OBC वर्ग के कई अभ्यर्थियों को क्रीमी लेयर के नियमों से राहत देने वाले सुप्रीम कोर्ट के फैसले का असर अभी नहीं दिखेगा. इसे लागू होने में अभी करीब दो साल का वक्त लग सकता है. सुप्रीम कोर्ट ने कुछ महीने पहले ही ओबीसी वर्ग से आने वाले अभ्यर्थियों को बड़ी राहत दी थी और कहा था कि प्राइवेट सेक्टर या फिर PSU में काम करने वाले माता-पिता की आय को ही ओबीसी वर्ग के लिए क्रीमी लेयर का आधार नहीं माना जा सकता है. इस फैसले के बाद से ही तमाम भर्तियों में नए नियमों का इंतजार किया जा रहा था, लेकिन फिलहाल इसमें देरी हो सकती है.
क्या है फैसले के लागू होने में देरी का कारण?
सुप्रीम कोर्ट के बड़े फैसले को लेकर केंद्र सरकार की तरफ से एक अपील की गई है, जिसमें कहा गया है कि इसे लागू करने के लिए कम से कम दो साल का वक्त लगेगा. तमाम भर्तियों और उनके चल रहे प्रोसेस को बैलेंस करने के लिए ये वक्त मांगा गया है. यानी करीब दो साल बाद ही एक साथ सभी भर्तियों के लिए नया नियम लागू किया जाएगा.
क्या है क्रीमी लेयर?
अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी में आने वाले कुछ लोगों को क्रीमी लेयर में गिना जाता है. ये वो लोग होते हैं, जो आर्थिक और सामाजिक तौर पर काफी मजबूत हैं, जिसके चलते उन्हें आरक्षण की जरूरत नहीं होती है. इसके लिए 8 लाख रुपये की सालाना आय को देखा जाता है, जिनकी सालाना आय इससे ज्यादा है, वो क्रीमी लेयर में शामिल होते हैं.
क्या है सुप्रीम कोर्ट का फैसला?
सुप्रीम कोर्ट ने फैसला उन अभ्यर्थियों को लेकर दिया है, जिन्हें उनके माता-पिता की सैलरी के चलते क्रीमी लेयर में शामिल कर दिया गया और ओबीसी रिजर्वेशन से वंचित रखा गया. सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि माता-पिता की सैलरी पर ही क्रीमी लेयर तय नहीं किया जा सकता है. इसके लिए 1993 के मूल दिशानिर्देशों को ध्यान में रखा जाना जरूरी है. कोर्ट ने कहा कि ग्रुप सी या ग्रुप डी में काम करने वाले माता-पिता की सैलरी को क्रीमी लेयर तय करने के लिए नहीं जोड़ा जा सकता है. इसके अलावा कृषि से होने वाली आय को भी इससे बाहर रखा जाएगा. क्रीमी लेयर के लिए प्रॉपर्टी, किराया, बिजनेस और बाकी चीजों को देखना जाना चाहिए.
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