पालघर स्थित डहाणू के समुद्र में घायल अवस्था में मिली और इलाज के बाद मुक्त की गई ‘धवललक्ष्मी' नाम की ऑलिव रिडले मादा कछुए ने करीब चार हजार किलोमीटर से अधिक का समुद्री सफर तय कर वैज्ञानिकों का ध्यान अपनी ओर खींचा है. खास बात यह है कि सैटेलाइट टैगिंग के जरिए समुद्र में छोड़ी गई ‘धवललक्ष्मी' देश की पहली ऑलिव रिडले मादा कछुआ है.
सैटेलाइट ट्रैकिंग की मदद से उसकी हर हलचल पर पैनी नजर रखी जा रही है. समुद्री जैव विविधता और कछुओं के प्रवास को समझने के लिए यह यात्रा बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है.
पहली बार कछुए पर लगाया सैटेलाइन टैग
डहाणू के समुद्र तट पर घायल अवस्था में मिली ‘धवललक्ष्मी' ने आज पूरी दुनिया के समुद्री वैज्ञानिकों के बीच उत्सुकता पैदा कर दी है. 10 अगस्त 2025 को तट पर मिली इस कछुआ का डहाणू के समुद्री कछुआ उपचार केंद्र में इलाज किया गया. पूरी तरह स्वस्थ होने के बाद, 20 नवंबर 2025 को उसकी पीठ पर सैटेलाइट टैग लगाकर उसे फिर से समुद्र में छोड़ दिया था. यह देश का पहला ऐसा मामला था, जब किसी मादा ऑलिव रिडले कछुआ की सैटेलाइट टैगिंग की गई हो.

डहाणू से निकलकर वह गुजरात के समुद्री क्षेत्र में पहुंची और वहां से गहरे समंदर के रास्ते पश्चिम की ओर रुख करते हुए करीब 1800 किलोमीटर का सफर तय कर ओमान के तट तक जा पहुंची.
ओमान से फिर भारत की ओर बढ़ रही मादा कछुआ
सैटेलाइट डेटा के अनुसार, इस प्रवास के दौरान वह 380 मीटर की गहराई तक भी गई. कुछ समय ओमान के पास ऑलिव रिडले कछुओं के प्रजनन क्षेत्र में बिताने के बाद, उसने फिर से भारत की ओर वापसी शुरू कर दी है. वर्तमान में वह रत्नागिरी के तट की ओर तेजी से बढ़ रही है. अब तक वह साढ़े तीन हजार किलोमीटर से ज्यादा का रास्ता तय कर चुकी है.
विशेषज्ञों का मानना है कि धवललक्ष्मी की इस यात्रा से समुद्री जैव विविधता, कछुओं के प्रवास मार्ग, उनके खान-पान और प्रजनन प्रक्रिया के बारे में कई महत्वपूर्ण जानकारियां मिलेंगी.
उपवनसंरक्षक दिवाकर निरंजन के अनुसार, यह डेटा भविष्य में समुद्री पर्यावरण के संरक्षण के लिए मील का पत्थर साबित होगा. डहाणू के तट से शुरू हुई यह यात्रा अब प्रकृति के कई अनसुलझे रहस्यों को उजागर कर रही है.
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(पालघर से मनोज सातवी की रिपोर्ट)
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