पंजाब में फिल्म ‘सतलुज' को लेकर शुरू हुई बहस अब सिर्फ एक फिल्म तक सीमित नहीं रह गई है. इसने राज्य की राजनीति में उन मुद्दों को फिर से जीवित कर दिया है जिन पर पिछले चार दशकों से लगातार विवाद और चर्चा होती रही है. उग्रवाद, काउंटर-इंसर्जेंसी अभियान, मानवाधिकार उल्लंघन और पीड़ित परिवारों को न्याय जैसे सवाल एक बार फिर राजनीतिक केंद्र में आ गए हैं. यही वजह है कि पंजाब की लगभग सभी बड़ी राजनीतिक पार्टियां इस मुद्दे पर बेहद सावधानी से प्रतिक्रिया दे रही हैं.
फिल्म ने तोड़ी राजनीतिक चुप्पी
लंबे समय से पंजाब की मुख्यधारा की राजनीति 1980 और 1990 के दशक के कठिन दौर से जुड़े मुद्दों पर स्पष्ट रुख लेने से बचती रही है. विभिन्न सरकारों ने इन सवालों का स्थायी समाधान निकालने के बजाय राजनीतिक संतुलन बनाए रखने की कोशिश की. लेकिन ‘सतलुज' ने उस संतुलन को चुनौती दे दी है.
अब राजनीतिक दलों के हर बयान और हर चुप्पी को ध्यान से देखा जा रहा है. लोगों के बीच यह चर्चा तेज हो गई है कि आखिर उन घटनाओं के लिए जिम्मेदारी किसकी थी और पीड़ित परिवारों को न्याय दिलाने के लिए क्या कदम उठाए गए.
परमजीत कौर खालड़ा के बयान ने बढ़ाई राजनीतिक गर्मी
इस पूरे विवाद में सबसे महत्वपूर्ण हस्तक्षेप मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा की पत्नी परमजीत कौर खालड़ा का माना जा रहा है. जसवंत सिंह खालड़ा ने कथित तौर पर अज्ञात शवों के गुप्त अंतिम संस्कारों के मामलों को उजागर किया था और बाद में उनकी हत्या कर दी गई थी.
हरिके पत्तन में आयोजित एक स्मृति कार्यक्रम से पहले जारी अपने बयान में परमजीत कौर खालड़ा ने किसी एक दल को नहीं बल्कि पूरे राजनीतिक तंत्र को कटघरे में खड़ा किया. उन्होंने कांग्रेस पर मानवाधिकार उल्लंघनों के दौर में सत्ता में रहने का आरोप लगाया. शिरोमणि अकाली दल पर ऐसे अधिकारियों को संरक्षण देने का आरोप लगाया जिन पर गंभीर आरोप लगे थे. आम आदमी पार्टी सरकार पर दोषियों को सजा दिलाने में नाकाम रहने की बात कही. वहीं भाजपा नीत केंद्र सरकार का भी कुछ अंतरराष्ट्रीय आरोपों के संदर्भ में उल्लेख किया.
सभी दलों के सामने अलग-अलग चुनौती
परमजीत कौर खालड़ा का बयान इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इससे हर राजनीतिक दल की अलग कमजोरी सामने आई है.
कांग्रेस के लिए यह मुद्दा उस दौर की याद दिलाता है जब राज्य में उसकी सरकारें सत्ता में थीं. दूसरी ओर शिरोमणि अकाली दल को यह जवाब देना पड़ रहा है कि उसके शासनकाल में जवाबदेही तय करने के लिए कितने प्रभावी कदम उठाए गए. आम आदमी पार्टी से सवाल पूछा जा रहा है कि सत्ता में आने के बाद उसने लंबित मामलों में क्या ठोस बदलाव किया. भाजपा के सामने राष्ट्रीय सुरक्षा के अपने राजनीतिक दृष्टिकोण और पंजाब में सिख समाज के बीच समर्थन बढ़ाने की रणनीति के बीच संतुलन बनाने की चुनौती है.
वोट बैंक की राजनीति भी बनी बड़ी वजह
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पंजाब की पार्टियां अभी मतदाताओं की प्रतिक्रिया को समझने की कोशिश कर रही हैं. उन्हें यह चिंता है कि इस मुद्दे पर किसी एक पक्ष में खुलकर खड़े होने से उनका एक वर्ग नाराज हो सकता है.
भाजपा को डर है कि यदि वह काउंटर-इंसर्जेंसी कार्रवाई की आलोचना वाले पक्ष के करीब दिखती है तो उसके पारंपरिक समर्थक असहज हो सकते हैं. वहीं यदि वह सिख समुदाय की भावनाओं के प्रति संवेदनशील नहीं दिखती तो राज्य में उसका विस्तार प्रभावित हो सकता है.
कांग्रेस को इतिहास और वर्तमान राजनीति के बीच संतुलन बनाना है. अकाली दल अपने पंथिक आधार को नाराज नहीं कर सकता जबकि उसके अपने शासनकाल को लेकर भी सवाल मौजूद हैं. आम आदमी पार्टी पर यह दबाव है कि वह बदलाव के अपने दावों को जमीन पर साबित करे.
क्या पंजाब में अब भी प्रभावी है पंथिक राजनीति?
हाल के चुनावी नतीजों ने यह संकेत दिया है कि पंजाब में पंथिक राजनीति आज भी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है. 2024 के लोकसभा चुनाव में खडूर साहिब से अमृतपाल सिंह और फरीदकोट से सरबजीत सिंह खालसा की जीत ने यह साबित किया कि पहचान, न्याय और इतिहास से जुड़े मुद्दे अब भी बड़ी संख्या में मतदाताओं को प्रभावित करते हैं.
अमृतपाल सिंह की जीत को सिख पहचान और कथित अन्याय के मुद्दों पर आधारित राजनीतिक समर्थन का संकेत माना गया. वहीं सरबजीत सिंह खालसा की जीत का प्रतीकात्मक महत्व भी काफी बड़ा रहा. इन दोनों परिणामों ने यह स्पष्ट कर दिया कि पंजाब में इतिहास से जुड़े सवाल आज भी चुनावी राजनीति को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं.
‘सतलुज' क्यों बन गई राजनीतिक रूप से अहम?
फिल्म ‘सतलुज' सीधे उन भावनात्मक और ऐतिहासिक मुद्दों को छूती है जिनसे पंजाब का एक बड़ा वर्ग खुद को जुड़ा हुआ महसूस करता है. यही वजह है कि यह फिल्म केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं रह गई है.
यदि कोई राजनीतिक दल फिल्म की पूरी कहानी और उसके संदेश का समर्थन करता है तो उसे कुछ वर्गों का समर्थन मिल सकता है लेकिन दूसरे वर्ग की नाराजगी का जोखिम भी रहेगा. वहीं यदि कोई दल इससे दूरी बनाता है तो उस पर न्याय और मानवाधिकार के सवालों की अनदेखी करने का आरोप लग सकता है.
पंजाब की राजनीति के सामने फिर वही पुराने सवाल
फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि ‘सतलुज' आने वाले चुनावों को कितना प्रभावित करेगी. लेकिन इतना साफ है कि इसने पंजाब की राजनीति को असहज कर दिया है. फिल्म ने उन सवालों को फिर से सामने ला दिया है जिनका जवाब आज तक पूरी तरह नहीं मिल पाया है.
पंजाब अपने उग्रवाद और काउंटर-इंसर्जेंसी के दौर को किस तरह याद करे, पीड़ित परिवारों को न्याय दिलाने के लिए सरकारों ने क्या किया, मानवाधिकार और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन कैसे बने और सिख पहचान से जुड़े मुद्दों को किस तरह देखा जाए, ये सभी प्रश्न एक बार फिर चर्चा के केंद्र में हैं.
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