कल्पना कीजिए. साल 2035 का वक्त है. आप सुबह मेरठ में चाय पीकर ऑफिस के लिए निकलते हैं. आपका ऑफिस दिल्ली में है. शाम को काम खत्म होने के बाद देहरादून में दोस्तों से मिलने पहुंच जाते हैं. शनिवार को परिवार के साथ आगरा घूम आते हैं और रविवार को जयपुर में लंच करके लौट आते हैं. सुनने में यह किसी विकसित देश की तस्वीर लग सकती है लेकिन अगर उत्तर भारत में चल रही सड़क, रेल और एयरपोर्ट परियोजनाओं को एक साथ जोड़कर देखें तो तस्वीर धीरे-धीरे उसी दिशा में बनती दिखती है. असल में भारत में पहली बार सड़क, रेल, एयरपोर्ट और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क एक साथ विकसित हो रहे हैं. यही वजह है कि अगले 10 साल की सबसे बड़ी कहानी सिर्फ किसी एक्सप्रेसवे का उद्घाटन नहीं होगी. सबसे बड़ी कहानी होगी कि शहरों के बीच का समय सिकुड़ने लगेगा.
पहली बार एक साथ काम कर रहे हैं सड़क, रेल और एयरपोर्ट
भारत में इंफ्रास्ट्रक्चर पहले भी खड़े हुए हैं. सड़कें भी बनीं, रेलवे लाइनें भी बिछीं. लेकिन उत्तर भारत में पहली बार ऐसा हो रहा है कि सड़क, रेल, एयरपोर्ट और लॉजिस्टिक्स कॉरिडोर को एक बड़े नेटवर्क के रूप में देखा जा रहा है. दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे, दिल्ली-मेरठ RRTS, यमुना एक्सप्रेसवे, जेवर एयरपोर्ट, पूर्वांचल एक्सप्रेसवे, गंगा एक्सप्रेसवे और डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर अलग-अलग प्रोजेक्ट नहीं हैं. ये मिलकर एक ऐसी अर्थव्यवस्था की बुनियाद रखने जा रहे हैं जिसमें शहरों के बीच की दूरी खासकर वक्त के मामले में घटने लगती है. ये तो जगजाहिर है ही कि जब दूरी घटती है, तो जीवन भी बदलता है.

दिल्ली अब सिर्फ दिल्ली नहीं रहेगी
आज से 20 साल पहले कोई व्यक्ति गाजियाबाद में रहकर रोज दिल्ली नौकरी करने जाए, यह बड़ी बात मानी जाती थी. बाद में नोएडा जुड़ा फिर गुरुग्राम जुड़ा और फिर फरीदाबाद. अब वही कहानी मेरठ के साथ लिखी जा रही है. क्योंकि पहले जहां दिल्ली से मेरठ जाने में 4 घंटे तक वक्त लगता था वो आने वाले वक्त में सिर्फ 1 घंटे का रह जाएगा. ऐसा RRTS और एक्सप्रेसवे मॉडल की वजह से संभव होगा. वैसे दिल्ली-मेरठ RRTS की असली कहानी ट्रेन नहीं है. असली कहानी यह है कि दिल्ली का प्रभाव क्षेत्र बढ़ रहा है. आने वाले वर्षों में मेरठ सिर्फ पश्चिमी यूपी का शहर नहीं, बल्कि दिल्ली के विस्तारित आर्थिक क्षेत्र का हिस्सा बन सकता है . संभव है कि भविष्य में लोग पूछें ही नहीं कि आप दिल्ली में रहते हैं या मेरठ में. सवाल सिर्फ यह हो कि ऑफिस तक पहुंचने में कितना समय लगता है.
देहरादून 'वीकेंड सिटी' बनने की राह पर
दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे के बारे में सार्वजनिक रूप से उपलब्ध रिपोर्ट्स बताते हैं कि इससे यात्रा समय 6 घंटे से घटकर करीब 2.5 घंटे तक आ सकता है. लेकिन इसकी सबसे बड़ी कहानी सड़क नहीं है. सबसे बड़ी कहानी यह है कि देहरादून अब दूर का शहर नहीं रह जाएगा. जब कोई शहर समय के हिसाब से करीब आ जाता है, तब वहां सिर्फ पर्यटक नहीं पहुंचते. वहां निवेश पहुंचता है. नए होटल खुलते हैं. नए कैफे खुलते हैं. स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार पैदा होते हैं. जिस तरह दिल्ली वालों के लिए गुरुग्राम कभी दूर था और आज रोजमर्रा का हिस्सा है, उसी तरह आने वाले दशक में देहरादून का रिश्ता भी NCR से बदल सकता है.
असली बदलाव घर खरीदने वाले महसूस करेंगे
ये जगजाहिर है कि जब सड़कें बनती हैं, तो सबसे पहले रियल एस्टेट बदलता है. दिल्ली-नोएडा, दिल्ली-गुरुग्राम और बाद में यमुना एक्सप्रेसवे कॉरिडोर इसका उदाहरण रहे हैं. आज दिल्ली में घर खरीदना लाखों परिवारों की पहुंच से बाहर होता जा रहा है. लेकिन अगर मेरठ, बुलंदशहर, अलीगढ़ या पानीपत से दिल्ली आना-जाना आसान हो जाता है, तो लोग नौकरी और घर के लिए अलग-अलग शहर चुनने लगेंगे.
संभव है कि जिस तरह कभी गुरुग्राम ने दिल्ली का दबाव कम किया था, वैसा ही रोल आने वाले दशक में मेरठ, जेवर और पश्चिमी यूपी के दूसरे शहर निभाने लगें. ऐसा दुनिया के कई बड़े महानगरों में पहले ही हो चुका है. संभव है कि अगले दशक में उत्तर भारत के मध्यम वर्ग के लिए भी यही सबसे बड़ा बदलाव साबित हो.
2035 की सबसे बड़ी कहानी क्या होगी?
संभव है कि 2035 में सबसे बड़ी खबर किसी नए एक्सप्रेसवे का उद्घाटन न हो. तब सबसे बड़ी खबर यह हो कि उत्तर भारत के करोड़ों लोग अपने जीवन का नक्शा बदल चुके हों.जेवर एयरपोर्ट, एक्सप्रेसवे कॉरिडोर, RRTS और पारंपरिक रेलवे नेटवर्क अगर एक साथ काम करते हैं तो दिल्ली के आसपास एक विशाल आर्थिक क्षेत्र विकसित हो सकता है. यही मॉडल आज चीन के बीजिंग-तियानजिन क्षेत्र और यूरोप के कई महानगरीय क्षेत्रों में देखा जाता है. भारत में भी दिल्ली-एनसीआर और पश्चिमी उत्तर प्रदेश उस दिशा में बढ़ते दिखाई दे रहे हैं. यानी शहर नहीं, समय बदलने वाला है. इस कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा दूरी नहीं है. दिल्ली और देहरादून के बीच किलोमीटर लगभग उतने ही रहेंगे. दिल्ली और मेरठ भी नक्शे पर वहीं रहेंगे. लेकिन अगर 3 घंटे का सफर 55 मिनट का हो जाए और 6 घंटे का सफर 2.5 घंटे का, तो लोगों की जीवन शैली बदल जाएगी. इसके बाद देहरादून, ऋषिकेश, आगरा, मथुरा, अयोध्या और जयपुर जैसे शहर अधिक लोगों को छोटी यात्राओं के लिए आकर्षित कर सकते हैं. यानी साल 2035 में सबसे बड़ी कहानी यह हो सकती है कि दिल्ली, मेरठ, देहरादून, जेवर, आगरा, जयपुर और लखनऊ मिलकर एक ऐसे "मेगा रीजन" का हिस्सा बन जाएं, जहां लोग एक शहर में रहें, दूसरे शहर में नौकरी करें और तीसरे शहर में वीकेंड बिताएं.
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