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12 साल सलाखों में कैद रहा युवक, अब बाइज्‍जत बरी; दिंडोशी सेशन कोर्ट से POCSO केस में आरोपी को बड़ी राहत, जानिए पूरा मामला

साल 2014 में दहिसर पुलिस स्टेशन में एक महिला ने अपनी नाबालिग बेटी के साथ दुष्कर्म और छेड़छाड़ की शिकायत दर्ज कराई थी. आरोप था कि पड़ोस में रहने वाला युवक उसकी बच्ची को अपने घर बुलाकर अश्लील वीडियो दिखाता था और उसके साथ गलत हरकतें करता था. 

12 साल सलाखों में कैद रहा युवक, अब बाइज्‍जत बरी; दिंडोशी सेशन कोर्ट से POCSO केस में आरोपी को बड़ी राहत, जानिए पूरा मामला

Dindoshi Sessions Court: मुंबई के दिंडोशी सेशन कोर्ट ने करीब 12 साल पुराने एक गंभीर पॉक्सो केस में बड़ा फैसला सुनाया है. अदालत ने इस मामले में आरोपी को सभी आरोपों से बरी कर दिया है. कोर्ट का साफ कहना है कि अभियोजन पक्ष अपने आरोपों को ठोस तरीके से साबित नहीं कर पाया, जिसके चलते आरोपी को संदेह का लाभ दिया गया. 

मामला क्या था?

यह केस साल 2014 का है, जब दहिसर पुलिस स्टेशन में एक महिला ने अपनी नाबालिग बेटी के साथ दुष्कर्म और छेड़छाड़ की शिकायत दर्ज कराई थी. आरोप था कि पड़ोस में रहने वाला व्यक्ति उसकी बच्ची को अपने घर बुलाकर अश्लील वीडियो दिखाता था और उसके साथ गलत हरकतें करता था. परिवार का कहना था कि बच्ची को जान से मारने की धमकी दी गई थी, इसलिए वह लंबे समय तक चुप रही.

कोर्ट में सुनवाई के दौरान क्या सामने आया?

लंबी सुनवाई के बाद कोर्ट ने कई ऐसी बातें नोट कीं, जिनसे केस कमजोर होता गया. उम्र पर ही सच साफ नहीं हो पाया. अभियोजन ने बच्ची की उम्र 11 साल बताई, लेकिन मेडिकल रिपोर्ट और जन्म प्रमाण पत्र में अलग-अलग तारीखें सामने आईं. कोर्ट ने कहा कि जब उम्र ही साफ नहीं है, तो पॉक्सो की धाराएं साबित करना मुश्किल हो जाता है.

FIR में देरी ने खड़े किए सवाल

घटना 31 अक्टूबर की बताई गई, लेकिन शिकायत 2 नवंबर को दर्ज हुई. इस देरी की कोई ठोस वजह सामने नहीं आई, जिससे कोर्ट को शक हुआ कि मामला बाद में सोच-समझकर दर्ज किया गया हो सकता है.

मेडिकल रिपोर्ट से नहीं मिला पुख्ता आधार

डॉक्टर ने जांच में हाइमन फटा हुआ बताया, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि यह कई कारणों से हो सकता है. इससे दुष्कर्म साबित नहीं होता.
शरीर पर किसी तरह की चोट भी नहीं मिली, जो आरोपों को मजबूत कर सके.

गवाहों के बयान आपस में मेल नहीं खाते

पीड़िता, उसकी मां और पुलिस के बयान कई जगह पर अलग-अलग थे. कुछ बातें बाद में जोड़ी गईं, जो पहले रिकॉर्ड में नहीं थीं, इससे कोर्ट ने गवाही की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए. मामले में कहा गया था कि आरोपी मोबाइल पर अश्लील वीडियो दिखाते थे, लेकिन जांच एजेंसियां इसका कोई डिजिटल सबूत कोर्ट में पेश नहीं कर सकीं.

कोर्ट ने क्या कहा?

अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि केस में कई गंभीर खामियां हैं. आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त और भरोसेमंद सबूत नहीं हैं. इसी आधार पर आरोपी मंगेश शंकर कांबली को सभी आरोपों से बरी कर दिया गया. कोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि अगर आरोपी किसी अन्य मामले में वांछित नहीं है, तो उसे तुरंत रिहा किया जाए.

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