- महाराष्ट्र सदन घोटाले में छगन भुजबल को एंटी करप्शन ब्यूरो और ED दोनों मामलों में अदालत ने निर्दोष करार दिया है
- विशेष कोर्ट ने कहा कि जब मूल अपराध सिद्ध नहीं होता तो मनी लॉन्ड्रिंग का मामला भी कानूनी रूप से टिक नहीं सकता
- छगन भुजबल ने अदालत से मिली राहत को सत्य और न्याय की जीत बताते हुए जनता और परिवार के समर्थन के लिए आभार जताया
एनसीपी नेता छगन भुजबल ने अदालत से मिली राहत को सत्य और न्याय की जीत बताया है. साथ ही कहा कि इस मुश्किल में दौर में परिवार पर जनता का उनपर विश्वास कायम रहा. महाराष्ट्र सदन घोटाले में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के वरिष्ठ नेता छगन भुजबल को शुक्रवार को बड़ी राहत मिली है. एंटी करप्शन ब्यूरो के बाद अब प्रवर्तन निदेशालय के मामले में भी कोर्ट ने उन्हें निर्दोष करार दे दिया है. विशेष कोर्ट ने छगन भुजबल समेत अन्य आरोपियों की डिस्चार्ज (निर्दोष मुक्तता) की अर्जी मंजूर कर ली है. यह फैसला विशेष कोर्ट के न्यायाधीश सत्यनारायण नवंदर ने सुनाया.
सत्य और न्याय की जीत...
खाद्य, नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता संरक्षण मंत्री छगन भुजबल ने कहा, 'महाराष्ट्र सदन मामले में अदालत ने दोषमुक्त कर दिया है. सत्य और न्याय की जीत हुई है. पिछले कई वर्षों में हमने न्याय प्रक्रिया पर पूर्ण विश्वास रखते हुए धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा की. इस दौरान मेरे परिवार, सहयोगियों और जनता द्वारा दिखाए गए विश्वास के लिए मैं उनका ऋणी हूं. आने वाले समय में भी हम सभी और अधिक ऊर्जा के साथ जनता की सेवा के लिए कार्य करते रहेंगे.'
अदालत ने किस आधार पर भुजबल को किया बरी?
महाराष्ट्र सदन घोटाले में अदालत ने ने कहा कि जब इस मामले में कोई प्रेडिकेट ऑफेंस (मूल अपराध) बनता ही नहीं है, तो उसके आधार पर ईडी का मनी लॉन्ड्रिंग का केस भी टिक नहीं सकता. इसी आधार पर कोर्ट ने ईडी की कार्रवाई को खारिज करते हुए भुजबल और अन्य आरोपियों को बरी कर दिया. दरअसल, महाराष्ट्र सदन घोटाले से जुड़े मामले में पहले ही एसीबी की ओर से दर्ज केस में भुजबल को राहत मिल चुकी थी. ईडी ने उसी मामले को आधार बनाकर मनी लॉन्ड्रिंग का केस दर्ज किया था, लेकिन अब कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि जब मूल अपराध ही साबित नहीं होता, तो ईडी की जांच और केस की कोई कानूनी जमीन नहीं बचती. कानून के अनुसार, यदि मूल अपराध ही समाप्त हो जाता है या आरोपी बरी हो जाता है, तो उस आधार पर ईडी का मनी लॉन्ड्रिंग का मामला भी टिक नहीं सकता.
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क्या है पूरा मामला?
यह मामला साल 2005 का है, जब छगन भुजबल राज्य के उपमुख्यमंत्री और लोक निर्माण मंत्री के पद पर थे. उन पर आरोप लगा था कि उन्होंने बिना किसी बोली प्रक्रिया के दिल्ली में महाराष्ट्र सदन के निर्माण का ठेका चमनकर एंटरप्राइजेज को दे दिया था. जांच एजेंसियों ने आरोप लगाया था कि भुजबल ने अपने पद का दुरुपयोग करके अपने परिवार और अपनी स्वामित्व वाली कंपनियों को आर्थिक लाभ पहुंचाया था. 11 जून, 2015 को काला धन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के तहत दो मामले दर्ज किए गए थे. छगन भुजबल के साथ समीर भुजबल, पंकज भुजबल और 52 अन्य लोग भी इसमें शामिल थे. आरोप था कि छगन भुजबल ने विभिन्न कंपनियों के माध्यम से लगभग 13.5 करोड़ रुपये की रिश्वत ली थी.
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मार्च 2016 में ईडी ने छगन भुजबल से 10 घंटे तक पूछताछ की और उन्हें गिरफ्तार कर लिया. उन्हें 2016 से 2018 के बीच लगभग दो साल जेल में बिताने पड़े थे.
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