यता 13 मई को समाप्त होने वाली है.

अपने लेटरहेड पर संदीप जोशी ने “अब मुझे रुकना है” शीर्षक से जारी किए गए दो पन्नों के पत्र में साफ लिखा कि राजनीति में पद और प्रतिष्ठा की दौड़ उन्हें स्वीकार नहीं. उन्होंने कहा कि वे दोबारा विधान परिषद की सदस्यता नहीं मांगेंगे और यदि पार्टी उन्हें यह पेशकश भी करे, तो वे मना कर देंगे. जोशी ने अपने पत्र में आज की राजनीति में बढ़ रही दलबदल, अवसरवादिता, और “कुर्सी की स्पर्धा” पर सीधा हमला किया और कहा कि यह माहौल निष्ठावान कार्यकर्ताओं के लिए असहज और चिंता का कारण बन रहा है.

55 वर्षीय जोशी ने पत्र में लिखा, “मेरे लिए राजनीति हमेशा समाज सेवा का मार्ग रही है, लेकिन आज सत्ता के लिए हो रहा दलबदल सामान्य मतदाताओं और कार्यकर्ताओं को भी बेचैन कर रहा है… सीमित सीटें और बढ़ती अपेक्षाएं इस स्थिति को और कठिन बना रही हैं. इसलिए अब मुझे ही रुक जाना चाहिए.”

संदीप जोशी के फैसले के क्या हैं मायने?

उनका इशारा हाल के दिनों में भाजपा में अन्य पार्टियों से नेताओं की तेजी से हो रही एंट्री की ओर था. नागपुर महानगर पालिका चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस और अन्य दलों के कई स्थानीय नेता भाजपा में शामिल हुए. इनमें कांग्रेस के पूर्व नगरसेवक मनोज साबले भी थे, जिन्हें सीधे टिकट दे दिया गया. इससे नाराज भाजपा पदाधिकारी विनायक डेहनकर ने बगावत कर पर्चा भरा. तनाव इतना बढ़ा कि उनकी पत्नी और पूर्व मेयर अर्चना डेहनकर चुनाव तक मायके चली गईं. बाद में भाजपानीत नेतृत्व को नागपुर में 32 बागियों को छह साल के लिए निलंबित करना पड़ा. राज्यभर में पिछले दिनों 100 से अधिक नेताओं को पार्टी से बाहर किया गया.

हालांकि भाजपा नेतृत्व इस रणनीति को पार्टी विस्तार के लिए जरूरी बताता है. उनका तर्क है कि चुनाव जीतने की क्षमता वाले चेहरे लाने से उन सीटों पर जीत संभव होती है, जहां पार्टी पारंपरिक रूप से मजबूत नहीं रही. आंकड़े भी इसे कुछ हद तक सही साबित करते हैं. 29 महानगर पालिकाओं में से भाजपा 25 में सत्ता बनाने की स्थिति में है.

आगे क्या है संभावना?

जोशी के करीबी मानते हैं कि वे संवेदनशील स्वभाव के नेता हैं और यह फैसला शायद भावनाओं के पल में लिया गया हो. लेकिन उनके समर्थक इस फैसले से आहत दिखे सोमवार को घोषणा होते ही कई कार्यकर्ता रो पड़े, नारे लगाए और उनसे फैसला वापस लेने की गुहार लगाई. मुख्यमंत्री फडणवीस वर्तमान में दावोस में हैं. कार्यकर्ताओं ने उनकी वापसी के बाद बातचीत की मांग की है. हालांकि जोशी ने मिलने पर सहमति जताई है, लेकिन राजनीति से संन्यास के अपने फैसले पर वे “अडिग” बताए जा रहे हैं.

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